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मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

शेरशाह का भू-राजस्व सुधार

शेरशाह का भूराजस्व-सुधार उसकी प्रतिभा का स्थायी स्मारक है। शेर शाह ने बिहार में अपने पिता की जागीर में राजस्व प्रणाली के कामकाज को देखा था इसलिए उसे इस व्यवस्था की कमियों का ज्ञान था। अपने राज्याभिषेक पर उस प्रणाली की शुरुआत की जिसपर उसने सासाराम और खवासपुर टांडा में विस्तार से काम किया था। उसके भूराजस्व सुधार के अवयव इस प्रकार थे—

1.     खेतों की पैमाइश

शेरशाह ने मालगुजारी को खेतों की पैमाइश के आधार पर निर्धारित किया। उसने अहमद खाँ के निरीक्षण में राज्य की कृषि योग्य भूमि की पैमाइश कराई। सम्भवतः मुल्तान सूबे में पैमाइश नहीं कराई गई थी क्योंकि यह सीमावर्ती क्षेत्र था और सुरक्षा कारणों से शेरशाह ने इस क्षेत्र को छोड़ दिया था।

2.    पैमाइश की नई प्रणाली

शेरशाह ने सम्पूर्ण राज्य में भूमि की पैमाइश के लिये एक ही नाप की जरीब का प्रयोग किया। यह जरीब गज-ए-सिकन्दरी पर आधारित थी जो 32 इकाइयों की थी जरीब में 60 गज थे। एक जरीब को बीघा (60 x 60) कहा जाता था। उसने कुशल राजस्व अधिकारियों को पुरस्कृत करने के नियम भी बनाये।

3.    भूमि का तीन श्रेणियों में विभाजन

शेरशाह ने मालगुजारी के निर्धारण के लिये भूमि को तीन श्रेणियों में विभाजित किया—उत्तम, मध्यम और निकृष्ट। इन तीनों श्रेणियों के उत्पादन का औसत निकाला गया और उसका 1/3 भाग मालगुजारी के रूप में निश्चित कर दिया गया। इसके लिये शेरशाह ने ‘रई’ या फसल दरों की सूची बनवायी। इसी के आधार पर विभिन्न फसलों के लिये मालगुजारी निश्चित की गई। यह इतना महत्वपूर्ण कार्य था कि अकबर ने भी शेरशाह की ‘रई’ को स्वीकार किया था।

4.    मालगुजारी का नकदीकरण

किसानों को सुविधानुसार जिंस या नकद अदायगी की छूट थी हालाँकि सरकार को नकद अदायगी ज्यादा पसंद थी। शेरशाह ने जहाँ तक सम्भव हुआ मालगुजारी को नकदी के रूप में अदा करने के लिये कृषकों को प्रोत्साहित किया। नष्ट होने वाले उत्पाद जैसे तरकारी आदि पर मालगुजारी केवल नकदी में ही ली जाती थी।

5.    भूमि का पट्टा तथा कबूलियत

शेरशाह ने कृषकों को भूमि का पट्टा दिया जिसमें भूमि का क्षेत्रफल, स्थिति, प्रकार और मालगुजारी दर्ज रहती थी। उसने मालगुजारी की कबूलियत भी किसानों से प्राप्त की। उसका सिद्धान्त था कि मालगुजारी निर्धारित करते समय कृषकों से उदारता का व्यवहार किया जाये लेकिन संग्रह में उदारता न की जाये।

6.    जरीबाना तथा महासिलाना कर

शेरशाह ने राजस्व अधिकारियों के भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये शुल्क निश्चित कर दिये। ‘जरीबाना’ अर्थात् भूमि की पैमाइश का शुल्क और ‘महासिलाना’ अर्थात् कर-संग्रहक का शुल्क किसान को देना पड़ता था जो कुल उत्पादन का 2.5% से 5% तक होता था। कोई भी राजस्व अधिकारी इसके अलावा किसी भी प्रकार का कोई अनुलाभ किसान से नहीं ले सकता था।

7.    खेती की सुरक्षा

शेरशाह ने खेती की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा। अब्बास खाँ लिखता है कि सेना को विशेष आदेश था कि वह खेतों को हानि न पहुँचायें। अगर कोई सैनिक खेतों को हानि पहुँचाता था तो शेरशाह दोषी सैनिक को कठोर दण्ड देता था और कृषक की क्षतिपूर्ति की जाती थी।

8.    आपदा के समय सुरक्षा के उपाय

शेरशाह ने कृषकों की सुरक्षा के लिये भी कार्य किया। कुल मालगुजारी के ऊपर वह कृषकों से 2.5% अतिरिक्त कर लेता था। इसे अनाज के रूप में ही लिया जाता था और इस अनाज को गोदामों में सुरक्षित रखा जाता था जिससे प्राकृतिक आपदा के समय कृषकों को इससे सहायता प्रदान की जा सके।

दोष

लेकिन इस व्यवस्था में कई दोष भी थे—औसत उत्पादन की प्रक्रिया दोषपूर्ण थी और मध्यम तथा निम्न भूमियों पर कर-भार अधिक था। मालगुजारी के अलावा जरीबाना, ‘महासिलाना’ आदि कर देने से कृषक पर कर-भार बढ़ गया था। वार्षिक बन्दोस्त होने से कृषकों को असुविधा होती थी। विभिन्न मण्डियों में अनाज के मूल्यों में अन्तर होने से भी कृषक को हानि होती थी। सारी सावधानी करने के बाद भी शेरशाह राजस्व विभाग से भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं कर पाया जागीरदारी प्रथा अभी भी प्रचलित थी अतः जागीर क्षेत्रों के कृषकों को राजस्व सुधार का लाभ प्राप्त नहीं था।

बुधवार, 30 नवंबर 2022

मध्यकालीन भारत में व्यापार

मध्यकालीन भारत में व्यापार में वृद्धि के कारण

1.    दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद आर्थिक गतिविधियों का उत्तेजित होना, आर्थिक संस्थाओं  की स्थापना, कारोबारी कामकाज में वृद्धि

2.    गैरकृषि जनसंख्या में वृद्धि

3.    कृषि अधिशेष

4.    नगद कर

5.    राजगामिता कानून

6.    दरिद्र और निर्भर समूहों की उपस्थिति, पश्चिम से संपर्क 

             मध्यकालीन भारत में आंतरिक व्यापार

व्यापार मार्ग

सड़क मार्ग से व्यापार बैलगाड़ी, ऊंट तथा खच्चर के काफिलों के माध्यम से होता था। नदी के रास्ते व्यापार सस्ता पड़ता था। समुद्री तटों के क्षेत्र में व्यापार बंदरगाहों के माध्यम से होता था। दिल्ली, आगरा, लाहौर तथा मुल्तान सड़क मार्ग पर थे। मार्गों में मार्ग सूचक अटारिया होती थीं। शेरशाह सूरी ने चार प्रमुख सड़कों की मरम्मत करवाई। इसमें बंगाल के सेनार गांव से सिंध तक जाने वाली पंद्रह सौ कोस लंबी सड़क भी थी, जिसे सड़क ए आज़म कहा जाता था। सड़कों के किनारे हर चार मील पर सराय बनवाई गई। इस समय लगभग 700 सरायों का जिक्र मिलता है। जिसकी देखभाल के लिए एक शिकदार होता था। कानूनगो ने इन्हें साम्राज्य रूपी शरीर की धमनियां कहा है। विजयनगर साम्राज्य के कृष्णदेव राय की पुस्तक अमुक्तमाल्यद शासकों के लिए एक व्यापार नीति पर जोर देती है।

प्रमुख सामानों का व्यापार

बंगाल से कोरोमण्डल, गुजरात -  चावल, चीनी, गेहूं

बंगाल, पटना से आगरा - कच्ची सिल्क, चीनी

आगरा से देश के विभिन्न क्षेत्रों में - नील, गेहूं

लाहौर से देश के विभिन्न क्षेत्रों में -  दरी

गुजरात से आगरा -  कपड़ा, नील, शोरा

केरल से देश भर में काली मिर्च

मालवा, अजमेर से गुजरात - गेंहू

पुलिकट से गुजरात, मालाबार - छपा कपड़ा

बीदर से देश भर में - कपड़ा

सिंध से देश भर में - गेंहू, जौ, सूती कपड़े

कश्मीर  से आगरा तथा अन्य जगह - शाल, ऊन, शोरा

मालाबार से विजयनगर तथा देश के अन्य भागों में - नारियल, इलायची, मोम, लोहा, खजूर, चीनी, कीमती पत्थर, काली मिर्च

     मध्यकालीन भारत में विदेश व्यापार

मध्यकालीन भारत विश्व के लिए एक निर्माण कार्यशाला का हैसियत रखता था। इस हैसियत का कारण था - उत्पादनशील कृषि, सिंचाई और कृषि सुधार, कार्यकुशल शिल्पी, उत्पादन की मजबूत परंपरा तथा व्यापारियों और बैंकरों का एक विशेषज्ञता प्राप्त वर्ग। पश्चिम के संपर्क के कारण एशिया ने एक व्यापारिक क्रांति का अनुभव किया।

स्थल - व्यापार

स्थल व्यापार उत्तर-पश्चिम की तरफ होता था। मुल्तान, क्वेटा, खैबर दर्रा प्रमुख मार्ग थे। इन मार्गो से अफगानिस्तान, फारस तथा मध्य एशिया से व्यापार होता था। यहां से आयात होने वाली सामग्रियों में फल, मेवा. अंबर, हींग तथा रूबी प्रमुख थे। निर्यात होने वाली सामग्रियों में वस्त्र, कंबल, चीनी, नील, औषधियां तथा जड़ी बूटियां प्रमुख थी। मंगोल आक्रमण के कारण इस व्यापार में बाधा पड़ी।

समुंद्री व्यापार

पश्चिमी तट

पश्चिमी तट पर स्थित गुजरात के प्रमुख बंदरगाह भड़ौच, काम्बे तथा खंभात थे। पश्चिम में यह फारस की खाड़ी में स्थित बसरा और हरमुज से और लाल सागर में स्थित अदन से जुड़े थे। पूर्व में यह मलक्का, इंडोनेशिया में बेथेम और अचिन से जुड़े थे। युरोपीय यात्री टॉम पायस का कहना था कि खंभात अपने दोनों हाथ फैलाता है वह अपने दाहिने हाथ से अदन पहुंचता है तथा बाएं हाथ से मलक्का पहुंचता है। पश्चिमी तट के अन्य बंदरगाह कालीकट, गोआ, होनावर, लहरी बंदर तथा सूरत थे।

पूर्वी तट

पूर्वी तट के प्रमुख बंदरगाहों में चटगांव, सतगांव, सोनारगांव, ढाका, मसूलीपट्टनम इत्यादि प्रमुख बंदरगाह थे। इन बंदरगाहों से पश्चिम में अदन होते हुए दमिश्क, सिकंदरिया, अफ्रीका फिर यूरोप से व्यापार होता था तथा पूरब में चीन, इंडोनेशिया तथा मलाया से व्यापार होता था।

निर्यात

सल्तनत काल में अनाज और सूती वस्त्र प्रमुख निर्यात सामग्री थी। दरअसल फारस की खाड़ी के कुछ क्षेत्र अपनी खाद्य आवश्यकताओं के लिए। पूर्णतया भारत पर निर्भर थे। मनूची तथा बारथेमा का विवरण बताता है कि भारतीय वस्त्रों की मांग पूरे विश्व में थी तथा इसके निर्यात से भारतीयों को मुनाफा होता था। पश्चिम से संपर्क के बाद भारतीय वस्त्रों के निर्यात में वृद्धि हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जहां 1664 में 750000 थान कपड़े का निर्यात किया वहीं 1764 में 1500000 थान कपड़े का निर्यात किया। इसके अतिरिक्त निर्यात सामग्री में दास, नील, तंबाकू, तिलहन, चीनी, चावल, लौंग, नारियल, शोरा, काली मिर्च, हाथी दांत, कागज, आभूषण, पान, सुपारी प्रमुख थे।

आयात

सल्तनत काल के आयातों की सूची भी लम्बी है। विदेशों से भारत में घोड़े, अस्त्र-शस्त्र, दास दासियाँ, कुछ विशेष प्रकार के वस्त्र, मेवे तथा फल लाए जाते थे। ताँबा, चॉदी सोना, तूतिया, ऊँट, खजूर, शीशा आदि का भी आयात किया जाता था । अभिजात्य वर्ग की विलास सामग्री जैसे रेशम, मखमल, कसीदा कारी वाले परदे आयात में शामिल थे। के०एम० अशरफ ने लिखा है कि 'जरी और रेशम की वस्तुएं सुल्तान मुहम्मद तुगलक के समय अंशतः सिकन्दरिया, ईराक और चीन से आयात की जाती थीं। घोड़ों का आयात बड़ी संख्या में होता था। धोफर, होरमुज, अदन और फारस से अच्छी नस्ल के घोड़े लाए जाते थे। खच्चर भी लाए जाते थे। दिल्ली में विदेशी घोड़ों का अच्छा बाजार था। अजक के लोग छः हजार घोड़ों का झुण्ड एक बार में लाते थे। सत्रहवीं शताब्दी से भारत में यूरोपीय व्यापारियों की संख्या बढ़ने लगी। अभिजात्य वर्ग की विलासिता की विदेशों से आयात में वृद्धि होने लगी। भूटान से कस्तूरी और याक के बाल आते थे।

व्यापारिक वर्ग

भारत के विदेश व्यापार में कई व्यापारिक वर्गो की भूमिका थी। अरब के मूर व्यापारी, विदेशी वर्ग में प्रमुख वर्ग थे। देशी वर्ग में मुल्तानी, गुजराती, राजपूताना के बन्जारे या कारवाँ व्यापारी और दक्षिण भारत के शेट्टी प्रमुख वर्ग थे। इनमें से कुछ तो बहुत धनी थे। निकोली कोण्टी ने (1419–1444) ने एक ऐसे व्यापारी का उल्लेख किया है जिसके पास चालीस जहाजें थी। सत्रहवीं शताब्दी में सूरत के एक धनी व्यापारी वीर जी वोहरा थे। इसी तरह अहमदाबाद के शान्ती दास जवाहरी, मालाबार के हाजी सैय्यद बेग, मनोहरदास और मलय शेट्टी धनी व्यापारी थे। गुजरात और मालाबार के क्षेत्र में व्यापार कार्य मुख्यतः मालाबारी व्यापारियों के हाथ में था।

यूरोपीय हस्तक्षेप

विदेशी व्यापार के संरक्षण के लिए शासकों ने नौ सैनिक कमजोरी के कारण कुछ नहीं किया। पुर्तगालियों के आगमन ने भारतीय मुक्त व्यापार में खलल डाल दिया इसका साधन बना आर्मेडा- कार्टेज व्यवस्था। समुद्री डकैतियों की संख्या बढ़ती गई। उदाहरण के लिए 1695 में सूरत के व्यापारी अब्दुल गफूर का व्यापारिक जहाज फ़तेह मुहम्मदी को लूट किया गया यही नहीं बल्कि औरंगजेब के जहाज गंज-ए-सवाई को भी लूटा गया। एक अंग्रेज अधिकारी सर जोसुआ चाइल्ड ने 1680 में लिखा कि “राजस्व के बिना हम हमेशा व्यापारी बने रहेंगे और हमें कभी भी निकाला जा सकेगा”। बाद में जार्ज ओक्सेडन ने लिखा “अब समय का तकाज़ा है कि आप अपने हाथ में तलवार लेकर व्यापार का प्रबंध करें”। दरअसल 1740 के बाद अंग्रेजों ने भारतीय व्यापारियों के विरुद्ध अनुचित तरीकों का प्रयोग शुरू कर दिया था तथा बुनकरों को अपना माल सस्ते में बेचने के लिए मजबूर करने लगे थे। इस प्रकार यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियाँ देश विजय का साधन बन गईं।

सोमवार, 21 नवंबर 2022

मध्यकालीन भारत में उद्योग

मध्यकालीन भारत में उद्योगों के लिए शासकों की ओर से कोई ठोस नीति नहीं थी। असंगठित क्षेत्र इसे चलाते रहे। परंपरागत औद्योगिक दक्षता, जातिगत उद्योग तथा कुटीर उद्योग मध्यकालीन उद्योगों की प्रमुख विशेषतायें थे। कई बातों ने उद्योगों को बढावा दिया।

1.    भारत का पश्चिमी तथा मध्य एशिया के साथ व्यापार बढ़ा। वह कुछ समय के पश्चात् यूरोप तक पहुँचा। निर्यात की वस्तुओं के उद्योग चमक उठे।

2.    नगरीकरण में वृद्धि हुई इससे देशी उपभोक्ताओं की संख्या में और मांग में वृद्धि हुई।

3.    छोटे-छोटे राज्यों का अन्त होने लगा। केन्द्रकृत सशक्त निरंकुश शासन में सड़कें सरायें अधिक सुरक्षित हो गई दूर-दूर तक के उद्योग धन्धों का माल बिकने लगा। धीरे-धीरे बड़े बड़े नगरों में निजी क्षेत्र के बड़े बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान उदित होने लगे

4.    यह काल बन्दरगाहों वाले शहरों के औद्योगिक उत्थान के लिए भी जाना जाता है।

पारम्परिक उत्पादन प्रणाली होते हुए भी भारत ने वस्त्र, मसाले एवं जड़ी बूटियों के व्यापार में इतना धन कमाया कि व्यापार का सन्तुलन भारत के पक्ष में ही रहा। उत्पादन के कई प्रमुख केन्द्र प्रसिद्ध थे। कुछ नगर किसी विशेष उत्पादन के लिए अधिक प्रसिद्ध थे। वस्त्र, धातु निर्मित बर्तन एवं हथियार, औजार, आभूषण, पत्थर उद्योग, चीनी, नील, कागज इत्यादि प्रमुख उद्योग थे। कुटीर उद्योग इनके अलावा अनेकों अन्य उत्पादन भी करते थे जैसे लकड़ी के सामान मिट्टी के समान चमड़े के सामान इत्यादि।

1.    वस्त्र उद्योग

वस्त्र उद्योग मध्यकालीन भारत का सबसे बड़ा उद्योग था । वस्त्र का निर्यात भी अधिक था। नई तकनिकी और प्रयोग से से इस उद्योग में सुधार हुआ।

1.    चरखा : चौदहवीं शताब्दी के इतिहासकार ईसामी ने चरखा का उल्लेख किया है। तकली से काते गए सूत का छः गुना चरखे से काता जाने लगा।

2.    धुनिया की कमान : रूई धुनने की कमान भी मुसलमानों के साथ ही भारत वर्ष में आयी। इसके पहले रूई को रेशेदार बनाने के लिए डंडे से धुना जाता था।

3.    करघा : बुनाई करघा से होती थी। करधा में भी सुधार हुआ।

4.    रेशम के कीड़े पालना : रेशम के कीड़े पालने का उद्योग सलतनत काल में प्रचलित हुआ। अब रेशम का उत्पादन बढ़ गया।

गुणवत्ता : वस्त्रों की रंगाई, छपाई, कढ़ाई सोने के धागों की कढाई कुछ गिने चुने बड़े बड़े नगरों में होती थी। भारतीय वस्त्रों की गुणवत्ता विश्वविख्यात थी । एडवर्ट टेरी देश के सुन्दर और गहरे रंगे हुए कपड़ो को देखकर बहुत प्रभावित हुआ था। बंगाल और गुजरात से विदेशों में इनका निर्यात किया जाता था।

सूती वस्त्र : सूती वस्त्र के प्रमुख केंद्र बंगाल, गुजरात, बनारस, उड़ीसा, मालवा, सूरत, काम्बे, पटना, बुरहानपुर थे, बाद में आगे चल कर दिल्ली, आगरा, लाहौर और मुल्तान बड़े केंद्र बन गए। महत्वपूर्ण सूती कपड़ों में छींट, बैरामी, शान-ए-बफ तथा कतने रूमी बहुत प्रसिद्ध थे। मलमल के कपड़ों में ढाका की मलमल, देवगिरी की मलमल तथा सोनारगांव की मलमल प्रसिद्ध थी। इसके आलावा बरबकाबाद का गंगाजल, बिहार बंगाल का अम्बरती, गुजरात का बाफ्ता, बंगाल का खासा, लखनऊ का दरियाबंदी तथा मरकूल प्रसिद्ध थे। केलिंको, ताफ्ता, जरतरी तथा कमीन भी कपड़ों के  प्रमुख प्रकार थे।

रेशमी वस्त्र : रेशमी वस्त्रों के प्रमुख केन्द्र भी देश के कोने कोने में फैले हुए थे। कासिम बाजार, मालदा, मुर्शिदाबाद, पटना, कश्मीर, और बनारस की विशेष पहचान रेशमी कपड़ों के लिए थी। गुजरात में रेशमी कपड़ों की बुनाई का उद्योग विस्तृत था। काम्बे की सिल्क मशहूर थी। सूरत का नाम रेशमी वस्त्र उद्योग में सर्वोपरि था। वहाँ रेशमी दरियां बनती थी। उन पर सोने और चॉदी के धागों की कसीदाकारी रहती थी। असम रेशमी कपड़ों का प्रमुख केन्द्र था। कोयम्बटूर का रेशम दक्षिण भारत में ही नहीं दूर दूर तक प्रसिद्ध था।

ऊनी वस्त्र : ऊनी वस्त्रों के प्रमुख केन्द्र काबुल, कश्मीर, पश्चिमी, राजस्थान में थे। तिब्बत का ऊन बहुत बढ़िया होता था। कश्मीर की शाल का कोई जवाब नहीं था। शाल बनाने के अन्य प्रमुख केन्द्र थे लाहोर, पटना, आगरा फतेहपुर सीकरी । उड़ीसा का तुस्सार नामक कपड़ा बहुत मशहूर था। यह देखने में रेशम जैसा था लेकिन बनता घास से था ।

रंगाई- छपाई : मध्यकाल में कपड़ों की रंगाई, छपाई के उद्योग प्रचलित थे। लाहोर से लेकर अवध तक नील का उत्पादन होता था। बयाना की नील सर्वोत्तम मानी जाती थी। गुजरात में सरखेज की नील सर्वोत्तम मानी जाती थी। गोलकुण्डा में भी नील होती थी । वस्त्रों की रंगाई-छपाई के प्रमुख केन्द्र दिल्ली, आगरा, अहमदाबाद, मसुलीपटम, ढाका, कासिम बाजार, आदि थे।

2.   धातु उद्योग

मध्यकालीन धातु उद्योग लोहा, कॉसा, चॉदी, जस्ता, माइका इत्यादि की विभिन्न वस्तुएं बनाने में कुशलता प्राप्त कर चुका था। इसका निर्यात व्यापार इसकी गुणवत्ता का स्वतः प्रमाण है। भारत निर्मित तलवारों और भालों की माँग अरब तथा फारस में भी थी। लोहे की प्राप्ति अनेक खानों से होती थी जिनका विस्तार दूर-दूर तक था। गोदावरी क्षेत्र में लोहे की खानें थी। कालिंजर, ग्वालियर, कुमायूँ क्षेत्र में लोहे की खानें थी। अजमेर क्षेत्र मे भी लोहे की खानें थीं। तलवार बनाने का उद्योग ग्यारहवीं शताब्दी में भी उन्नत था। कुछ जगहों की तलवारें प्रसिद्ध थी जैसे सोमनाथ, बनारस, आगरा और कालिंजर। मध्यकाल में तलवार बनाने के उद्योग अनेक स्थानों में स्थापित हुए। कई नए क्षेत्र इस उद्योग में प्रसिद्धि प्राप्त कर लिए जैसे लाहोर, सियालकोट, मुल्तान। गुजरात और गोलकुण्डा भी इस उद्योग में अग्रणी थे। मुगलकाल में तोप के गोले भी बनाए जाते थे। बन्दूकें भी बनती थी । तात्पर्य यह है कि सैन्य हथियारों की आवश्यकता ने लोहा, इस्पात उद्योग को बहुत बढ़ावा दिया। कृषीय आवश्कता के यन्त्र भी बनते थे। घरेलू इस्तेमाल के बर्तन व आभूषण, बनते थे। प्रशासन की टकसालें मुद्रा निर्माण करती थी। बहुमूल्य हीरे जवाहरात पर आधारित उद्योग भी थे। शीशा उद्योग भी उन्नत था। सुन्दर चूड़ियाँ, कटोरे, दर्पण, बोतल, रकाबियॉ, फूलदान, चश्मे आदि बनाये जाते थे।

3.   जहाज उद्योग

मध्यकालीन भारत में जहाज बनाने का उद्योग उत्तरोत्तर बढ़ता गया। मुगलकाल में सत्रहवी शताब्दी के आते-आते यह उद्योग भलीभाँति विकसित हो चुका था। कुछ जहाजें सौ टन या उससे भी अधिक वजन की थी। 16120 में रहीमी नामक जहाज का वजन डेढ़ सौ टन था। काम्बे, गोवा तथा दक्षिणी भारत के तटीय क्षेत्र जहाजों के आवागमन से भरे रहते थे। जहाज उद्योग के केन्द्र सूरत, गोवा, दमन, ड्यू, ढाका, चिट्टगॉग, आगरा, लाहोर, मुल्तान, इलाहाबाद इत्यादि थे।

4.   काष्ठ उद्योग

अनेक स्थानों पर काष्ठ उद्योग थे। घरेलू उपयोग के खिड़की, दरवाजे फर्नीचर खूब बनते थे। पालकी, रथ, बैलगाड़ी भी बनते थे। लकड़ी के खिलौने भी बनते थे। गाँव में इसे दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण समझा जाता था। मकानों के लिए लकड़ी की कड़ियां, दरवाजे, खिड़कियाँ इत्यादि की आपूर्ति काष्ठ उद्योग की व्यापकता पर ही निर्भर थी। मंहगी लकड़ी की कलात्मक वस्तुएँ कुछ विशेष नगरों में बनती थी ।

5.    मिट्टी उद्योग

इस वर्ग में खपड़ा उद्योग महत्वपूर्ण था । पकी हुई मिट्टी के घड़े, प्याले, मूतियाँ, खिलौने इत्यादि बनते थे। कुटीर उद्योग की तरह गाँव के कुम्भकारों के द्वारा पीढ़ियों से इस व्यवसाय को अपनाया जाता रहा है।

6.   ईंट-पत्थर उद्योग

पत्थर काटने, तराशने एवं इससे इमारतें तथा किले बनाने का कार्य मध्यकाल में अधिक हुआ। ईंट पाथने का उद्योग बहुत विस्तृत था। राजस्थान में मकराना का संगमरमर बहुत प्रसिद्ध था । लाल पत्थर के किले भी बनते थे।

7.   चर्म उद्योग

चर्म की अनेक वस्तुएं बनाई जाती थी। दिल्ली, गुजरात आदि क्षेत्रों में चमड़े की काठी, लगाम, म्यान, जूते, मशक आदि मंहगी वस्तुएं बनाने के उद्योग चलते थे। गाँव में यह ग्रामीण आवश्यकता की पूर्ति के लिए आवश्यक उद्योग था। इसे पुश्तैनी रूप से एक वर्ग विशेष अपनी आजीविका का साधन मानता था ।

8.    कागज उद्योग

चौदहवीं शताब्दी में अमीर खुसरो तथा माहुओं के साक्ष्य से यह ज्ञात होता है कि उत्तम किस्म का रेशमी जैसा चिकना कागज पेड़ की लुगदी से बनाया जाता था। दिल्ली, पटना, अहमदाबाद, कश्मीर आदि के कागज बहुत अच्छे होते थे। अच्छे कागज के कुछ नाम बड़े प्रसिद्ध थे जैसे मानसिंही, जहाँगीरी।

9.   चीनी उद्योग

चीनी, गुड़, शीरा बनाने के उद्योग थे। कृषि से कच्चा माल प्राप्त होने के कारण ग्रामीण क्षेत्र इसके मुख्य केन्द्र थे। बढ़िया चीनी पटना, बरार, लाहोर, दिल्ली, बयाना, काल्पी और आगरा में बनती थी। पटना की चीनी का निर्यात बंगाल होकर किया जाता था।

शासकीय प्रयास 

फ़िरोज तुगलक के समय शाही कारखानों का अच्छा उल्लेख मिलता है। फिरोज शाह तुगलक ने छत्तीस कारखानों को स्थापित किया था। उन पर प्रति वर्ष पचास लाख रूपया व्यय किया जाता था। दिल्ली सल्तनत काल में तुगलक काल के कारखानों का विवरण अफीफ ने भी दिया है। कारखाने दो प्रकार के थे- रातिबी और गैर- रातिबी । रातिबी कारखानों में पीलखाना, पायगाह, आबदार खाना, शराब खाना, शुतुरखाना आदि थे। इनमें निश्चित वेतन पर श्रमिक काम करते थे। उनके लिए वार्षिक अनुदान की राशि निश्चित रहती थी। गैर रातिबी कारखानों में जामदार खाना, अलमखाना, फर्राशखाना, रिकाबखाना आदि थे। इसमें श्रमिकों का वेतन निश्चित नहीं था। प्रति वर्ष नये सामानों की आवश्यकता के अनुसार गैर रातिबी कारखानों का व्यय घटता बढ़ता रहता था। प्रत्येक कारखाना एक मलिक या खान के अन्तर्गत रखा जाता था। कारखाना का यह अधिकारी मुतशर्रिफ कहलाता था। प्रधान मुतशर्रिफ सभी कारखानों के हिसाब की जॉच करता था।

बाबर ने लिखा है कि हिन्दुस्तान में सभी प्रकार की शिल्प कलाओं को जानने वाले असंख्य कारीगर हैं। प्रत्येक कार्य के लिए एक जाति है। मुगलकालीन राज्य व्यवसाय के बारे में डॉ० जे०एन० सरकार कृत 'मुगल शासन पद्धति' का यह उद्धरण उल्लेखनीय है, कि लगभग प्रत्येक वांछित वस्तु की पूर्ति के लिए मुगल शासन उत्पादक होने को विवश था। अकबर के शासन काल में राज्य द्वारा स्थापित कारखानों की वृद्धि हुई। अबुल फजल ने लिखा हैं कि, "इलाही संवत् के उनतालीसवें वर्ष में (15950) शाही महल में सौ से अधिक कार्यालय और कारखाने थे। इनमें से प्रत्येक एक शहर अथवा एक छोटे से साम्राज्य की भाँति प्रतीत होता था।" बर्नियर ने इन कारखानों को साठ वर्ष बाद देखा था।

शनिवार, 5 नवंबर 2022

मुगलकाल में केन्द्रीय प्रशासन

मुगलों के आगमन ने सुल्तानों के द्वारा चलाई गई शासन पद्धति को शीघ्र ही नहीं बदला। प्रथम मुगल बादशाह बाबर के पास पुनर्निर्माण के लिए विचार करने का समय नहीं था। शेरशाह में ऐसा सामर्थ्य था, किंतु उसका राज्यकाल बहुत संक्षिप्त था। फिर भी, उसके सुधारों ने उत्तराधिकारियों का पथ प्रदर्शन किया है।

1.    बादशाह :

उत्तर भारत में सदियों तक मुस्लिम शासन के दौरान किए गए कारनामों से प्राप्त सबक के अनुसार पुनर्निर्माण के कार्य का जिम्मा अकबर को मिला। शेरशाह ने सत्ता के अधिकारों को सम्राट के हाथों में केंद्रित करने की बात पर जोर दिया था, अकबर ने उसे अपनाया । अपने धर्मभीरु पूर्वजों की भांति अकबर ने भी यह माना कि राज्यसत्ता ईश्वरीय देन है। उसके इतिहासकार अबुल फजल का कथन है : 'बादशाहत ईश्वर की देन है और यह तब तक नहीं प्रदत्त की जाती है, जब तक कि किसी एक व्यक्ति में कई हजार उत्तम गुण एक साथ ही प्रगट न हो जाएं।' इस प्रकार बादशाह पृथ्वी पर ईश्वर की छाया के रूप में प्रशासन का शीर्षस्थ बिंदु होता था। वह समग्र सैनिक और नागरिक सत्ता का केंद्र था तथा सभी न्यायिक और कार्यपालक मामलों में अपील का उच्चतम न्यायाधिकरण था।

2.   वजीर या प्रधानमंत्री :

सल्तनत काल में बादशाह की सहायता के लिए 'वजीर' या प्रधान मंत्री होता था। वह सुल्तान के बहुत से अधिकारों तथा विशेषाधिकारों को हथिया लिया करता था और इस प्रकार निरंतर सम्राट वजीर और अमीरों के मध्य कलह का कारण बनता था। अकबर ने 'पूर्ण अधिकार संपन्न वजीर' का पद समाप्त कर दिया तथा अपने अधिकारों तथा कार्यों को चार मंत्रियों में बांट दिया।

3.   दीवान या वित्तमंत्री :

दीवान राजस्व तथा वित्त विभागों का प्रधान होता था। इब्न हसन ने अपनी पुस्तक 'सेंट्रल स्ट्रक्चर आफ दि मुगल अंपायार' में उसके अधिकार तथा कर्त्तव्यों के बारे में लिखा है कि 'दीवान' की नजर राज्य के ऐसे प्रत्येक अफसर पर होती थी जो अपना वेतन जागीर से प्राप्त करता था। अपने राजस्व अधिकारों के अलावा, राज्य के मुख्य कार्यकारी अफसर होने के नाते उसका नियंत्रण प्रान्तों तथा प्रांतीय अफसरों पर भी था, जिसमें गवर्नर से लेकर 'अमील' और 'पटवारी' तक थे। वित्तमंत्री के रूप में उसे प्रत्येक ऐसी पाई (दाम) का हिसाब मालूम रहता था, जो शाही खजाने में आई हो या निकाली जा रही सरकार के तीनों विभागों में रहता था। वह 'सूबेदारों, फौजदारों, दीवानों, करोड़ियों, अमीनों, तहसीलदारों, खजांचियों' आदि की नियुक्ति तथा तबादला भी करता था। निम्नलिखित अधिकारी इसकी सहायता करते थे (1) दीवान-ए-खालसा, (2) दीवान-ए-तन अथवा दीवान-ए-तनख़ा, (3) दीवान-ए-जागीर, (4) दीवान-एक-बयूतात, (5) मदद-ए-माश तथा धर्म सम्वन्धी हिसाब, (6) खजाना, (7) मुशरिफ (प्रमुख लेखापाल), (8) मुस्तौफी (लेखा-परीक्षक)।

4.   मीर बख्शी :

जैसा कि इब्न हसन ने कहा है, 'सैनिक व्यवस्था के अनुसार सेनाओं में भर्ती, किसी अफसर का ओहदा उसके द्वारा रखे गए सैनिकों की संख्या के अनुपात में होना तथा उसके द्वारा वेतन प्राप्ति के लिए एक निश्चित संख्या में घुड़सवार सैनिकों का एक अवधि पर प्रस्तुत किया जाना, ऐसी बातें थीं जिससे वजीर और मीर बख्शी के उत्तरदायित्व और सम्मान में समकक्षता आ गई थी। उसके विभाग का काम सभी श्रेणी के मनसबों की नियुक्ति कर आदेश जारी करना था। राजधानी में प्रांतों से आने वाले सभी ऊंचे अफसर तथा दूसरे देशों से आए हुए राजदूतों को वही बादशाह के सामने पेश करता था । राज संबंधी गोपनीय और महत्वपूर्ण बातचीत में बादशाह के साथ उसके दरबार तथा निजी कमरे में भी वह सदैव मौजूद रहता था । प्रांतों से वाकयानवीस अपनी गोपनीय रिपोर्ट उसके पास ही भेजते थे, जिसे वह बादशाह को देता था। सैनिकों के आराम के लिए जरूरी व्यवस्था करने का उत्तरदायित्व भी उसी का था।

5.   मीर समन :

यह बादशाह की घरेलू व्यवस्था, शाही इमारतों, सड़कों, बागों, भंडारों, कारखानों और खरीद का प्रभारी मंत्री होता था । शाही घरेलू व्यवस्था का प्रभारी मंत्री होने के नाते 'मीर समन' की जिम्मेवारी शाही परिवार के लिए जवाहरात से लेकर तोप और तलवार सब कुछ की व्यवस्था करने की थी। वह बादशाह के अभियान के लिए भी जरूरी प्रबंध किया करता था। वह बादशाह की ओर से श्रेष्ठ सेनापतियों और मनसबदारों, कलाकारों तथा विदेशी राजदूतों को दी जाने वाली भेंट का चुनाव भी करता था। मीर समन कारखानों की देखरेख भी करता था, जहां देश के गहने (जेवर) और अन्य विलास सामग्रियों का निर्माण होता था। ये कारखाने राजधानी में तथा प्रांतों में भी स्थित थे । वह राज्य की ओर से सब प्रकार की खरीद करता था, साथ ही राज्य में नमक, हाथी, जवाहरात आदि के एकाधिकार से संबंधित बातों की देखरेख करता था। किसी अमीर की मृत्यु हो जाने पर यह विभाग नियमानुसार उसकी जायदाद को अपने नियंत्रण में लेकर एक फेहरिश्त तैयार करता था।

6.   सद्र :

मुसलमान न्यायवेत्ताओं के अनुसार सद्र प्रजा और बादशाह के बीच एक संपर्क सूत्र, 'शरा' का निर्वाह करने वाला और उलेमा की और से प्रबोधक था । इस प्रकार सिद्धांत रूप में ही सही, सद्र धार्मिक मामलों, खैरात और धार्मिक संस्थाओं का निदेशक तथा न्याय विभाग का प्रधान होता था। वह राज्य में शिक्षा से संबंधित मामलों की देखरेख भी करता था। किंतु वास्तविक रूप में ऐसा प्रतीत होता है कि उसका अधिकार विद्वानों और जरूरतमंद लोगों को जागीर और वजीफा देने तक सीमित था। फिर भी पक्षपात तथा सरकारी धन की गड़बड़ी के कई मामले बादशाह की जानकारी में आए जिसके कारण अकबर को इस विभाग की देखभाल खुद करनी पड़ी। उसने वजीफा देने संबंधी सद्र के अधिकारों को कम कर दिया तथा जो अनुदान दिए गए थे उसमें भी कमी कर दी। बहुधा एक ही व्यक्ति काजी और सद्र दोनों का पद संभालता था। 'काजी अल- कजात' के रूप में सद्र अपना दरबार लगाता और न्यायपालिका के अफसरों की नियुक्ति के लिए सिफारिश करता और अपने विभाग के कामों का निरीक्षण करता था। अकबर और औरंगजेब के समय में हम पाते हैं कि मुख्य काजी और सद्र के पदों पर अलग-अलग व्यक्तियों की नियुक्ति की गई।

7.   मुहतसिब या लोक नैतिकता का जांचकर्ता

केंद्र के अन्यमहत्वपूर्ण अफसरों में मुहतसिब या लोक नैतिकता का जांचकर्ता होता था। नापतोल की जांच तथा मद्यपान और जुआ निषेध के अलावा वह यह भी देखता था कि मुसलमान कुरान के अनुसार नमाज पढ़ना, रमजान में उपवास रखना, शराब से परहेज करना जैसे धार्मिक आचरण रखते हैं या नहीं। औरंगजेब के राज्यकाल में मुहतासिब के अधिकार काफी बढ़ गए थे। उसने धार्मिक नियमों के पालन में कड़ाई की थी, साथ ही उसने बृहस्पतिवार को दरगाहों पर संगीत के साथ दिया जलाना, जीवों की शक्ल के खिलौनों की बिक्री, धार्मिक नियमों में बताए गए आकार से अलग प्रकार की दाढ़ी रखना इत्यादि की मनाही कर दी थी। उसके समय में मुहतसिब को नवनिर्मित हिंदू मंदिरों को तोड कर गिरा देने का अतिरिक्त काम भी सौंप दिया गया था।

Popular and Aristocratic Culture in India

Introduction The cultural history of the Indian subcontinent reveals complex layers of social life, consumption, aesthetics, and power. In ...