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गुरुवार, 5 दिसंबर 2024

शाहजहाँ का राजत्व सिद्धांत


शाहजहाँ का राजत्व सिद्धांत मुगल साम्राज्य की निरंतरता और परिवर्तन का सजीव उदाहरण है। यह अकबर द्वारा स्थापित दैवी राजत्व की अवधारणा पर आधारित था, लेकिन इसमें शाहजहाँ ने अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण, प्रशासनिक शैली, और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार कुछ बदलाव भी किए। 

1. दैवी राजत्व का समर्थन

शाहजहाँ ने अपने राजत्व को "दैवी स्वरूप" से परिभाषित किया। उसके शासनकाल में बादशाह को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। गोलकुंडा के सुल्तान को लिखे पत्र में शाहजहाँ ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि "बादशाह ईश्वर की प्रतिछाया होता है।" शाहजहाँ के दूत खाँ आलम ने ईरान के शाह को बताया कि शाहजहाँ "पृथ्वी का ईश्वर" है। यह सिद्धांत शाहजहाँ की प्रशासनिक शक्ति और अधिकार के दैवीकरण को स्थापित करता है, जिससे वह प्रजा और अधिकारियों पर अपनी सर्वोच्चता को बनाए रखता था।

2. सांस्कृतिक गौरव और राजत्व

शाहजहाँ के शासनकाल को कई इतिहासकार "स्वर्ण युग" मानते हैं। इस समय कला, वास्तुकला और सांस्कृतिक गतिविधियाँ अपने शिखर पर थीं। समकालीन संस्कृत विद्वान पण्डिराज जगन्नाथ ने शाहजहाँ को अन्य शासकों की तुलना में अधिक योग्य और सक्षम बताया। दिल्ली के बादशाह को "जगदीश्वर" के रूप में चित्रित करना इस बात का प्रमाण है कि शाहजहाँ के राजत्व ने सांस्कृतिक और धार्मिक स्तर पर अद्वितीय पहचान बनाई।

3. प्रशासनिक संरचना और नियंत्रण

शाहजहाँ के शासन में अमीर-उमरा और मनसबदार बादशाह के प्रति स्वामीभक्त थे। उन्होंने विद्रोहों और दलबंदी की प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखा। हालाँकि, महाबत खाँ का विद्रोह और मनसबदारों की दलबंदी जैसे घटनाओं ने प्रशासनिक स्थिरता को चुनौती दी। इसके बावजूद, शाहजहाँ ने अमीर-उमराओं पर अपनी पकड़ बनाए रखी और सत्ता के केंद्रीकरण को मजबूत किया।

4. धार्मिक नीति और उलेमाओं के साथ संबंध

शाहजहाँ की धार्मिक नीति प्रारंभ में रूढ़िवादी थी। उसने उलेमाओं को सन्तुष्ट करने के लिए कदम उठाए और इस्लामी सिद्धांतों का समर्थन किया। लेकिन, दाराशिकोह के प्रभाव में, उसके शासनकाल के बाद के वर्षों में धार्मिक सहिष्णुता की नीति वापस लाई गई। हालाँकि, इस्लामी शासन के अधीन, शाहजहाँ का मानना था कि बादशाह धर्म से ऊपर है और प्रजा को समान दृष्टि से देखना चाहिए।

5. उत्तराधिकार संघर्ष और राजत्व का क्षरण

शाहजहाँ के शासन के अंतिम चरण में उत्तराधिकार के लिए उसके पुत्रों के बीच संघर्ष ने मुगल राजत्व के दैवी स्वरूप को गंभीर क्षति पहुँचाई। दारा शिकोह, औरंगज़ेब, मुराद, और शुजा के बीच सत्ता के लिए संघर्ष ने मुगल साम्राज्य की स्थिरता को हिला दिया। औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को अपदस्थ कर कारागार में डाल दिया, जिससे दैवी राजत्व की अवधारणा पर प्रहार हुआ।

6. शाहजहाँ का व्यक्तिगत दृष्टिकोण और निरंकुशता

शाहजहाँ अपने आपको पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतिनिधि मानता था। वह अपने अधिकारियों और प्रजा से पूर्ण आज्ञाकारिता की अपेक्षा करता था। समकालीन यूरोपीय यात्रियों के अनुसार, शाहजहाँ ने अपनी असीमित शक्ति का विवेकपूर्ण उपयोग किया। प्रो. सक्सेना और ट्रैवर्नियर जैसे इतिहासकार मानते हैं कि शाहजहाँ के शासन में प्रशासनिक स्थिरता और न्यायपूर्ण प्रणाली थी।

7. सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियाँ

शाहजहाँ का काल ताजमहल, लाल किला, और जामा मस्जिद जैसी स्थापत्य कृतियों के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा, मनूची और ट्रैवर्नियर जैसे यात्री शाहजहाँ के न्यायपूर्ण शासन की प्रशंसा करते हैं। उनका मानना है कि शाहजहाँ ने प्रजा के साथ एक पिता के समान व्यवहार किया और उनके कल्याण को प्राथमिकता दी।

8. मुगल राजत्व का पतन और विरासत

शाहजहाँ के शासनकाल के अंत में उत्तराधिकार संघर्ष और विद्रोहों ने मुगल साम्राज्य के राजत्व सिद्धांत को कमजोर कर दिया। औरंगज़ेब के सत्ता में आने के बाद मुगल साम्राज्य में कठोरता और अस्थिरता बढ़ी। हालाँकि, शाहजहाँ का शासनकाल प्रशासनिक दक्षता, सांस्कृतिक समृद्धि, और दैवी राजत्व सिद्धांत की पुष्टि के लिए एक महत्वपूर्ण कालखंड बना रहा।

निष्कर्ष

शाहजहाँ का राजत्व सिद्धांत अकबर की नीतियों का विस्तार था, जिसमें दैवी स्वरूप, प्रशासनिक नियंत्रण, और सांस्कृतिक गौरव का मिश्रण था। हालाँकि, उनके शासनकाल के अंतिम वर्षों में उत्तराधिकार संघर्ष ने इस सिद्धांत को चुनौती दी, जो मुगल साम्राज्य के पतन का कारण बना। शाहजहाँ का राजत्व भारतीय इतिहास में एक युगांतरकारी अध्याय है, जिसने संस्कृति, राजनीति, और प्रशासन के क्षेत्र में नए मानदंड स्थापित किए।

जहाँगीर का राजत्व का सिद्धांत


जहाँगीर ने अपने पिता अकबर द्वारा प्रतिपादित राजत्व के दैवी सिद्धांत को न केवल अपनाया, बल्कि इसे और अधिक विस्तार दिया। उसकी यह अवधारणा थी कि राजा का चयन ईश्वर करता है और उसे वही व्यक्ति बनाया जाता है जो इस पद के लिए योग्य होता है। तुज़क-ए-जहाँगीरी में उसने स्पष्ट रूप से कहा है कि राजत्व और शासन विद्रोहियों या किसी अन्य शक्ति के द्वारा नहीं दिए जा सकते। यह विचारधारा उसके शासन के प्रमुख निर्णयों और उसकी नीतियों में परिलक्षित होती है।

प्रकाश का प्रतीकात्मक महत्व

जहाँगीर ने 'नूरुद्दीन' नाम धारण करके और अपनी प्रिय वस्तुओं को 'नूर' से सम्बंधित नाम देकर राजत्व के दैवी स्वरूप को और अधिक गहराई प्रदान की। जैसे:

  • अपनी पटरानी को 'नूरमहल' और 'नूरजहाँ' का नाम दिया।
  • अपने प्रिय घोड़े का नाम 'नूर-ए-अस्प' और हाथी का नाम 'नूर-ए-फिल' रखा। यह प्रतीकात्मकता जहाँगीर के शासन के आध्यात्मिक एवं प्रतीकात्मक पहलुओं को उजागर करती है।

विद्रोहों का सामना और राजत्व की रक्षा

जहाँगीर के शासनकाल में दो प्रमुख विद्रोह हुए: खुसरो का विद्रोह और शाहजहाँ का विद्रोह। इन विद्रोहों का सामना करते हुए उसने अपने राजत्व के दैवी स्वरूप को बनाए रखा।

  • खुसरो का विद्रोह: जहाँगीर ने इसे निर्ममता से दबा दिया और इसे अपनी दैवी शक्ति की परीक्षा के रूप में देखा।
  • शाहजहाँ का विद्रोह: इस विद्रोह का अंत सशर्त क्षमा और राजकीय आदेश के पालन के रूप में हुआ। यह मुगल राजत्व के प्रति वफादारी और दैवी सिद्धांत की स्वीकार्यता को दर्शाता है।

 सहिष्णुता और रूढ़िवाद का संतुलन

जहाँगीर ने अकबर की सुलहकुल नीति की प्रशंसा करते हुए सहिष्णुता की नीति अपनाई, लेकिन प्रारंभिक काल में रूढ़िवादी उलेमाओं को प्रसन्न करने का प्रयास भी किया।

  • सहिष्णुता: जहाँगीर को समकालीन ग्रंथों में अकबर की परंपरा का अनुयायी माना गया है।
  • उलेमाओं का नियंत्रण: उसने रूढ़िवादी विचारधाराओं को बढ़ावा देने के बजाय उन पर नियंत्रण बनाए रखा।

 न्यायप्रियता: जनता में लोकप्रियता का आधार

जहाँगीर को एक न्यायप्रिय शासक के रूप में देखा गया। उसने अपने महल के बाहर न्याय की जंजीर लटकाई, जो न्याय की उपलब्धता का प्रतीक बनी। हालांकि, यह विवादास्पद है कि क्या यह आम जनता के लिए सुलभ थी, लेकिन इसने कानून और न्याय के प्रति विश्वास को बढ़ावा दिया।

विद्रोही गुटों के प्रति दृष्टिकोण

जहाँगीर ने सिख गुरु अर्जुन को विद्रोही खुसरो का समर्थन देने के कारण मृत्युदंड दिया। उसने इसे राज्य के दैवी सिद्धांत और न्याय के तहत उचित ठहराया। इसी प्रकार, अन्य विद्रोही गुटों जैसे श्वेताम्बर जैन गुरु मानसिंह के अनुयायियों को भी दंडित किया गया।

प्रशासनिक निर्णय और दैवी सिद्धांत

जहाँगीर ने दक्षिण के अभियान के लिए राजकुमार खुर्रम (शाहजहाँ) को शाह की उपाधि देकर यह स्पष्ट किया कि मुगल साम्राज्य के पद और अधिकार दक्षिणी राज्यों से श्रेष्ठ हैं। यह निर्णय उसके दैवी सिद्धांत के अनुरूप था, जिसमें बादशाह का पद ईश्वर प्रदत्त और सर्वोच्च माना गया।

निष्कर्ष

जहाँगीर ने अकबर की परंपराओं को बनाए रखते हुए अपने शासनकाल को दैवी सिद्धांतों और प्रतीकवाद से जोड़ा। उसने न्यायप्रियता, धार्मिक सहिष्णुता, और प्रशासनिक कुशलता के माध्यम से अपनी स्थिति को मजबूत किया। उसके शासनकाल का मूल्यांकन, तात्कालिक संदर्भों और उसके सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिए। आधुनिक दृष्टिकोण से, जहाँगीर का शासन दैवी अधिकार और व्यावहारिक राजनीति का मिश्रण था, जिसने मुगल साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान किया।

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

औरंगज़ेब का राजत्व सिद्धांत

औरंगजेब ने अपने आप को एक आदर्श मुस्लिम शासक प्रमाणित करने का प्रयास किया। लेकिन सत्रहवीं सदी में न तो पूर्णतया इस्लामी राजत्व-सिद्धांत की स्थापना संभव थी, न औरंगजेब ने की। उसका राजत्व उसके पत्रों में तथा उसकी व्यावहारिक नीतियों में प्रतिबिंबित होता है।

1.   राजत्व :  ईश्वरीय देन

वह भी राजत्व के दैवी सिद्धान्त को मानता था। लेकिन उसने शाहजहाँ को लिखी अपनी बात ट्रस्टीशिप  पर  कितना विश्वास किया, सह संदिग्ध है। क्योंकि अकबर द्वितीय के विद्रोह, तथा चार मौलवियों के फतवों को वह दर किनार करके राजत्व को ईश्वरीय देन माना सत्ता मुगल बादशाहों के ही निश्चित प्रयासों से कितनी सुदृढ़ हो गयी थी। औरंगज़ेब की सफलता भी यही प्रमाणित करती है कि मंसबदार या उमरा का इतना साहस नहीं था कि वह बादशाह  को विस्थापित करके स्वयं सिंहासन पर बैठ जाये। औरंगज़ेब के पश्चात् जब मुगल राजत्व पतनोन्मुख थी और उमरा शक्तिशाली हो गये थे, राजत्त्व मुगलवंश के ही किसी व्यक्ति के चारों तरफ घूमता रहा। औरंगज़ेब अपनी शक्ति के प्रति ईष्यालु था एवं किसी के साथ इसे बाँटने के लिए कदापि तैयार नहीं था। उसने सभी के साथ एक निश्चित दूरी बनायी, क्योंकि, वह भी बलबन की भाँति जानता था कि 'राजत्व बन्धुत्व नहीं मानता'उसने तो इस सिद्धान्त को शत् प्रतिशत् प्रमाणित करके ही सत्ता हथियायी थी। उसने कभी किसी पर भी विश्वास नहीं किया और अन्ततः अपने पुत्रों तक को अविश्वसनीय माना और उसका दुष्परिणाम भी भोगा।

2.  राजा : एक ईश्वरीय उपकरण

औरंगज़ेब हालाँकि अपने आपको पैगम्बर साहब का सेवक कहता रहा, किन्तु वह अपने आपको ईश्वरीय उपकरण  ही मानता रहा, जिसे ईश्वर ने ही बादशाह के रूप में चयनित किया था। चूँकि, मुगल बादशाह एक दैवी संस्था के रूप में मान्य थी, अतः बादशाह के प्रति आज्ञाकारिता एक राजनीतिक एवं धार्मिक अनुष्ठान ही मानी जाने लगी थी। अतः औरंगज़ेब सहित समस्त मुगल बादशाह अपने आपको ईश्वर का चयनित प्रतिनिधि ही मानते रहे, जिसमें परामानव गुण विद्यमान थे एवं जो दैवी कृपा से नेतृत्त्व प्राप्त करने में सफल रहे थे। उनकी यह दृढ़ मान्यता थी, कि, अपनी प्रजा की सुनिश्चित एवं पूर्ण निष्ठा उन्हें ईश्वरीय देन है, न कि उलमा, अथवा उमरा की देन अथवा किसी चुनाव का आधार इसके लिए उत्तरदायी नहीं है।

3.  शासक : राज्य का ट्रस्टी

उत्तराधिकार के युद्ध के बाद जब शाहजहाँ ने राजकोष पर औरंगज़ेब के नियंत्रण को अवैध घोषित किया तो वह मुगल राजत्व के सिद्धान्त को ही रेखांकित करके उसे 'राजद्रोही' घोषित कर रहा था। किन्तु, औरंगज़ेब ने अपने उत्तर में अपने राजत् सिद्धान्त सुपरिभाषित करते हुए लिखा कि राज्य की सम्पत्ति एवं कोष समुदाय के लाभ के लिए ही होते हैं। वह अपने आपको समुदाय का 'ट्रस्टी' या संरक्षक के रूप में कोष पर नियंत्रण करने का अधिकारी घोषित कर रहा था। वह अपने पिता को लिखता है कि दूसरे की सम्पत्ति पर अधिकार करना मुस्लिम मान्यता के विरुद्ध आचरण है। राजसी सम्पत्ति एवं कोष लोगों की भलाई के लिए ही होते हैं राज्य कोई आनुवंशिक व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होती है। उसका कहना था कि जैसे परमपिता समस्त मानव जगत का संरक्षक है, वैसे ही शासक भी उसके प्रतिनिधि के रूप में मात्र संरक्षक (ट्रस्टी) के रूप में 'प्रजा पालक' ही है।

4.  राजकीय नीति : जवाबित पर जोर

शरीअत के आधार पर राज्य का संचालन कर औरंगजेब अपने को एक आदर्श मुस्लिम शासक प्रमाणित करना चाहता था, किन्तु राजत्व की शक्ति एवं अक्षुण्णता से उसने समझौता नहीं किया। उसने ख़लीफ़ा या किसी अन्य शासक की अधीनता स्वीकार नहीं की। राजनीतिक कारणों से उसने मुसलमानों शासकों को भी दण्डित किया। अपनी राजनीतिक शक्ति के प्रसारण हेतु उसने दक्षिण के मुसलमानों से उसी तरह युद्ध किया जिस तरह मराठों से। इन युद्धों में हिन्दू तथा मुसलमान सैनिकों ने मिलकर युद्ध किया।  औरंगज़ेब के धार्मिक विश्वासों पर बहुत कुछ कहा और लिखा गया है किन्तु, यह भी सत्य है कि, औरंगज़ेब ने जितना महत्त्व शरियत या मुस्लिम विधि को दिया, उतना ही ज़वाबित को भी दिया उसने उलमा को नियंत्रित रखा एवं राजत्व की शक्ति एवं अक्षुणता से कभी कोई समझौता नहीं किया। वह भी शेष मुगल बादशाहों की भाँति निष्पक्ष न्याय का आग्रही था

5.  महापहेली : विनष्ट अवसर : जिन्दा पीर : मामूली कलर्क

औरंगजेब का चरित्र एक महा पहेली है। उसे जिंदा पीर कहा गया क्योंकि वह इतना बड़ा नमाज़ी था कि बीच युद्ध में भी नमाज़ पढ़ना नहीं भूला। उसने अपने व्यक्तिगत खर्चे के लिए पैसे टोपी सिलकर और कुरआन की नक़ल करके खुद कमाए, मृत्यु से पूर्व इसके पास टोपी सिलने के चार रुपये दो आने थे जबकि कुरआन की प्रतिलिपि से प्राप्त तीन सौ पांच रूपये थे। औरंगजेब की जीवन शैली किसी संत के लिए तो ठीक हो सकती है लेकिन उसके लिए नहीं जिसे राजनीतिक फैसले लेने होते हों। औरंगजेब को अनथक रूप से एक कठोर प्रशासक कहा गया है, जो न अपने साथ मुरौवत करता था न अपने नजदीकियों के साथ। लेकिन औरंगजेब का यह अध्यव्यवासीपन यूरोप के फिलिप द्वितीय के मानस को प्रतिबिंबित करता है जो निश्चित तौर पर बहुत मेहनती था लेकिन पुराने तालों को ठीक करने में। औरंगजेब ने न सिर्फ समय नष्ट किया बल्कि साम्राज्य की सुख और शांति भी नष्ट किया। वह व्यावहारिक रूप से राजपूत नीति, दक्षिण नीति तथा धार्मिक नीति में अच्छा निर्णय नहीं ले सका।

जो भी हो इस महान बादशाह के अन्तिम दिनों में उसका राज्य पतनशील हो गया था एवं उसके उत्तराधिकारी, जो उसके जैसे योग्य नहीं थे इस पतनशील प्रवृत्ति को नियंत्रित करने में पूर्णतया असफल रहे।

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

अकबर का राजत्व सिद्धांत


प्रेरणा: अखिल भारतीय साम्राज्य निर्माण की आवश्यकता

1.   सर्वोच्च सत्ता का धर्म निरपेक्ष होना

2.  समस्त प्रजा के लिए निष्पक्ष होना

3.  गैर मुसलमानों के प्रति सहिष्णुता

4.  प्रजा कल्याण का उद्देश्य

अकबर के राजत्व के अवयव 

1.    मध्य एशिया की मंगोल परंपरा

2.   तैमूरी परंपरा

3.   ईरानी परंपरा

4.   भारत का उदारवादी वातावरण

5.   महल का वातावरण            



अकबर के राजत्व सिद्धांत की विशेषता

1.   पादशाह: स्थायित्व का प्रतीक 

अकबर कालीन मुगल राजत्व की सुस्पष्ट एवं विस्तृत व्याख्या अबुल फ़ज़ल ने अकबरनामा में की है। अबुल फजल के अनुसार, 'पादशाह' दो शब्दों 'पाद' तथा 'शाह' से बना है। 'पाद' का अर्थ है 'स्थायित्व' तथा 'शाह' का 'स्वामी' अथवा 'अधिपति'। इससे प्रकट होता है कि पादशाह स्वामित्व तथा स्थायित्व का प्रतीक है।

2.  राजत्व: अराजकता का विकल्प

अबुल फ़ज़ल के शब्दों में राजत्व का दैवी स्वरूप वस्तुतः राजनीतिक अराजकता का विकल्प था, "अगर राजसत्ता न होती तो अशान्ति का तूफ़ान कभी शान्त न होता, न स्वार्थी महत्त्वाकांक्षा ही समाप्त होती, अराजकता और इंद्रियलोलुपता से बोझिल मानव जाति पतन की खाई में डूब जाती। विश्व के इस बड़े बाजार की सम्पन्नता नष्ट हो जाती एवं सम्पूर्ण दुनिया बंजर हो जाती।"

3.  'फ़र्रे-इज्दी' या दिव्य ज्योति

अबुल फ़ज़ल के विचारानुसार 'राजसत्ता परमात्मा से फूटने वाला तेज और विश्व प्रकाशक सूर्य की किरण है।' वह इसे 'फ़र्रे-इज्दी' या दिव्य ज्योति कहकर सम्बोधित करता है। यह 'दिव्य ज्योति' प्रत्यक्षतः ईश्वर द्वारा सम्राटों को प्रेषित होती थी। बादशाहों के अन्दर विद्यमान होने के कारण ही लोग अधीनतापूर्वक एवं पूर्ण श्रद्धा से उसके प्रति समर्पित रहते हैं। वह कहता था कि 'सूर्य से सम्राटों के लिए विशेष कृपा प्रवाहित होती रहती है।' वह सूर्य एवं अग्नि दोनों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता था।

4.  राजत्व परमात्मा का उपहार

अबुल फ़ज़ल की व्याख्या के अनुसार, राजत्व परमात्मा का उपहार है और वह किसी भी व्यक्ति को तब तक प्रदान नहीं करता, जब तक कि उक्त व्यक्ति में सहस्त्र महान गुण अन्तर्निहित न हों। अत; उक्त व्याख्या के अनुसार सम्राट का पद, किसी वंश-विशेष से सम्बन्धित होने या धन के बाहुल्य से प्राप्त नहीं होता अपितु योग्य एवं गुणवान व्यक्ति के ईश्वर द्वारा चयन का ही परिणाम है।

5.  राजत्व के लिए अनिवार्यताएं

अबुल फ़ज़ल के अनुसार बादशाह को अपनी प्रजा के प्रति पितृ तुल्य स्नेह; विशाल हृदय, परमात्मा के निरन्तर बढ़ती आस्था, उपासना एवं भक्ति होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण गुणों, जिनका समावेश पादशाह के व्यक्तित्त्व में अबुल फ़ज़ल आवश्यक मानते थे। वे थे—निर्मल बुद्धि, निष्पक्ष न्याय का दृष्टिकोण, सम्बन्धियों एवं अपरिचितों से भी समान व्यवहार, ईश्वर प्रदत्त साहस, कठोर परिश्रमशीलता, उदारता एवं सहनशीलता, सभी धर्मावलम्बियों के प्रति समान व्यवहार, विवेकपूर्ण निर्णय, अनुचित इच्छाओं व आवेगों का दमन, चरित्रवान एवं उदार व्यक्तियों की संगति करना एवं उनसे विचार-विमर्श व परामर्श करना, दूसरों से शीघ्र प्रभावित न होना एवं प्रजा के प्रति पितृ-तुल्य चिन्ता रखना

6.  सुलह-ए-कुल की राष्ट्रीय आकांक्षा  

साधारण अर्थ में सुलहे कुल की नीति का तात्पर्य है सभी के लिए शांति तथा सभी के बीच समन्वय। सुलहे कुल की नीति अकबर के द्वारा हिंदुस्तान की सामासिक संस्कृति की बेहतर समझ पर आधारित थी। अबुल फज़ल ने सृष्टि के चार तत्वों आग, वायु, पानी और भूमि की तुलना समाज के चार तत्वों से की क्रमशः सेना, व्यापारी, बुद्धिजीवी तथा उत्पादक वर्ग और इनमें एकता की बात की। साथ ही उसने एक सुसंगठित प्रशासक वर्ग भी प्राप्त करने का प्रयास किया जो उसकी राजपूत नीति में दिखता है।

7.  महजर की घोषणा

1579 ई. में 'महज़र' पढ़े जाने के बाद अकबर ने अपने आपको धर्म एवं राज्य दोनों का मुखिया होना स्वीकार किया था। इससे बादशाह की तुलना में उलमा की शक्ति गौण हो गयी थी। साथ ही, 'महज़र' के साथ 'इमाम' एवं 'अमीरूल मुमिनीन' की उपाधियों के धारण करने से उसकी सर्वसत्ता स्थापित हो गयी थी।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अकबर कालीन मुगल राजतंत्र अपने उत्कर्ष पर पहुँच गया। उसे निरंकुश, असीमित, परम पवित्र और दैवी आदि विशेषणों से विभूषित किया गया है। वह सभी वर्गों से ऊपर एवं ऊँचा था एवं उस पर किसी प्रकार का बाहरी या विदेशी दबाव कभी नहीं रहा।

अकबर के राजत्व का महत्व

1.    नवीन तत्वों का समावेश

2.    शासन के वृहद ढांचे का निर्माण

3.    शासन के मौलिक सिद्धांतों का परिभाषित होना

4.    उच्च आदर्शों की स्थापना

5.    शासन में धर्म निरपेक्ष तत्व की स्थापना

6.    शासन के बौद्धिक आधार का निर्माण

7.    राजपूतों का जुड़ाव

8.    राजा की सर्वोच्च आध्यात्मिक भौतिक स्थिति

बाबर का राजत्व सिद्धांत


भारत में बाबर के आगमन से राज्य के स्वरूप एवं राजत्व की अवधारणा में राजत्व का तुर्क मंगोल असर दिखने लगता है। हालाँकि इस काल में भी राजत्व दैवीय एवं निरंकुश रूप में ही दृष्टिगोचर होता है। मुगलों का प्रथम कार्य विजित लोगों में अपने प्रति सम्मान एवं प्रशासनिक भय दोनों ही स्थापित करना था और इस कार्य हेतु शासक की सर्वशक्तिशाली मान्यता आवश्यक थी।

1.    राजत्व के दैवीय सिद्धान्त की मान्यता

तैमूर के वंशज होने के नाते भी मुगल बादशाह राजत्व के दैवीय सिद्धान्त को परम्परानुसार भी मानने के अधिकारी थे। तैमूर स्वयं अपने संस्मरणों में लिखता है कि जब भी सार्वभौम ईश्वर किसी व्यक्ति को सम्प्रभुता प्रदान करता है, वह उसे विशेष प्रतिष्ठा एवं विवेक भी प्रदान करता है, ताकि इस माध्यम से मानव उसके आज्ञाकारी बने रहें। यह सद्गुण ईश्वरीय प्रताप की एक किरण है, जो सम्राट पर आलोकित होती है। यह एक न्यायप्रिय ईश्वर की प्रत्छाया मात्र है।

2.   पादशाह की उपाधि धारण करना

काबुल पर विजय हासिल करने के बाद बाबर ने  1508 ई. में पाद शाह की उपाधि धारण की। वह अपनी आत्मकथा में लिखता है कि उस काल तक उसे मिर्ज़ा सम्बोधित किया जाता था, किन्तु बाद में उसने यह आदेश दिया कि लोग उसे पादशाह सम्बोधित करें। पादशाह की उपाधि धारण करने के कई कारण थे, पहला फ़रगना खोने की हीनग्रन्थि से उबरने का प्रयास। दूसरे, वह समस्त तैमूरवंशियों में भी अपनी प्रमुखता घोषित करना चाह रहा था। तीसरे, वह अपने समकालीन शासकों से अपनी श्रेष्ठता साबित करना चाह रहा था।

3.   सम्राट के वंशानुगत अधिकार में विश्वास

बाबर, सम्राट के वंशानुगत अधिकार में विश्वास रखता था। बदख़्शाँ के उत्तराधिकार के सम्बन्ध में अबुसईद को लिखे गए पत्र में वह वंशानुगत अधिकारों की चर्चा करता है। 1529 ई. में अपने पुत्र को सुझाव देने वाले पत्र से दोनों बातें साफ़ हो जाती हैं।  प्रथम, वह हुमायूँ को उत्तराधिकारी के रूप में देख रहा था, अतः इसी उद्देश्य से परामर्श दे रहा था।  द्वितीय, इस पत्र से बाबर के राजत्व पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

4.   बादशाह के लिए सक्रियता और सलाह के महत्त्व पर जोर

1529 में उसने अपने पुत्र हुमायूँ को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उसके राजत्व-सिद्धान्त सम्बन्धी विचारों पर प्रकाश पड़ता है। वह लिखता है कि “बादशाही से बढ़कर कोई बन्धन नहीं है। बादशाहों के लिए एकांतवास या आलसी जीवन उचित नहीं है।” अर्थात् सम्राट को क्रियाशील होना चाहिए। वह हुमायूँ को परामर्श देता है कि उसे योग्य, अनुभवी अमीरों एवं अपने हितैषियों से परामर्श कर राजकार्य करना चाहिए। वह हुमायूँ को सुझाव देता है कि वह अमीरों को आदेश दे कि वे उसके सम्मुख राज्यकार्य हेतु दो बार उपस्थित हों।

5.   राजपद के गौरव के साथ सामाजिक व्यवहार पर जोर

वंशगौरव एवं राजपद की सर्वोच्चता स्वीकार करने पर भी सामाजिक व्यवहार में वह अमीरों के साथ खुलकर मिलता था। उसकी आत्मकथा में ऐसे अनेक अवसरों का उल्लेख है कि जब वह अमीरों के साथ आनन्द-विनोद में लिप्त होकर शराब के नशे में बेहोश हो जाता था। इससे शासक के गौरव में कमी आना स्वाभाविक था।

6.   तैमूर तथा मंगोल प्रथा के प्रभाव में साम्राज्य का विभाजन

तैमूर तथा मंगोल प्रथा के प्रभाव से बाबर ने हुमायूँ को अपने बाद साम्राज्य के विभाजन का निर्देश दिया। उसने हुमायूँ तथा कामरान का अनुपात छः पाँच निश्चित किया किन्तु उसने अपने दो अन्य पुत्रों अस्करी तथा हिन्दाल के सम्बन्ध में अपनी आत्मकथा में कुछ भी नहीं लिखा है। कदाचित् कामरान के उग्र स्वभाव के कारण उसने उसका अनुपात निश्चित करना आवश्यक समझा

7.   सहिष्णुता पर जोर

बाबर द्वारा हुमायूँ को दी गई सलाह गौर करने लायक है। “हिंदुस्तान की सरज़मीं में हर मज़हब को मानने वाले लोग रहते हैं। अलहम्दोलिल्लाह इस मुल्क की बादशाहत तुम्हें सौंपी गई है। अपने दिल से भेदभाव दूर कर के इंसाफ़ करो। ख़ास तौर पर तुम गाय की क़ुर्बानी ना करो। इससे तुम हिंदुस्तान के लोगों का दिल जीत लोगे और लोग बादशाहत से जुड़ेंगे। सल्तनत में रहने वालों की इबादतगाहों को गिराओ मत। इतना बराबरी का इंसाफ़ करो कि लोग अपने बादशाह से ख़ुश हों और बादशाह लोगों से। इस्लाम जुल्म की तलवार से नहीं, नरमी से आगे बढ़ेगा। शीया-सुन्नी झगड़ों की तरफ़ से आँख मूँद लो वरना इस्लाम कमज़ोर होगा”

इस तरह शासक की सर्वोच्चता, वंश-गौरव, वंशानुगत उत्तराधिकार, पुत्रों में साम्राज्य विभाजन, उमरा तथा अपने हितैषियों के परामर्श से शासन करना उसके राजत्व सम्बन्धी प्रमुख विचार थेआगे चल कर शेख अबुल फ़ज़ल ने इसे कुछ इस प्रकार से लिखा है- उनमें दुनिया पर हुकूमत करने के आठों उसूल मुकम्मल तौर पर मौजूद थे। पहला बुलंद तक़दीर दूसरा ऊँची हिम्मत तीसरा दुनिया जीतने की ताकत चौथा मुल्क संभालने की काबिलियत पाँचवाँ शहरों को बेहतर करने की कोशिश छठवां दिल में रियाया की भलाई सातवाँ सिपाहियों को खुश रखने की सलाहियत और आठवां फ़ौज को तबाही फ़ैलाने से रोकने की ताकत।

सोमवार, 19 सितंबर 2022

सिकन्दर लोदी का राजत्व सिद्धांत

सुल्तान की शक्ति में वृद्धि करने तथा अमीरों को नियन्त्रण में लाने के लिए सिकन्दर ने कठोर नीति अपनायी। इसके लिए उसने राजत्व के स्वरूप में ही परिवर्तन कर दिया। उसका उद्देश्य सुल्तान की निरंकुश सत्ता स्थापित करना था।

1.   राजत्व को पुनः परिभाषित करना

बहलोल का पुत्र सिकन्दर जब शासक बना तो उसे नये सिरे से न केवल राजत्व परिभाषित करना पड़ा, अपितु बड़ी संख्या में अफ़गान सरदारों व अपने भाईयों के ही विरुद्ध शक्ति प्रदर्शन करके अपनी योग्यता व श्रेष्ठता प्रदर्शित करनी पड़ी। उदाहरण के लिए आलम खाँ एवं आज़म हुमायूँ को उसने पराजित किया फिर बन्धुत्व के प्रदर्शन के साथ - साथ सुल्तान की श्रेष्ठता व उदारता भाव के चलते क्षमा कर के उनके क्षेत्र उन्हें वापस लौटा दिये। अपने एक अन्य भाई बारबक को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा। संदेश सुस्पष्ट था, दिल्ली का सुल्तान वह है, बारबक उसके अधीन जौनपुर के शासक के ही रूप में रह सकता था। किन्तु बारबक की अफ़गान प्रवृत्तियों को यह स्वीकार नहीं था, अतः उसे युद्धों में पराजित करके आत्मसमर्पण के लिए बाध्य किया गया। किन्तु, बन्धुत्व के भाव का प्रदर्शन करते हुए सुल्तान ने इस भाई को क्षमा दान के साथ-साथ जौनपुर के गवर्नर के रूप में वहाँ उसे पुनर्स्थापित भी किया।

2.  बंधुत्व की जगह राजत्व को तरज़ीह

सिकन्दर की स्पष्ट मान्यता थी, कि राजत्व और बन्धुत्व में चुनाव का प्रश्न हो तो स्पष्टतः राजत्व का चुवाव करना चाहिए। बहलोल ने राजत्व को बन्धुत्व का एक आवरण प्रदान किया था, किन्तु सिकन्दर बन्धुत्व की अफ़गान भावनाओं को एक सीमा तक तुष्ट करने के उपकरण के ही रूप में प्रयोग किया, ताकि राज्य की स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। शेष उसने कभी बन्धुत्व को राजत्व के दैवीय स्वरूप को सीमित नहीं करने दिया। उसके पिता व पूर्ववर्ती शासक के काल में अड़तीस वर्षीय शान्ति से राज्य सुदृढ़, स्थायित्त्वपूर्ण एवं अनुशासित हो चुका था। अतः उसके लिए अब अग्रिम कार्यवाही स्वाभाविक थी।

3.  सुल्तान के पद की महिमा एवं प्रतिष्ठा

अन्ततः उसने सुल्तान के पद की महिमा एवं प्रतिष्ठा का स्तर बढ़ाने के लिए अफ़गान अमीरों को सुल्तान की श्रेष्ठ स्थिति स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया। हालाँकि, वह अफ़गानी जनतांत्रिक परम्पराओं में आसक्त होने की अभिव्यक्ति ही करता रहा। सिकन्दर लोदी ने अपने पिता का अनुसरण न करते हुए सिंहासन पर बैठना शुरू किया। अतः उसने सुस्पष्ट किया कि वह सुल्तान है न कि समान कबीलाई सदस्यों में योग्यता के आधार पर निर्वाचित सरदार अथवा जनजातीय नेता। अतः आसन या सिंहासन पर उसका एकाधिकार था, उसमें किसी का भागीदारी का अधिकार नहीं था।

4.  राजकीय फरमानों के लिए नियम

उसने दिल्ली के तुर्क सुल्तानों की भाँति अपने अमीरों, प्रांतपतियों व अन्य राज्याधिकारियों के लिए एक सामान्य नियम बना दिया कि राजकीय फ़रमानों का कैसे स्वागत के साथ स्वीकार किया जाये। प्रत्येक अमीर को, जिसको फ़रमान प्रेषित किया गया है, अपने नियत नियुक्ति स्थान से छह मील आगे चलकर पूरी श्रद्धा व सम्मान के साथ फ़रमान माथे पर लगाकर स्वीकार करना अनिवार्य था।

5.  अमीरों के लिए अनुशासन

अमीरों को प्रशासन की कड़ाई से यह आभास कराया जाता था कि वे सुल्तान के सेवक हैं न कि समान अधिकारों वाले अमीर, जिनके पद व अधिकार, नियुक्ति, स्थानान्तरण एवं अपदस्थ किया जाना पूर्णतया सुल्तान की इच्छा पर निर्भर था। जागीरदारों एवं विभागाध्यक्षों को नियमित 'दिवाने विज़ारत' में लेखा-विवरण प्रेषित करना पड़ता था। भ्रष्टाचार, कुप्रबन्धन, दुर्व्यवहार व रिश्वतखोरी आदि के प्रकरणों में कोई उदारता नहीं प्रदर्शित की जाती थी। कठोर अनुशासनबद्धता शासन का आदर्श वाक्य हो गया था।

6.  गुप्तचर व्यवस्था

उमरा या अमीर वर्ग को नियंत्रित करने की निश्चित नियत से उसने बलबन की भाँति गुप्तचर व्यवस्था स्थापित की एवं राज्य की समस्त सूचनाओं को एकत्रित करने पर बल दिया। अपनी सूचनाओं के आधार पर वह अमीरों को आश्चर्यचकित करके बलबन की भाँति यही प्रमाणित करना चाहता था कि सुल्तान के पास अल्लाह की छाया व प्रतिनिधि होने के कारण असीम अलौकिक शक्तियाँ होती हैं। अतः राजत्व के दैवीय स्वरूप को, वह भी बलबन की गुप्तचरी का अनुसरण करके पुनर्स्थापित करना चाहता था।

7.  निष्पक्ष न्याय

बलबन की ही भाँति उसने निष्पक्ष न्याय प्रदान करना सुल्तान का पुनीत कर्तव्य माना। वह बलबन के समान ही सैन्य बल का महत्व समझता था। उसने भी केन्द्रीय सेना गठित की एवं उनके कल्याण के प्रति सजग रहा। वह जनता को न्याय व व्यवस्था, सुरक्षा एवं संरक्षण देने में सफल रहा। वह प्रजापालक सुल्तान के रूप में प्रतिष्ठित होकर यही साबित करने का इच्छुक रहता था कि जिस प्रकार ईश्वर जीवों को संरक्षण प्रदान करता है, उसी प्रकार राजा को भी उसके प्रतिनिधि के रूप में इन्हीं दायित्त्वों का निर्वहन करना पड़ता है

इस प्रकार जहाँ तक सम्भव हो सका उसने अफगान अमीरों की भावनाओं का सम्मान किया लेकिन साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उन्हें इतना नियन्त्रण में रखा जितना आवश्यक था। अपने राजत्व सिद्धांत में बदलाव से उसने अमीरों के प्रति कठोर नीति का विवेक पूर्ण रूप से प्रयोग किया और उन्हें अनुशासन में लाने में सफलता प्राप्त की लेकिन सत्ता के कमजोर होते ही उसके उत्तराधिकारी के समय अमीरों की नाराज़गी दृष्टिगोचर होने लगी जो जो बाबर के लिए सहायक सिद्ध हुई।

Popular and Aristocratic Culture in India

Introduction The cultural history of the Indian subcontinent reveals complex layers of social life, consumption, aesthetics, and power. In ...