सोमवार, 10 मार्च 2025

पीटर महान की विदेश नीति

17वीं और 18वीं सदी का यूरोप निरंतर युद्ध, क्षेत्रीय संघर्ष और शक्ति संतुलन की राजनीति से भरा हुआ था। इसी संदर्भ में रूस के महान सुधारक और सम्राट पीटर महान (Peter the Great, 1672-1725) ने रूस की विदेश नीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। उनकी विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य थे:

·     रूस को एक शक्तिशाली समुद्री शक्ति बनाना।

·     सैन्य और नौसैनिक शक्ति के माध्यम से रूस का क्षेत्रीय विस्तार।

रूस की प्रमुख समस्या यह थी कि वह एक विशाल भूभाग वाला साम्राज्य था, लेकिन उसके पास कोई प्रमुख समुद्री मार्ग नहीं था जिससे वह व्यापार और सैन्य उद्देश्यों के लिए स्वतंत्र रूप से काम कर सके। इस चुनौती को देखते हुए, पीटर की नीति दो प्रमुख दिशाओं में केंद्रित रही—दक्षिण में काला सागर और पश्चिम में बाल्टिक सागर।

                            दक्षिण में काला सागर और अज़ोव बंदरगाह पर कब्ज़ा

रूस की समुद्री शक्ति के लिए काला सागर तक पहुँचना अनिवार्य था। इस क्षेत्र में उस समय ओटोमन तुर्क साम्राज्य का प्रभुत्व था। तुर्कों ने काला सागर को पूरी तरह नियंत्रित कर रखा था, जिससे रूस के लिए बाहरी दुनिया से संपर्क करना कठिन था। पीटर ने इस चुनौती को एक अवसर के रूप में देखा और 1695-96 में अज़ोव अभियान (Azov Campaigns) चलाया। पीटर के सौभाग्य से इस समय आटोमन साम्राज्य पतन की तरफ बढ़ रहा था।

अज़ोव पर विजय (1696)

पहले अभियान में रूसी सेना को असफलता मिली, लेकिन 1696 में पीटर ने अज़ोव पर निर्णायक विजय प्राप्त की और काले सागर की दिशा में रूस का पहला समुद्री मार्ग खोला। हालाँकि, यह आंशिक सफलता थी, क्योंकि काला सागर से भूमध्य सागर जाने वाले जलमार्ग अभी भी तुर्कों के नियंत्रण में थे। इस कारण रूस को एक पूर्ण नौसैनिक शक्ति बनने में कठिनाई हुई।

इसके बाद, पीटर ने तुर्कों से और अधिक क्षेत्रों को जीतने की योजना बनाई, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका। 1711 में पृथ नदी अभियान (Pruth River Campaign) में रूसी सेना तुर्कों से बुरी तरह हार गई, जिससे रूस को पीछे हटना पड़ा और उसे अज़ोव खाली करना पड़ा।

 हालाँकि, इस संघर्ष से पीटर को यह अनुभव मिला कि उसे अपनी नौसैनिक और सैन्य शक्ति को और मजबूत करना होगा। इसके बाद, उसका ध्यान पूरी तरह पश्चिम में बाल्टिक सागर पर केंद्रित हो गया, जिससे रूस को यूरोप में प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित होने का अवसर मिला।

                         पश्चिम में बाल्टिक सागर और महान उत्तरी युद्ध  (1700-1721)

बाल्टिक सागर पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ग्रेट नॉर्दर्न युद्ध (Great Northern War, 1700-1721) हुआ। इस युद्ध में रूस ने स्वीडन के विरुद्ध डेनमार्क, पोलैंड और सक्सोनी के साथ गठबंधन किया। स्वीडन, जो उस समय एक बड़ी सैन्य शक्ति थी, बाल्टिक क्षेत्र पर प्रभुत्व बनाए रखना चाहती थी। स्वीडन बाल्टिक सागर को स्वीडिश झील समझता था ।

स्वीडन की शक्ति और प्रारंभिक पराजय

चार्ल्स XII (Charles XII) स्वीडन का युवा और साहसी शासक था, जिसने युद्ध की शुरुआत में रूस और उसके सहयोगियों को कई पराजय दीं।

नार्वा का युद्ध (1700)

पीटर की सेना इस युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थी और स्वीडिश सेना ने नार्वा (Narva) के युद्ध में रूस को करारी शिकस्त दी। लेकिन चार्ल्स XII ने इस जीत को निर्णायक बनाने के बजाय पोलैंड और अन्य युद्ध अभियानों में अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर दी, जिससे पीटर को अपनी सेना को पुनर्गठित करने का अवसर मिला।

रूसी सेना का पुनर्गठन और बाल्टिक क्षेत्र में विजय

पीटर ने रूसी सेना और नौसेना को आधुनिक बनाया, यूरोपीय शैली के सैन्य संगठन लागू किए, और सेंट पीटर्सबर्ग (1703) की स्थापना की, जो बाद में रूस की नई राजधानी बनी। 1704 में, रूस ने नार्वा पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया और अपनी शक्ति को धीरे-धीरे बढ़ाया।

पोल्टावा का युद्ध (8 जुलाई 1709): रूस की निर्णायक जीत

चार्ल्स XII ने रूस पर पुनः हमला किया और 1708 में मास्को की ओर बढ़ने की योजना बनाई। लेकिन रूस की सर्दी, भोजन की कमी और रूस की 'स्कॉर्च्ड अर्थ' नीति (Scorched Earth Policy) के कारण स्वीडिश सेना कमजोर हो गई। 8 जुलाई 1709 को पोल्टावा (Poltava) के युद्ध में रूस ने स्वीडन को निर्णायक रूप से पराजित किया। चार्ल्स XII को युद्ध क्षेत्र से भागना पड़ा और उसने तुर्की में शरण ली। यह युद्ध रूस के लिए एक यूरोपीय शक्ति के रूप में उभरने का महत्वपूर्ण मोड़ बना।

न्यास्ताड संधि (10 सितंबर 1721) और रूस की नई शक्ति

ग्रेट नॉर्दर्न युद्ध का अंत न्यास्ताड संधि (Nystad Treaty, 1721) से हुआ, जिससे रूस को बाल्टिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण क्षेत्र प्राप्त हुए। रूस ने एस्टोनिया, लातविया और फिनलैंड के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया। स्वीडन की शक्ति समाप्त हो गई और रूस यूरोप की 'महाशक्ति' बन गया। सेंट पीटर्सबर्ग को रूस की नई राजधानी घोषित किया गया।

                      पीटर महान का मूल्यांकन: सुधारक या निरंकुश शासक?

सुधार और आधुनिकीकरण

सेना का आधुनिकीकरण – यूरोपीय सैन्य रणनीतियों को अपनाया।

नौसेना का निर्माण – रूस की पहली मजबूत नौसेना का गठन किया।

नई राजधानी की स्थापना – सेंट पीटर्सबर्ग को पश्चिमी शैली की राजधानी के रूप में बनाया।

प्रशासनिक सुधार – रूस में केन्द्रियकृत नौकरशाही विकसित की।

धार्मिक सुधार – चर्च की शक्ति को सीमित कर रूसी साम्राज्य को अधिक संगठित किया।

निरंकुशता और क्रूरता

अपने पुत्र एलेक्सिस को देशद्रोही मानकर गिरफ्तार किया और अत्यधिक यातना दी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

विरोधियों को कुचलने के लिए अत्यधिक हिंसा और बल प्रयोग किया।

कुछ इतिहासकारों ने उन्हें "बर्बर प्रतिभा" (Barbaric Genius) कहा।

निष्कर्ष

पीटर महान का युग रूस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उन्होंने रूस को एक आधुनिक यूरोपीय शक्ति बनाया, जो सैन्य और नौसेना के क्षेत्र में प्रभावशाली हो गई। हालाँकि, उनकी शासन शैली अत्यंत कठोर और निरंकुश थी, लेकिन उनके सुधारों ने रूस को एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

Foreign Policy of Peter the Great

The 17th and 18th centuries in Europe were marked by continuous wars, territorial conflicts, and power balance politics. In this context, the great Russian reformer and emperor Peter the Great (1672-1725) decisively influenced Russia’s foreign policy. The primary objectives of his foreign policy were:

  • To transform Russia into a powerful maritime force.
  • To expand Russia’s territory through military and naval strength.

Russia’s major challenge was that, despite being a vast empire, it lacked significant maritime routes for trade and military operations. Recognizing this issue, Peter focused his policy in two major directions—toward the Black Sea in the south and the Baltic Sea in the west.

                Conquest of the Black Sea and the Azov Port

Access to the Black Sea was essential for Russia’s maritime power. At that time, the Ottoman Empire dominated the region, controlling the Black Sea entirely and restricting Russia’s access to the outside world. Peter saw this challenge as an opportunity and launched the Azov Campaigns (1695-96). Fortunately for Peter, the Ottoman Empire was declining at this time.

Victory at Azov (1696)

The first campaign ended in failure, but in 1696, Peter achieved a decisive victory at Azov, opening Russia’s first maritime route toward the Black Sea. However, this was only a partial success, as the passage from the Black Sea to the Mediterranean was still controlled by the Ottomans. This prevented Russia from becoming a fully-fledged naval power.

Subsequently, Peter planned to capture more territories from the Ottomans, but his efforts failed. In the Pruth River Campaign (1711), the Russian army suffered a severe defeat against the Ottomans, forcing Russia to retreat and abandon Azov.

Despite this setback, Peter learned that Russia needed a stronger naval and military force. After this, he shifted his focus entirely to the Baltic Sea in the west, which provided Russia the opportunity to establish itself as a major European power.

             The Baltic Sea and the Great Northern War (1700-1721)

To gain control over the Baltic Sea, the Great Northern War (1700-1721) was fought. Russia allied with Denmark, Poland, and Saxony against Sweden, which was a dominant military power in the region. Sweden sought to maintain its supremacy over the Baltic and considered the sea its private lake.

Swedish Strength and Early Russian Defeat

Sweden’s young and bold ruler, Charles XII (1682-1718), inflicted several defeats on Russia and its allies in the early stages of the war.

Battle of Narva (1700)

Peter’s army was ill-prepared for war, and the Swedish army crushed Russia in the Battle of Narva. However, instead of decisively ending the war, Charles XII diverted his attention to Poland and other military campaigns, giving Peter the chance to reorganize his army.

Reorganization of the Russian Army and Victory in the Baltic

Peter modernized the Russian army and navy, implemented European-style military strategies, and established Saint Petersburg (1703), which later became Russia’s new capital. In 1704, Russia recaptured Narva and gradually strengthened its position in the Baltic.

Battle of Poltava (8 July 1709): Russia’s Decisive Victory

Charles XII launched another attack on Russia, planning to march toward Moscow in 1708. However, due to the harsh Russian winter, food shortages, and Russia’s scorched-earth policy, the Swedish army weakened. On 8 July 1709, Russia decisively defeated Sweden in the Battle of Poltava. Charles XII fled the battlefield and sought refuge in Turkey. This battle marked Russia’s emergence as a major European power.

The Treaty of Nystad (10 September 1721) and Russia’s Rise

The Great Northern War ended with the Treaty of Nystad (1721), granting Russia control over vast territories in the Baltic region. Russia acquired Estonia, Latvia, and parts of Finland, while Sweden’s dominance ended. Russia officially became a "Great Power" in Europe, and Saint Petersburg was declared the new capital.

Evaluation of Peter the Great: Reformer or Autocrat?

Reforms and Modernization

  • Military Modernization – Adopted European military strategies.
  • Naval Expansion – Established Russia’s first powerful navy.
  • New Capital – Built Saint Petersburg as a western-style capital.
  • Administrative Reforms – Developed a centralized bureaucracy in Russia.
  • Religious Reforms – Curtailed the power of the Church to strengthen the Russian state.

Autocracy and Brutality

  • Arrested and tortured his own son, Alexis, who later died.
  • Used excessive violence to suppress opposition.
  • Some historians describe him as a “Barbaric Genius.”

Conclusion

Peter the Great’s era marked a turning point in Russian history. He transformed Russia into a modern European power with a strong military and navy. Although his rule was highly authoritarian and brutal, his reforms laid the foundation for Russia’s rise as a global power.

बुधवार, 5 मार्च 2025

Peter the Great (1682-1725): The Architect of Modern Russia

Peter I, known as Peter the Great, was the grandson of Mikhail Romanov. He is called the "Father of Modern Russia" because he laid the foundation for a new era in Russian history. Through centralization of monarchy, military reforms, Westernization, religious control, and an expansionist foreign policy, he transformed Russia into a powerful and modern state.

Russia’s Condition and Challenges

When Peter ascended the Russian throne, Russia was geographically European but culturally, socially, and economically Asian. Though it had a Christian connection with Western Europe, the Russian Orthodox Church had become insular under local influences.

Russia’s boundaries were vast but effectively closed from all sides:

  • To the North – Ice covered the land for nine months.
  • To the South – The Ottomans and Persia blocked access to the seas.
  • To the East – Dense forests prevented the construction of viable trade routes.
  • To the West – Ambitious rulers of Poland and Sweden had their eyes set on Russia.

The Patriarch of the Church wielded influence not only over religion but in every aspect of Russian life. The Tsar’s guards (Streltsy) and the assembly of Boyars (nobility) dominated the political system. As a result, Russia was a backward, isolated, traditionalist, and rigid society.

Peter’s Vision for Reforms

Peter was eager to change these conditions. He firmly believed that Russia’s prosperity lay in its Westernization. He resolved to strengthen Russia’s ties with European nations.

To break Russia’s geographical isolation, he sought to expand Russian territory to the Baltic Sea in the west and the Black Sea in the south. This policy was called the "Warm Water Policy"—the pursuit of ice-free seaports that could remain operational throughout the year.

Additionally, Peter understood that without a strong and centralized monarchy, these goals could not be achieved. He remained committed to these objectives throughout his life and ultimately succeeded.

Peter’s Domestic Policies: A Blueprint for Russia’s Transformation

1- Secret European Tour (1697-98)

Before modernizing Russia, Peter embarked on a secret journey to Europe. He traveled to Holland, England, and Prussia, where he studied modern shipbuilding, military strategies, science, and administrative systems.

  • In Holland, he worked at shipyards to learn shipbuilding techniques.
  • In England, he studied modern armies and navies.
  • In Austria and Prussia, he analyzed political administration and industrialization.

During this trip, he successfully recruited foreign engineers, scientists, and technicians to bring back to Russia. However, during his absence, his own army in Moscow rebelled, forcing him to return hastily and accelerate his reform program.

2- Suppression of Revolts and Military Modernization

While Peter was abroad, the Streltsy (Tsar’s elite guards) revolted.

  • On his return, he crushed the rebellion brutally—thousands of soldiers were executed, and their families were exiled.
  • He dismantled the old army and built a new, disciplined, and modern military with new recruits and professional officers.
  • He established Russia’s first navy, which later played a key role in his expansionist ambitions.

3- Control Over the Church and Religious Reforms

The Russian Orthodox Church was extremely powerful and beyond the Tsar’s control.

  • In 1700, after the death of the Patriarch, Peter did not appoint a successor.
  • Instead, he placed the Church under state control and, in 1721, created the ‘Holy Synod,’ an institution to oversee church administration.
  • While he allowed limited religious tolerance, the Church was completely subordinated to the monarchy.

4- Administrative Reforms and Centralization of Power

Peter was inspired by Louis XIV of France and introduced authoritarian rule in Russia.

  • He abolished the Russian parliament (Duma) and established a loyal bureaucracy under direct royal control.
  • Russia was divided into 8 provinces and 50 districts for efficient administration.
  • He created a new nobility (nobles of service), who were entirely dependent on the Tsar’s favor.

5- Westernization and Social Reforms

Peter aimed to transform Russia into a Western-style nation.

  • He banned long beards and imposed a tax on those who refused to shave.
  • Western-style clothing was made mandatory.
  • Women were encouraged to step out of seclusion and participate in society.
  • Tobacco consumption was made compulsory, as it was considered a symbol of European modernity.
  • French customs were introduced in the royal court, and cultural life was reshaped on Western models.

6- Economic and Industrial Reforms

Russia’s economy was predominantly agrarian, but Peter promoted industry and trade.

  • The government established state-controlled industries in iron, metallurgy, arms production, and shipbuilding.
  • Banking systems and trade regulations were introduced.
  • A bourgeois (middle) class emerged, bringing economic dynamism to Russia.

7- Development of Education and Science

Peter realized that modernization was impossible without education.

  • Schools and universities were established for the upper classes.
  • Foreign languages (especially French) became compulsory.
  • Russia’s first Academy of Sciences was founded.
  • The first Russian newspaper was published.
  • Scientific and technical education was promoted, enabling Russia’s entry into the modern age.

8-Founding of St. Petersburg – Russia’s New Capital

Peter disliked Moscow, as it represented old Russia.

  • He built a new capital, St. Petersburg, on the banks of the Neva River near the Baltic Sea.
  • St. Petersburg was called "Russia’s Window to the West" as it became a hub of European trade and culture.

Conclusion

Peter the Great remains one of the most influential rulers in Russian history. His policies transformed Russia into a European power.
His two key policies were:
  1. Establishing an absolute monarchy
  1. Westernization of Russian society
While absolute monarchy eventually became obsolete, his Westernization reforms succeeded in modernizing Russia. Modern Russia stands on the foundation laid by Peter the Great.

पीटर द ग्रेट (1682-1725): रूस का आधुनिक निर्माता


पीटर प्रथम, जिसे पीटर द ग्रेट के नाम से जाना जाता है, मिखाइल रोमानोव का पोता था। उसे "आधुनिक रूस का पिता" कहा जाता है, क्योंकि उसने रूसी इतिहास में एक नए युग की नींव रखी। उसने राजशाही की केंद्रीकरण नीति, सैन्य सुधार, पश्चिमीकरण, धार्मिक नियंत्रण और विस्तारवादी विदेश नीति के ज़रिए रूस को एक मज़बूत और आधुनिक राज्य में बदल दिया।

रूस की स्थिति एवं चुनौतियाँ

जब पीटर रूस की गद्दी पर बैठा, तो रूस भौगोलिक दृष्टि से यूरोपीय था, लेकिन उसकी संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन और सोचने का तरीका पूरी तरह से एशियाई देशों की तरह था। पश्चिमी यूरोप से उसका ईसाई धर्म के नाम पर संबंध तो था, लेकिन रूसी ईसाई धर्म (ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च) स्थानीय प्रभाव में संकीर्ण हो चुका था।

रूस की सीमाएँ विस्तृत तो थीं, लेकिन चारों तरफ से बंद जैसी थीं:

  • उत्तर में – 9 महीने बर्फ़ जमी रहती थी।
  • दक्षिण मेंतुर्की और फारस के कारण मार्ग अवरुद्ध थे।
  • पूर्व मेंघने जंगल थे, जिनसे उपयोगी रास्ते नहीं निकल सकते थे।
  • पश्चिम मेंपोलैंड और स्वीडन के महत्वाकांक्षी शासक रूस पर नजर गड़ाए रहते थे।

धार्मिक प्रधान (पैट्रिआर्क) केवल चर्च ही नहीं, बल्कि रूसी जीवन के हर क्षेत्र पर प्रभाव रखते थे। जार के अंगरक्षक (Streltsy) और सामंतों (Boyars) की सभा राजनीति के आधार स्तंभ थे। ऐसी स्थिति में रूस एक पिछड़ा हुआ, सीमित, दकियानूसी और जड़ समाज था।

सुधार के लिए पीटर की दृष्टि

पीटर ऐसी परिस्थितियों को बदलने के लिए उत्सुक था। उसने निर्णय लिया कि रूस का कल्याण उसके पाश्चात्यकरण (Westernization) में है। उसने यूरोप के देशों के साथ रूस के निकटतम संबंध स्थापित करने का संकल्प लिया।

रूस की बंद सीमाओं को खोलने के लिए उसने रूस की सीमाओं को पश्चिम में बाल्टिक सागर और दक्षिण में काला सागर तक विस्तारित करने की आवश्यकता समझी। इसी नीति को "गर्म पानी की तलाश" (Warm Water Policy) कहा जाता है, जिसका अर्थ था ऐसे समुद्री मार्ग, जहाँ बर्फ न जमती हो और जो पूरे साल उपयोग किए जा सकें।

इसके अलावा, वह समझता था कि जब तक शक्तिशाली और निरंकुश राजतंत्र की स्थापना नहीं होगी, यह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। वह जीवनभर इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में लगा रहा और उसे सफलता भी मिली।

                 पीटर की गृह नीति : रूस के पुनर्निर्माण की योजना

यूरोप की गुप्त यात्रा (1697-98)

रूस के आधुनिकीकरण से पहले, पीटर ने यूरोप की गुप्त यात्रा की। वह हॉलैंड, इंग्लैंड, और प्रशा गया, जहाँ उसने आधुनिक जहाज निर्माण, सैन्य रणनीतियाँ, विज्ञान और प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन किया। हॉलैंड में उसने जहाज निर्माण की कला सीखी। इंग्लैंड में उसने आधुनिक सेना और नौसेना का महत्व समझा। ऑस्ट्रिया और प्रशा में राजनीतिक प्रशासन और औद्योगीकरण का गहन अध्ययन किया। यात्रा के दौरान वह विदेशी इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, और तकनीशियनों को रूस लाने में सफल हुआ। हालांकि, इसी दौरान रूस में उसकी सेना ने विद्रोह कर दिया, जिससे वह जल्दबाज़ी में वापस लौटा और सुधारों की प्रक्रिया शुरू की।

विद्रोह का दमन और शक्तिशाली सेना का निर्माण

जब वह यूरोप में था, तो रूस की शाही सेना (स्ट्रेलत्सी) ने विद्रोह कर दिया। लौटते ही उसने कड़ा दमन किया—हज़ारों सैनिकों को मौत की सजा दी गई और उनके परिवारों को निर्वासित किया गया। उसने पुरानी सेना को हटाकर एक नई, अनुशासित और आधुनिक सेना बनाई, जिसमें नए रंगरूटों और पेशेवर अधिकारियों को शामिल किया गया। रूस की पहली नौसेना का गठन किया गया, जो आगे चलकर रूस के विस्तारवादी सपनों को साकार करने में मददगार साबित हुई।

चर्च पर नियंत्रण और धार्मिक सुधार

रूस का चर्च अत्यधिक शक्तिशाली था और शासक के नियंत्रण से बाहर था। 1700 में, जब पैट्रिआर्क की मृत्यु हुई, तो पीटर ने नए पैट्रिआर्क की नियुक्ति नहीं की। चर्च का नियंत्रण राजा के हाथ में चला गया और 1721 में 'होली सिनोड' नामक संस्था बनाई गई, जो चर्च का प्रशासन देखती थी। धार्मिक स्वतंत्रता की थोड़ी छूट दी गई, लेकिन चर्च को पूरी तरह से राजशाही के अधीन कर दिया गया।

प्रशासनिक सुधार और केंद्रीकरण

पीटर फ्रांस के राजा लुई XIV से प्रभावित था और उसने रूस में सत्तावादी शासन लागू किया। संसद (Duma) समाप्त कर दी गई और राजा के प्रति वफादार नौकरशाही की स्थापना की गई। रूस को 8 प्रांतों और 50 जिलों में बाँटा गया, जिससे प्रशासन अधिक कुशल हुआ। नए अभिजात वर्ग (nobility) को जन्म दिया, जो पूरी तरह से शाही सत्ता पर निर्भर था।

 पश्चिमी करण (Westernization) और सामाजिक सुधार

पीटर रूस को पश्चिमी यूरोप जैसा बनाना चाहता था, इसलिए उसने सामाजिक सुधार लागू किए: लंबी दाढ़ी पर प्रतिबंध लगाया और जो इसका उल्लंघन करता, उसे कर (tax) देना पड़ता। पश्चिमी शैली के कपड़े अनिवार्य किए गए। महिलाओं को घरों की चहारदीवारी से निकालकर समाज में भाग लेने की अनुमति दी गई। तंबाकू के सेवन को अनिवार्य किया, जो यूरोपीय संस्कृति का प्रतीक माना जाता था। शाही दरबार में फ्रांसीसी रीति-रिवाजों को अपनाया गया और सांस्कृतिक जीवन को पश्चिमी ढंग से ढाला गया।

आर्थिक और औद्योगिक सुधार

रूस की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी, लेकिन पीटर ने उद्योग और व्यापार को बढ़ावा दिया। सरकारी नियंत्रण में उद्योग स्थापित किए गए—लोहे, धातु, हथियार निर्माण और जहाज निर्माण को बढ़ावा दिया गया। रूस में बैंकिंग प्रणाली और व्यापारिक करों को लागू किया गया। मध्यवर्ग (bourgeoisie) को बढ़ावा दिया गया, जिससे रूस में नवीन आर्थिक चेतना आई।

शिक्षा और विज्ञान का विकास

पीटर को समझ में आया कि शिक्षा के बिना आधुनिकीकरण संभव नहीं। उच्च वर्गों के लिए स्कूल और विश्वविद्यालय स्थापित किए गए। विदेशी भाषाओं (खासतौर पर फ्रेंच) को अनिवार्य किया गया। रूस की पहली विज्ञान अकादमी (Academy of Sciences) और पहला समाचार पत्र शुरू किया गया। तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा पर जोर दिया गया, जिससे रूस आधुनिक युग में प्रवेश कर सका।

नई राजधानी 'सेंट पीटर्सबर्ग' की स्थापना

पीटर ने मास्को को नापसंद किया क्योंकि यह पुराने रूस का प्रतीक था। उसने बाल्टिक सागर के किनारे नेवा नदी के तट पर सेंट पीटर्सबर्ग नामक नई राजधानी बसाई। इसे "पश्चिम की खिड़की" (Window to the West) कहा गया, क्योंकि यह यूरोपीय संस्कृति और व्यापार का केंद्र बना।

निष्कर्ष

पीटर द ग्रेट रूस के सबसे प्रभावशाली शासकों में से एक था। उसकी नीतियों ने रूस को यूरोपीय ताकतों की श्रेणी में खड़ा कर दिया। पीटर द ग्रेट की दो मुख्य नीतियाँ थीं – निरंकुश राजतंत्र की स्थापना और पश्चिमीकरण। पहला उद्देश्य समय के साथ प्रतिगामी साबित हुआ, लेकिन दूसरा रूस को आधुनिक बनाने में सफल रहा। आज का आधुनिक रूस पीटर द ग्रेट की नीतियों की नींव पर खड़ा है।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

जहांगीर की दक्कन नीति

 

                          

जहांगीर को दक्षिण के राज्यों के साथ संबंधों तथा दक्षिण नीति को आगे बढ़ाने की परिस्थिति विरासत में मिली थी। जहांगीर द्वारा दक्षिण में प्रवेश के कारण लगभग वही थे जिनसे मुगल सम्राट अकबर प्रेरित हुआ था। साम्राज्य की प्रकृति, आर्थिक कारण एवं राजनीतिक एकीकरण इसका प्रमुख कारण था। अपने पिता की तरह जहांगीर भी दक्षिण भारत की विजय के लिए समर्पित था ताकि देश में राजनीतिक एकता स्थापित हो सके। इस प्रकार यह अकबर की नीति की निरंतरता थी जिसमें दक्षिण के समस्त क्षेत्रीय राज्यों से आक्रामक युद्ध की कल्पना की गई थी। मुगल सम्राट जहांगीर और दक्षिण के राज्यों के साथ उसके संबंध को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है जहाँ ज्यादातर समय में संघर्ष के दो मोर्चे थे – एक शत्रु के विरुद्ध तथा दूसरा मुगलों की सेना के अन्दर।

प्रथम चरण (1605 से 1616) : मलिक अंबर का प्रतिरोध

प्रथम चरण में 1605 से 1616 ईसवी तक की अवधि को लिया जा सकता है। इस समय दक्षिण में अहमदनगर सल्तनत का अमीर मलिक अंबर मुगल सम्राट अकबर के नियंत्रण में गए अहमदनगर राज्य के क्षेत्रों को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहा। 1608 में जहाँगीर ने अब्दुल रहीम खाने खाना को दकन की कमान सौंपी। खाने खाना ने यह यह घोषणा की कि वह दो साल के अन्दर न केवल अम्बर के हाथों में चले गए प्रदेशों को वापस लेगा, बल्कि वह बीजापुर को भी शाही साम्राज्य का हिस्सा बना देगा। इस धमकी से घबरा कर मलिक अम्बर ने बीजापुर के आदिल शाह से मदद की अपील की। तथा यह दलील दी की सभी दृष्टियों से दोनों राज्य एक हैं। बीजापुर के समर्थन और मराठों के सक्रिय सहायता से लैस अम्बर ने खान-ए-खाना को बुरहानपुर तक हट जाने के लिए मजबूर कर दिया। अब 1610 में शहजादा परवेज के बाद खान-ए-जहाँ लोदी को आजमाया गया परन्तु वह भी अम्बर की चुनौती का सामना नहीं कर पाया। इधर मलिक अंबर धीरे-धीरे उद्धत होता चला गया और उसने अपने मित्रों को नाराज़ कर लिया। खान-ए-खाना, जिसे फिर से दक्कन में मुगल प्रतिनिधि नियुक्त किया गया था, इस स्थिति से लाभ उठाकर बहुत-से हब्शियों और मराठा सरदारों को जैसे जगदेव राय, बाबाजी काटे, उदाजी राम आदि को अपने पक्ष में मिला लेने में कामयाब हो गया। मराठा सरदारों की मदद से खान-ए-खाना ने 1616 ई में, अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा की संयुक्त सेना को गहरी शिकस्त दी

दूसरा चरण (1617 से 1620) : जब खुर्रम शाहजहाँ बना

दूसरा चरण 1617 से 1620 ईसवी के मध्य रख सकते हैं जब विजय को पक्का करने के लिए मुगल शहजादा खुर्रम को दक्षिण अभियान का नेतृत्व दिया गया। इस अवधि में मुगलों द्वारा बीजापुर राज्य के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह को अन्य दो राज्यों के सुल्तानों अहमदनगर तथा गोलकुंडा की अपेक्षा प्राथमिकता देकर दक्षिण की स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। जहाँगीर ने आदिलशाह को फरजंद अथवा पुत्र की उपाधि दी। वास्तव में बीजापुर और अहमदनगर के गठबंधन को तोड़कर मुगल सम्राट जहांगीर अहमदनगर को अकेला कर देना चाहता था। इससे मुगल सेना ने सुगमता से अहमदनगर पर अधिकार स्थापित कर लिया।

12 अक्तूबर, सन 1617 को खुर्रम पाये हुए अपार भेंट के साथ मांडू के शाही डेरे में पहुंचा जहाँ भेंटो की कीमत 22 लाख 60 हज़ार रुपये आंकी गई। जहाँगीर लिखता है कि “सजदा और पाबोश के बाद मैंने शहजादे को झरोखे में बुलाया तथा प्रसन्नता और अनुग्रह के साथ उठकर उसका प्रेमपूर्वक आलिंगन किया।.....उसको 30 हजार का मंसब दिया जो अभूतपूर्व था तथा शाहजहाँ की उपाधि से सम्मानित किया”।

तृतीय चरण (1621 से 1627) : मुग़ल दरबार में सत्ता संघर्ष

मुगल सम्राट जहांगीर के साथ दक्षिण के राज्यों के संबंध का तृतीय चरण 1621 से 1627 ईस्वी तक चलता रहा। दो वर्षों के भीतर ही मलिक अंबर मुगल एवं बीजापुर राज्य के क्षेत्रों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहा। मलिक अंबर बीजापुर की राजधानी तक पहुँच गया। उसने इब्राहीम आदिलशाह द्वारा बनवाई नई राजधानी नौरसपुर को जला डाला और शाह को भाग कर किले में शरण लेने को मजबूर कर दिया। इसे अंबर की शक्ति की पराकाष्ठा माना जा सकता है। अतः शाहजहाँ ने दूसरी बार दक्कन सैन्य अभियान की कमान इस शर्त पर संभाली कि अपने बड़े भाई राजकुमार खुसरो को अपनी व्यक्तिगत हिरासत में रखने दिया जाए। अंबर के विरुद्ध अपने सैन्य अभियान को वह अभी अंजाम दे ही रहता कि उसे बुरहानपुर में नूरजहाँ के राजनैतिक षड़यंत्र की गुप्त सूचना प्राप्त हुई। दरअसल नूरजहाँ अपने दामाद शहरयार को उत्तराधिकारी के लिए आगे बढ़ाना चाह रही थी। सशंकित शाहजहाँ ने मलिक अंबर तथा उसके सहयोगियों के साथ आसान शर्तों पर संधि स्थापित कर ली। अहमदनगर बीजापुर तथा गोलकुंडा के सुल्तानों ने क्रमशः बारह, अठारह और बीस लाख रुपये दिए तथा ताज में अपनी अधीनता को स्वीकार कर लिया। शाहजहाँ अपने कैदी भाई खुसरो को निपटा कर सेना के साथ उत्तर की तरफ बढ़ गया। मौका मिलते ही अंबर ने विद्रोह का लाभ उठाया। हालाँकि अब वह वृद्ध हो गया था तथा 1626 में 80 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई।

इस प्रकार जहांगीर के शासनकाल में दक्षिण के साथ मुगल संबंध का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर के समय से अधिक स्थलीय सीमा में विस्तार नहीं हुआ। किंतु अहमदनगर के हब्शी अमीर मलिक अंबर के प्रबल विरोध के उपरांत भी मुगल खानदेश, अहमदनगर क्षेत्र पर अपना वर्चस्व बनाए रहे। यद्यपि मुगल सम्राट जहांगीर ने दक्षिण में कोई विशेष उपलब्धि नहीं प्राप्त की परंतु इतना अवश्य रहा कि उसके शासनकाल में पूर्व में स्थापित दक्षिण में मुगल सीमाएं यथावत बनी रहीं

                                      मलिक अंबर

एक अनजान आरंभिक जीवन वाला इथियोपिया का हब्शी दास संभावनाओं से भरे दकन में आ पहुंचा। अहमदनगर के पतन के बाद मलिक अंबर ने एक निजामशाही शाहजादे को ढूंढ़ निकाला और बीजापुर के मूक समर्थन से उसे द्वितीय मुर्तजा निजामशाह के नाम से अहमदनगर की गद्दी पर बैठा दिया तथा खुद उसका पेशवा बन गया। उसने निष्काषित सिपाहियों, अफगान लड़ाकों, हब्शियों तथा मराठा बारगीरों का झुण्ड तैयार कर लिया। छापामार युद्ध प्रणाली जिसे बर्जागिरी या बर्गागिरी कहा जाता था, से जिसके मुग़ल अभ्यस्त नहीं थे, उसने मुगलों का जीना हराम कर दिया। इसने बरार, अहमदनगर और बालाघाट में अपनी स्थिति मजबूत कर ली।

एक समकालीन मुग़ल इतिहासकार मुहम्मद खां के अनुसार युद्ध कला, सैन्य सञ्चालन, सही निर्णय और प्रशासन में उसका कोई स्पर्शी नहीं था। वह दकनी स्वतंत्रता का पराक्रमी योद्धा था। मलिक अंबर ने भूराजस्व की टोडरमल वाली प्रणाली आरंभ करके निज़ामशाही के प्रशासन में सुधार करने की कोशिश की। उसने ठेके (इजारे) पर जमीन देने की पुरानी प्रथा को समाप्त कर दिया क्योंकि वह किसानों के लिए तबाही का कारण थी। उसने कृषि सम्बंधित समस्याओं को दूर कर कृषि का विस्तार किया। उसने स्थानीय कानून व्यवस्था पर जोर दिया।

पीटर महान की विदेश नीति

17 वीं और 18 वीं सदी का यूरोप निरंतर युद्ध , क्षेत्रीय संघर्ष और शक्ति संतुलन की राजनीति से भरा हुआ था। इसी संदर्भ में रूस के महान सुधारक और...