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सोमवार, 27 नवंबर 2023

दुष्ट सत्ता के समक्ष गांधी के हथियार

राजीव कुमार पाण्डेय

गांधी को न यकीन करने वाली आइंस्टीन की आने वाली पीढ़ी अब आ चुकी है। नई छवियों के निर्माण करने वाले अपवादों के विस्तारण तथा उद्देश्यपरक झूठ के संक्रामक बुखार को धारण करने वाली सोशल मीडिया के दौर में महात्मा गांधी चरखासुर के नए नाम से प्रचारित हो रहे हैं। हालांकि यह नई बात नहीं है, गांधी जी को अंग्रेजों ने अपना शत्रु माना, अंबेडकर ने विषैले दांतो वाला, वामपंथियों ने क्रांति की पनौती, जिन्ना ने एक चालाक हिंदू तो हिंदू गोडसे ने गांधी का वध ही कर दिया। लेकिन गांधी सबसे अलग हैं। गांधीजी की परवरिश, उनका अनुभव तथा उनका अर्जित बौद्धिक विकास इस बात की इजाजत नहीं देता था कि वह बिना जाने समझे किसी को अपना शत्रु समझते दरअसल उन्होंने कभी भी किसी को अपना स्थायी शत्रु नहीं समझा। उन्हें मनुष्य जाति की भलमनसाहत तथा सरकारों की उदारता तथा उनके अपने नागरिकों के प्रति दायित्वबोध में हमेशा यकीन रहा। गांधी का कहना था कि अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी दूसरों को समझा बूझाकर सही काम करने के लिए राजी कर लेना मैने हमेशा आसान पाया। गांधी का कार्यकारी अहिंसक जीवन दो हिंसक विश्व युद्धों के बीच का है जहां दुष्ट सत्ता की उपस्थिति से मानवता पीड़ित थी। गांधी ने दुष्ट सत्ता से निपटने के लिए कुछ शाश्वत उपायों को प्रचलित किया, जो आज भी प्रासंगिक हैं।

सत्याग्रह और अहिंसा

दुष्ट सत्ता के अन्याय और अत्याचार के समक्ष दो स्थितियां बनती हैं। पहला कि हम विरोध न करें और उसकी अंधभक्ति का रास्ता अख्तियार कर लें, लेकिन यह कायरता है। दूसरा, कि हम निडरता दिखाएं तथा उसका विरोध करें, जो युद्ध या विप्लव के रूप में प्रकट होगा। ज़ाहिर है कि इसमें हिंसा का समावेश होगा। गांधीजी ने एक तीसरा विकल्प प्रस्तुत किया, वह था सत्याग्रह अर्थात सत्य के प्रति आग्रह और अहिंसा । गांधी के अनुसार सत्य एक सार्वभौम मूल्य है। गांधी का यह एक अनोखा हथियार था जिसका जवाब किसी भी दुष्ट सत्ता के पास नहीं है। उन्होंने असत्य को सत्य से जीतने की बात की। वह इस बात पर अडिग थे कि भारत में अंग्रेजों के शासन को कभी भी सत्य नहीं ठहराया जा सकता था। गांधी के अनुसार स्वराज और न्याय सत्य है और इसलिए ही इस पर उनका आग्रह है। यह एक नैतिक शस्त्र है । गांधीजी के अनुसार अहिंसा, पशुता से मनुष्यता की तरफ प्रयाण का मानक है। उनके अनुसार अहिंसा सांस्कृतिक मनुष्य की एक चरम उपलब्धि है। यह सुषुप्तावस्था में रहती है, लेकिन जब यह जागती हैं तो प्रेम बन जाती है, जो संसार की गतिशीलता का साधन है।

एकता

गांधी का मानना था कि किसी भी शक्तिशाली और संगठित दुष्ट सत्ता से व्यक्तिगत तौर पर निपटना संभव नहीं है। यही नहीं हम सामाजिक फूट के साथ भी इससे नहीं निपट सकते। अपनी सत्ता को मजबूती देने के लिए अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति पर काम किया। उन्होंने न सिर्फ धार्मिक विभाजनों को बड़ा किया बल्कि हिन्दू धर्म की आंतरिक कमियों का लाभ उठाकर दलितों को भी आजादी के लिए चल रहे संघर्ष से दूर रखने की कोशिश की। गांधी ने एक शक्तिशाली सत्ता से निपटने के लिए खिलाफत आंदोलन के माध्यम से न सिर्फ हिंदू मुस्लिम एकता पर जोर दिया बल्कि दलितों को मुख्य धारा में बनाए रखने के लिए आमरण अनशन करके पूना पैक्ट करवाया। गाँधी के भारत में क्रियाशील होने के पूर्व की राजनीति वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाली थी लेकिन गांधी ने वर्ग समन्वय की एक अनोखी राजनीतिक शैली को विकसित किया।

अपनी मांग की वैधता निर्मित करना

अंग्रेजों ने भारतीयों के स्वशासन की मांग को यह कह कर ख़ारिज किया की भारतीय समाज की कमियां जैसे स्त्रियों की दशा, धार्मिक कलह, तथा अस्पृश्यता जैसी बुराइयां इस बात की इजाजत नहीं देती, तथा भारतीयों को स्वशासन के लिए अयोग्य बनाती हैं। अंग्रेजों ने भारत में अपने शासन को एक सांस्कृतिक परियोजना बताया तथा इसे श्वेत व्यक्ति का बोझ सिद्ध किया। गाँधीजी ने न सिर्फ उनके दावों को खोखला सिद्ध किया बल्कि पश्चिमी सभ्यता को अनैतिकता का प्रचार करने वाली बताया । साथ ही गांधीजी  ने अपनी मांग को नैतिक रूप से मजबूत करने के लिए भारतीय समाज की अपनी बुराइयों को भी दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम सौहार्द, अस्पृश्यता उन्मूलन तथा महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए लगातार संगठित प्रयास किया।

असहयोग

गांधीजी ने प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की अच्छाई में विश्वास करके उनकी मदद की। वे भारत में घूम-घूम कर युवकों से सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करते रहे। इसके लिए उन्हें भर्ती करने वाला सार्जेंट भी कहा गया। गांधी जी का मानना था कि अंग्रेज इस सहयोग के बदले में भारतीयों को स्व शासन देने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लेकिन इसका उल्टा हुआ अंग्रेजों ने एक दमनात्मक कानून रॉलेट एक्ट पारित कर दिया जिसे न अपील न वकील न दलील के रूप में जाना जाता था। इसी बीच 1919 में जलियांवाला बाग काण्ड भी हो गया। गांधी ने अंग्रेजी सत्ता को शैतानी कहा तथा अब असहयोग की नीति अपनायी। गांधीजी जो एक समय अंग्रेजों को अच्छा समझ कर सहयोग किए थे उनके शैतानी होने पर अब उनके साथ असहयोग की बात करने लगे। गांधी जी ने कहा कि सरकार को बता दो कि चाहें फांसी पर लटका दे, चाहें जेल में बंद कर दे, उसे हमारा सहयोग किसी भी हालत में नहीं प्राप्त होगा। अब हम किसी दुष्ट सत्ता का सहयोग नहीं कर सकते ।

सविनय अवज्ञा

अंग्रेजों ने भारतीय शासन पर बात करने के लिए 1927 में साइमन कमीशन भेजा परंतु इसमें किसी भी भारतीय को नहीं रखा गया। भारत में अंग्रेजी कानून भारतीय मानस, भारतीय समाज तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के विरुद्ध था। गांधी जी का कहना था कि ऐसा कोई भी कानून जिसके निर्माण में भारतीय आकांक्षा शामिल नहीं है और उसे किसी दुष्ट सत्ता ने जबरदस्ती भारतीयों पर थोप रखा है तो उसे भारतीयों को मानने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए गांधी जी ने नमन कानून को लिया। गांधी जी का कहना था कि नमक कानून, जो कानून की पुस्तक में कलंक जैसा है, उसे वो तोड़ेंगे और इसके लिए उन्हें जो भी सजा दी जाएगी उसे भुगतने के लिए वो तैयार रहेंगे। उन्होंने सिर्फ अब एक ही शर्त रखी कि स्वराज पाने के लिए सत्य और अहिंसा की प्रतिज्ञा का ईमानदारी से पालन हो।

करो या मरो

एक समय ऐसा भी आता है जब दुष्ट सत्ता के पाप का घड़ा भर जाता है तथा पीड़ितों के सब्र का बांध टूट जाता है। गाँधी जी के अनुसार अंग्रेजों की एक व्यवस्थित अनुशासित अराजकता का अब अंत अब होना ही चाहिए भले ही इसका परिणाम अब कुछ भी हो । उन्होंने कहा कि एक मंत्र है, छोटा सा मंत्र, जो मैं आपको देता हूँ । उसे आप अपने ह्रदय में अंकित कर सकते हैं। वह मंत्र है करो या मरो, या तो हम भारत को आजाद कराएँगे या इस कोशिश में अपनी जान दे देंगें। अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए हम जिन्दा नहीं रहेंगें।

इस प्रकार गाँधीजी ने अंग्रेजी दुष्ट सत्ता से निपटने के लिए इन हथियारों का प्रयोग किया । लेकिन अब के अय्यार दुष्ट सत्ता ने जनता पर नियंत्रण के अपने हथियार को जादुई बना लिया है। फिर भी गाँधी नाम से वह डरी रहती है क्योंकि सत्ता के विरुद्ध गाँधी की "संज्ञानात्मक दासता की दुश्चिन्तायें" एक नागरिक के समक्ष चेतावनी के तौर पर अभी भी जिंदा है। आप गांधी के ख़िलाफ़ गोडसे बन सकतें हैं परन्तु किसी अत्याचारी दुष्ट सत्ता के ख़िलाफ़ आपका गाँधी बनना ही बेहत्तर विकल्प है। हाँ कोई भी दुष्ट सत्ता कभी नहीं चाहेगी की आप गाँधी बने क्योंकि दमन के लिए सहूलियत भरी हिंसा उसे बहुत भाती है। इसके लिये वह हमेशा अपना सक्षम प्रयास करती रही है।

रविवार, 9 अक्टूबर 2022

मुगल कौन थे ?

मुगल फारसी भाषा का शब्द है। यह शब्द "मंगोल" से व्युत्पन्न हुआ है। दरअसल चंगेज खान के समय से ही उत्तर के सभी आक्रमणकारियों को अफगानिस्तान व भारत के निवासियों द्वारा मंगोल जाति का नाम दिया गया था। बाबर और उसके वंशजों ने भारतीय प्रजा को अपने तथा अपने अनुयायियों के लिए मुगल कहने के संबंध में मौन अनुमोदन दे दिया।

मुगल शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1538 ईसवी में एक सूफी अब्दुल कुद्दुस गंगोही की बातचीत में मिलता है। इस शब्द का प्रयोग बाबर तथा उसके सैनिकों के लिए किया गया था। बाद में 18 वीं सदी के इतिहासकार खफी खां ने अपनी पुस्तक मुंतखब उल लुबाब में इस शब्द को रूढ़बद्ध किया। इसके बाद से ही सभी इतिहासकारों ने बाबर के वंशजों के लिए प्रदत्त नाममुगल लिखना शुरू किया जो बाद में एक परंपरा बन गई।

दरअसल बाबर ने स्वयं मंगोलों की तिरस्कार पूर्ण आलोचना की है। उसने मंगोलों को धूर्त कहा हैद्वेष की फसल का बीज कहा है तथा कहा है कि अगर उनका कोई राष्ट्र हो तो उसे घटिया कहा जाएगा।

तो प्रश्न उठता है कि अगर मंगोल मुगल नहीं थे। मंगोल कौन थे ?



                            मंगोलों का विस्तार 

साभार - https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Mongol_Empire_map_2.gif 
          

मंगोल शब्द की व्युत्पत्ति मोंग शब्द से हुई है। मोंग शब्द का अर्थ होता है बहादुर या दुस्साहसी शैतान। यह शब्द सबसे पहले चंगेज खान के लिए प्रयोग किया गया। मंगोलों ने लगभग 1353 के आसपास इस्लाम को अपनाना शुरू किया। दरअसल मंगोल, तार्तार घुमंतू योद्धाओं की एक शाखा थी जो चीन की दीवार के आसपास रहती थी जिसने एक समय चीन के विरुद्ध हथियार उठा लिया था। ये लोग उत्तरी एशिया के विशाल मैदानों में अज्ञात काल से घूमते रहते थे। चीनी इतिहास में तीन तार्तार जातियों का जिक्र मिलता है गोरे, काले तथा जंगली।

तो प्रश्न उठता है कि अगर बाबर मंगोल नहीं था और मुगल नाम उसे भ्रम वश दिया गया था तो बाबर वास्तव में कौन था ?

बाबर का पूरा नाम जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर था। तुर्को की एक शाखा चगताई तुर्को के बरलास कबीले का सदस्य था अर्थात वह एक तुर्क था। बाबर के पिता का नाम उमर शेख मिर्जा था। बाबर अपने पिता की तरफ से अमीर तैमूर की वंशावली में पांचवी पीढ़ी से संबंध रखता था। इसकी माता का नाम कुतलुग निगार खानम था। बाबर माता की तरफ से मंगोल नेता चंगेज खान की 14वीं पीढ़ी से संबंध रखता था। दोनों ही एशिया के बड़े विजेता और विनाशक थे। इस प्रकार कह सकते हैं कि बाबर एक मिश्रित नस्ल का था।

इसका पिता मध्य एशिया में फरगना की एक छोटी रियासत का सरदार था जो तैमूरी राज्य का एक इलाका हुआ करता था। इसका जन्म 14 फरवरी 1483 को अन्दीजन फरगना में हुआ था। जो आज के उजबेगिस्तान में पड़ता है। पिता की मृत्यु के बाद 12 वर्ष की आयु में 8 जून 1494 को बाबर फरगना की गद्दी पर बैठा। विश्वासघाती रिश्तेदारों  तथा सरदारों के षड्यन्त्रों के कारण उसका राज्य हाथ से निकल गया तथा वह दर-दर की ठोकर खाने लगा। बाबर ने सरदारों की मदद से 1505 ई० में काबुल पर अधिकार कर लिया अब वह भारत विजय का स्वप्न देखने लगा।

              बाबर के भारत पर आक्रमण करने के कारण

1. साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा:

बाबर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह अपने पूर्वज तैमूर लंग की भाँति एक विशाल साम्राज्य खड़ा करना चाहता था। उसने पहला प्रयास मध्य-एशिया में किया। वहाँ असफल रहने के बाद उसने काबुल तथा गजनी में अपना राज्य स्थापित किया किंतु वह काबुल तथा गजनी से संतुष्ट नहीं हुआ। इसलिये वह अपना साम्राज्य भारत में फैलाना चाहता था।

2. भारत पर जीत का गौरव हासिल करने की आकांक्षा:

उन दिनों इस्लामी जगत में काफिरों के देश भारत पर विजय प्राप्त करना किसी भी मुस्लिम शासक के लिये गौरव की बात माना जाता था। इसलिये बाबर भारतवर्ष अथवा उसके एक बहुत बड़े भाग को जीतकर भारत विजय का गौरव प्राप्त करना चाहता था।

3. भारत पर वंशानुगत राज्य होने का दावा:

बाबर, तैमूर लंग का वंशज होने के कारण तैमूर द्वारा विजित भारतीय क्षेत्रों को अपने वंशानुगत राज्य में होने का दावा करता था। जब तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया था तब उसने पंजाब के पश्चिमी भाग को अपने राज्य में मिला लिया था परन्तु बाद में अफगानों ने उस पर अपना अधिकार जमा लिया था। इसलिये बाबर पंजाब पर अपना वंशानुगत अधिकार समझता था और उसे फिर से पाना चाहता था।

4. काबुल तथा गजनी पर अधिकार:

समरकंद तथा फरगना के हाथ से निकल जाने के बाद बाबर काबुल तथा गजनी पर अधिकार जमाने में सफल रहा था इस कारण उसके राज्य की सीमा भारत के काफी निकट आ गई थी।

5. भारत की अपार सम्पत्ति प्राप्त करने की लालसा:

बाबर भारत पर आक्रमण करके अपने पूर्वजों की भांति अपार सम्पत्ति प्राप्त करना चाहता था। उसका कहना था कि भारत में विपुल स्वर्ण सिक्कों तथा ढ़ेलों के रूप में मिलता है।

6. भारत की परिस्थितियाँ:

भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों ने भी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिये उत्साहित किया। वह जानता था कि भारत का कोई भी प्रांतीय शासक तथा राणा सांगा, इब्राहीम लोदी का साथ नहीं देगा

7. लाहौर के अफगान अमीरों का निमंत्रण:

लाहौर के अफगान अमीरों ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित करने का निश्चय किया। आलम खाँ तथा दौलत खाँ के पुत्र दिलावर खाँ को बाबर के पास भेजकर आग्रह किया गया कि बाबर इब्राहीम लोदी को दिल्ली के तख्त से हटाकर, आलम खाँ को सुल्तान बनाने में सहायता करे क्योंकि इब्राहीम लोदी बड़ा ही क्रूर तथा निर्दयी शासक है।

इससे बाबर ने भारत पर आक्रमण करने की तैयारियाँ आरम्भ कर दीं।

शनिवार, 5 सितंबर 2020

सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन

सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन


अर्थ : असंतोष की अभिव्यक्ति

राजनीतिक भागीदारी के संस्थागत दायरों के बाहर परिवर्तनकामी राजनीति करने वाले आंदोलनों को सामाजिक आंदोलन की संज्ञा दी जाती है। सामाजिक प्रक्रियाओं के रूप में सामाजिक आंदोलन स्थापित सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध सामूहिक असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में उभरतें हैं जो सामाजिक परिवर्तन के कारक बन जाते हैं। यह परिवर्तन कभी कभी अपनी व्यापकता, प्रभाविता और तीव्रता में क्रांति बन जाता है।



संदर्भ : देश काल की अपनी विशिष्ट अनुभूति

यह सामाजिक विकास क्रम की अहम कड़ी होते हैं। यह किसी विशेष ऐतिहासिक तथा सामाजिक संदर्भ को धारण करते हैं जिनके अनुरूप आंदोलन की अपनी समझ तथा अनुभूति होती है उदाहरण के लिए देखें तो पश्चिमी देशों में जहां सामाजिक आंदोलन श्रमिक सुधार आंदोलन जैसे चार्टिस्ट आंदोलन के रूप में सामने आता है वही भारत में उपनिवेश विरोधी आंदोलन के साथ ही जाति विभेद के विरुद्ध सामाजिक आंदोलन अस्तित्व में आते हैं। जो परिवर्तन के रूप में पश्चिम में श्रम सुधार तथा भारत में स्वाधीनता के साथ समतावादी समाज की आकांक्षा वाली बंधुता को लेकर आता है।



उत्पत्ति और प्रभाव : भिन्न अनुभव की विचारपद्धतियाँ

सामाजिक आंदोलन की उत्पत्ति की विचार पद्धतियां इसके कारणों के विभिन्न प्रकारों की खोज करती हैं।

1- जब जन समुदाय को विशिष्ट जन प्रजातांत्रिक व्यवस्था से बेदखल कर सोद्देश्य  विस्थापित तथा विघटित कर देते हैं तो यह परायापन सामाजिक आंदोलन की अपील को बढ़ा देता है।

2- व्यक्तियों के श्रेणीकरण की विषयनिष्ठ असंगतियां तनावों को उत्पन्न कर असंतोष तथा विरोध को प्रकट करती हैं।

3- कोई भी गंभीर संरचनात्मक तनाव जैसे विघटन, व्याकुलता तथा शत्रुता सामाजिक आंदोलन को अभिव्यक्त करने में सहायक हो सकता है।

4- मार्क्सवादी विश्लेषण में संपन्न विपन्न का संघर्ष आंदोलन है जिसका कारण आर्थिक अभाव है।

5- सांस्कृतिक पुनर्जीवन आंदोलन अपने लिए अधिक संतोषजनक संस्कृति निर्मित करने के लिए होते हैं।



घटक : आन्दोलन के आधार

पारंपरिक रूप से सिद्धांतवाद, सामूहिक लामबंदी, संगठन तथा नेतृत्व की पहचान सामाजिक आंदोलनों के प्रमुख घटकों के रूप में की गई है। जबकि नए सामाजिक आंदोलनों के उभरने से मूल्यों, संस्कृति, वैयक्तिकता, आदर्शवाद, नैतिकता ,पहचान, सामर्थ्य आदि के मुद्दों से इन प्रयासों में नई पहचान तथा अतिरिक्त प्रभाविता मिलती है।



प्रकार : संघर्षों की भिन्न अभिव्यक्तियाँ

अलग-अलग सामाजिक संरचनाओं की भिन्न स्थितियों के तनाव से उत्पन्न संघर्ष सामाजिक आंदोलनों को भिन्न प्रकारों में बांटते हैं।

1- औद्योगिक असंतोष, श्रमिक हड़ताल, कर्मचारियों का आंदोलन तथा कृषक आंदोलन अपने सामूहिक हितों के प्रतिस्पर्धात्मक प्रयास होते हैं।

2- झारखंड, उत्तराखंड तथा तेलंगाना के आंदोलन सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पहचानो के पुनर्निर्माण से जुड़े थे।

3- जाट आंदोलन, छात्र आंदोलन तथा राजनीतिक दलों के आंदोलनों में जाम, हड़ताल तथा बंदी जैसी कार्यवाईयां, राजनीतिक तथा सामाजिक शक्ति प्रदर्शन द्वारा दबाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से होते हैं।

4- कई बार समाज के अभिजन समूह के आंदोलन अपने विशेष अधिकारों की प्रतिरक्षा से जुड़े होते हैं।

5- खास सांस्कृतिक पैटर्न की निर्माण, प्रसार या जुड़ाव के द्वारा समाज पर नियंत्रण या उसे नए सांचे में ढालने की कोशिश की जाती है जैसे स्त्री आंदोलन या जाति आंदोलन के द्वारा।

6- ऐतिहासिक संघर्ष अपने चरम रूप में राष्ट्रीय संघर्ष आंदोलन होते हैं जैसे भारत का स्वतंत्रता संघर्ष का आंदोलन।



निष्कर्ष : लोकतांत्रिक समाज के लिए

सामाजिक आंदोलनों ने हाशिया ग्रस्त समूहों और अधिकार वंचित तबकों की राजनीति को बढ़ावा दिया है तथा सामाजिक परिवर्तन का कारण बना है इसी वजह से यह माना जाता है कि समकालीन लोकतंत्र अपने विस्तार और गहराई के लिए सामाजिक आंदोलनों का ऋणी है।


                      

       सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त 


समाज में सामाजिक परिवर्तन किन कारणों से तथा किन नियमों के अन्तर्गत होता है, उनकी गति एवं दिशा क्या होती है, इन प्रश्नों को लेकर प्राचीन समय से आज तक विद्वान अपने-अपने मत व्यक्त करते रहे हैं ।

1. चक्रीय सिद्धान्त : ओस्वाल्ड स्पेंगलर

सामाजिक परिवर्तन के बारे में अपना चक्रीय सिद्धान्त जर्मन विद्वान ओस्वाल्ड स्पेंगलर ने अपनी पुस्तक ‘The Decline of the West’ में प्रस्तुत किया । उन्होंने कहा कि परिवर्तन कभी भी एक सीधी रेखा में नहीं होता है । सामाजिक परिवर्तन का एक चक्र चलता है, हम जहाँ से प्रारम्भ होते हैं, घूम-फिर कर पुन: वहीं पहुँच जाते हैं । अपनी बात को सिद्ध करने के लिए स्पेंगलर ने विश्व की आठ सभ्यताओं यथा अरब, मिश्र, मेजियन, माया, रूसी एवं पश्चिमी संस्कृतियों आदि का उल्लेख किया और उनके उत्थान एवं पतन को दर्शाया । पश्चिमी सभ्यता के बारे में स्पेंगलर ने कहा कि यह अपने विकास की चरम सीमा पर पहुँच गयी है । उनके अनुसार पश्चिमी समाजों का आज जो दबदबा है, वह भविष्य में समाप्त हो जायेगा और उनकी सभ्यता एवं शक्ति नष्ट हो जायेगी । दूसरी ओर एशिया के देश जो अब तक पिछड़े हुए कमजोर एवं सुस्त हैं वे अपनी आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के कारण प्रगति एवं निर्माण के पथ पर बढेंगे तथा पश्चिमी समाजों के लिए एक चुनौती बन जायेंगे ।

अंग्रेज इतिहासकार अर्नाल्ड जे. टॉयनबी ने विश्व की 21 सभ्यताओं का अध्ययन किया तथा अपनी पुस्तक ‘A Study of History’ में सामाजिक परिवर्तन का अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया । टॉयनबी के सिद्धान्त को ‘चुनौती एवं प्रत्युतर का सिद्धान्त’ भी कहते है । उनके अनुसार प्रत्येक सभ्यता को प्रारम्भ में प्रकृति एवं मानव द्वारा चुनौती दी जाती है । इस चुनौती का सामना करने के लिए व्यक्ति को अनुकूलन की आवश्यकता होती है इस चुनौती के प्रत्युत्तर में व्यक्ति सभ्यता व संस्कृति का निर्माण करता है ।


2. रेखीय सिद्धान्त : कॉम्टे

रेखीय सिद्धान्तकारों, में कॉम्टे ने सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध मानव के बौद्धिक विकास से जोड़ा है तथा इसके तीन स्तरों की पहचान की है।

(a) धार्मिक स्तर:
यह समाज की प्राथमिक अवस्था थी । इसमें मानव प्रत्येक घटना को ईश्वर एवं धर्म के सन्दर्भ में समझने का प्रयत्न करता था विश्व की सभी क्रियाओं का आधार धर्म और ईश्वर को ही माना जाता था उस समय अलग- अलग स्थानों पर धर्म के विभिन्न रूप जैसे बहुदेतवाद, एकदेववाद अथवा प्रकृति पूजा प्रचलित थे ।

(b) तात्विक स्तर:
इसमें घटनाओं की व्याख्या उनके गुणों के आधार पर की जाती थी । इस अवस्था में अलौकिक शक्ति में विश्वास कम हुआ और प्राणियों में विद्यमान अमूर्त शक्ति को ही समस्त घटनाओं के लिए उत्तरदायी माना गया ।

(c) वैज्ञानिक स्तर:
यह वर्तमान में विद्यमान है । इसमें मानव सांसारिक घटनाओं की व्याख्या धर्म ईश्वर एवं अलौकिक शक्ति के आधार पर नहीं करता वरन् वैज्ञानिक नियमों एवं तर्क के आधार पर करता है । वह कार्य और कारण के सह-सम्बन्धों को ज्ञात कर नियमों एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है ।


3. आर्थिक सिद्धान्त : कार्ल मार्क्स

कार्ल मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन को आर्थिक कारकों से जनित माना है । अतः उनके सिद्धान्त को आर्थिक निर्धारणवाद अथवा सामाजिक परिवर्तन का आर्थिक सिद्धान्त कहा जाता है । उन्होंने इतिहास की भौतिक व्याख्या की और कहा कि मानव इतिहास में अब तक जो परिवर्तन हुए है वे उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन के कारण ही हुए हैं जनसंख्या भौगोलिक परिस्थितियों एवं अन्य कारकों का मानव के जीवन पर प्रभाव तो पड़ता है किन्तु वे परिवर्तन के निर्णायक कारक नहीं हैं । निर्णायक कारक तो आर्थिक कारक अर्थात् उत्पादन-प्रणाली ही है ।

उत्पादन-प्रणाली में परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है जब उत्पादन के उपकरणों (प्रौद्योगिकी) उत्पादन के कौशल, ज्ञान उत्पादन के सम्बन्ध आदि में परिवर्तन आता है तो सम्पूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक अधि-संरचना में भी परिवर्तन आता है जो सामाजिक परिवर्तन कहलाता है ।

मार्क्स के अनुसार इतिहास के प्रत्येक युग में दो वर्ग रहे है । मानव समाज का इतिहास इन दो वर्गों के संघर्ष का ही इतिहास है । उन्होंने समाज के विकास को पाँच युगों में बाँटा और प्रत्येक युग में पाये जाने वाले दो वर्गों का उल्लेख किया एक वह वर्ग जिसका उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व रहा है और दूसरा वह जो श्रम के द्वारा जीवनयापन करता है । इन दोनों वर्गों में अपने-अपने हितों को लेकर संघर्ष होता रहा है । प्रत्येक वर्ग-संघर्ष का अन्त नये समाज एवं नये वर्गों के उदय के रूप में हुआ है । वर्तमान में भी पूँजीपति और श्रमिक दो वर्ग हैं जो अपने अपने हितों को लेकर संघर्षरत है ।



4. प्रौद्योगिक सिद्धान्त : वेबलिन

वेबलिन सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रौद्योगिक दशाओं को उत्तरदायी मानते हैं । प्रौद्योगिक दशाएं प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है । इसलिए उनके सिद्धान्त को ‘प्रौद्योगिक निर्णयवाद’ भी कहा जाता है ।

वेबलिन ने मानवीय विशेषताओं को दो भागों में विभाजित किया है:

(i) स्थिर विशेषताएँ- जिनका सम्बन्ध मानव की मूल प्रवृत्तियों और प्रेरणाओं से है जिनमें बहुत कम परिवर्तन होता है ।

(ii) परिवर्तनशील विशेषताएँ- जैसे आदतें, विचार एवं मनोवृत्तियाँ आदि । सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध मानव की इन दूसरी विशेषताओं विशेष रूप से मानव की विचार करने की आदतों से है ।

मनुष्य अपनी आदतों द्वारा नियन्त्रित होता है और उनका दास है । ये आदतें किस प्रकार की होंगी यह मानव के भौतिक पर्यावरण विशेषकर प्रौद्योगिकी पर निर्भर है जब भौतिक पर्यावरण अर्थात् प्रौद्योगिकी में परिवर्तन आता है तो मानव की आदतें भी बदलती है मानव जिस प्रकार के कार्य तथा प्रविधि द्वारा जीवनयापन करता है, उसी प्रकार की उसकी आदतें एवं मनोवृतियाँ होती हैं जीवनयापन के लिए मनुष्य जिस प्रकार की प्रविधि को अपनाता है, अपनी आदतों को भी वह उनके अनुकूल ढालता है ।

कृषि कार्य के आधार पर ही मानव की आदत एवं मनोवृत्तियाँ बनी हुई थीं । किन्तु जब मशीनों का आविष्कार हुआ तो मानव का भौतिक पर्यावरण बदला प्रौद्योगिकी बदली, काम की प्रकृति बदली और उसके साथ-साथ मानव की आदतों एवं मनोवृत्तियों में भी परिवर्तन आया ।

आदतें ही धीरे-धीरे स्थापित एवं सुदृढ़ होकर संस्थाओं का रूप ग्रहण करती हैं संस्थाएँ ही सामाजिक ढाँचे का निर्माण करती हैं । अतः आदतों में परिवर्तन होता है तो सामाजिक संस्थाओं एवं ढाँचे में परिवर्तन आता है जिसे हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं ।

सामाजिक संरचना में परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन है । इस प्रकार वेबलिन सामाजिक परिवर्तन को नवीन प्रविधियों एवं प्रौद्योगिक कारकों से उत्पन्न मानते हैं । इसलिए उन्हें प्रौद्योगिक निश्चयवादी कहा जाता है ।



5 - सांस्कृतिक सिद्धान्त : वेबर

वेबर में सामाजिक परिवर्तन के लिए सांस्कृतिक कारक विशेषतया धर्म को उत्तरदायी माना है । विश्व के प्रमुख धर्मों का विशद् अध्ययन करके वेबर ने यह दिखाने का प्रयत्न किया कि धर्म व आर्थिक-सामाजिक घटनाओं में क्या सम्बन्ध है। 

उन्होंन अध्ययन के आधार पर यह दर्शाने का प्रयत्न किया कि आधुनिक पूंजीवाद केवल पश्चिमी देशों में सबसे पहले क्यों आया, अन्य देशों में क्यों नहीं ? धर्म एवं आर्थिक जीवन के सम्बन्धों के अध्ययन को आपने ‘दी प्रोटेस्टेण्ट स्प्रिट एण्ड इथिक दि ऑफ कैपिटलिज्म’ नामक पुस्तक में प्रकाशित किया है।

अपनी पद्धतिशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि के द्वारा वेबर ने प्रोटेस्टेण्ट धर्म के उन आचारों को ढूँढा जिन्होंने आधुनिक पूंजीवाद की आत्मा को विकसित किया । उन्होंने धर्म को एक परिवर्तनीय तत्व माना और यह दर्शाया कि धर्म किस प्रकार मानव के सामाजिक और आर्थिक जीवन को प्रभावित करता है ।

धार्मिक और आर्थिक कारकों के सम्बन्धों को जानने के लिए वेबर ने विश्व के छ: प्रमुख धर्मों (हिन्दू, बौद्ध, ईसाई, कन्फ्युशियस, इस्लाम तथा यहूदी धर्म) का अध्ययन किया और प्रत्येक धर्म में पाये जाने वाले उन आर्थिक विचारों को ज्ञात किया जो उस धर्म से सम्बन्धित लोगों के आर्थिक व सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं अपने अध्ययन के आधार पर वेबर ने यह प्रकट किया कि केवल प्रोटेस्टेण्ट धर्म में ही कुछ ऐसे आर्थिक विचार पाये जाते है जिन्होंने आधुनिक पूँजीवाद को जन्म दिया, यद्यपि इसके लिए अन्य कारक भी उत्तरदायी रहे है ।

वेबर कहते है कि यूरोप में जब रोमन कैथोलिक धर्म प्रचलित था तो पूँजीवाद नहीं पनपा किन्तु धार्मिक सुधार आन्दोलन के कारण जब प्रोटेस्टैण्ट धर्म का उदय हुआ तो आधुनिक पूँजीवाद का भी उदय हुआ ।

प्रोटेस्टेण्टवाद वह धार्मिक विचारधारा है जो पोप के अधिकार को स्वीकार नहीं करता और जिसमें विवेक का तत्व विशेष रूप से पाया जाता है । नैतिकतावादी दृष्टिकोण, संग्रह की प्रवृत्ति, ईमानदारी, श्रम के प्रति निष्ठा, ये सभी प्रोटेस्टेट धर्म के प्रमुख तत्व हैं जिनके कारण यूरोप के विभिन्न देशों में आर्थिक विकास, विशेषत: पूँजीवाद का विकास हुआ ।

प्रोटेस्टेण्ट धर्म की नीति के रूप में सेण्ट पॉल के इस आदेश को व्यापक रूप से ग्रहण किया गया- “जो व्यक्ति काम नहीं करेगा, वह रोटी नहीं खायेगा तथा निर्धन की तरह धनवान भी ईश्वर के गौरव को बढ़ाने के लिए किसी न किसी व्यवसाय में अवश्य जुटे ।”


वेबर ने प्रोटेस्टेण्ट धर्म में पाये जाने वाले उन आचारों का भी उल्लेख किया है जिन्होंने आधुनिक पूँजीवाद को जन्म दिया बेंजामिन फ्रेंकलिन ने आधुनिक पूँजीवाद की उन शिक्षाओं एवं उपदेशों का उल्लेख किया है जो सफल व्यवसायी एवं पूँजीपति बनने के लिए आवश्यक हैं । वे हैं- “समय ही धन है” “धन से धन कमाया जाता है”, “एक पैसा बचाना एक पैसा कमाना है”, “ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है”, “जल्दी सोना और जल्दी उठना व्यक्ति को स्वस्थ, धनी और बुद्धिमान बनाता है”, “कार्य ही पूजा है ।” प्रोटेस्टेण्ट धर्म के आचारों की तुलना दुनियाँ के दूसरे धर्मों से करके वेबर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि केवल प्रोटेस्टेण्ट धर्म ही ऐसा हे कि जिसके, आर्थिक परिणाम अधिक स्पष्ट एवं दूरगामी हैं ।

यह धर्म लोगों को ईमानदार एवं उत्साही होने, परिश्रम करने, मितव्ययिता बरतने एवं पैसा बचाने पर जोर देता है जो पूँजीवाद लाने के लिए आवश्यक है । यदि ये सिद्धान्त एवं उपदेश न होते तो आधुनिक पूँजीवाद भी सम्भव नहीं होता ।

अपनी बात की पुष्टि करने के लिए वेबर ने यूरोप के विभिन्न देशों से ऐतिहासिक प्रमाण जुटाये । इटली व स्पेन में जहाँ पर कैथोलिक धर्म के अनुयायी अधिक हैं, पूँजीवाद का विकास इंग्लैण्ड, अमेरीका व हालैण्ड की अपेक्षा कम हुआ ।

हिन्दू धर्म भौतिकवाद के स्थान पर आध्यात्मवाद पर अधिक जोर देता है । कर्मवाद के सिद्धान्त के आधार पर पिछले जन्म के कर्म के आधार पर ही इस जन्म में फल मिलता है । इसी प्रकार से, जाति के कठोर नियम व्यक्ति को अपनी जाति के व्यवसाय को त्यागने की इजाजत नहीं देते और प्रत्येक जाति के लिए एक व्यवसाय भी निश्चित है । हिन्दू धर्म एक ऐसी समाज-व्यवस्था को जन्म देता है जिसमें सामाजिक गतिशीलता सम्भव नहीं है । 

इस प्रकार वेबर ने प्रोटेस्टेण्ट आचार और आधुनिक पूँजीवाद के विकास को कार्य-कारण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयत्न किया और प्रोटेस्टेण्ट आचारों को पूँजीवाद के विकास के लिए एक प्रभावशाली कारक माना यद्यपि अन्य कारक भी इसके विकास के उत्तरदायी रहे है ।


                                  
 
सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में:- सामाजिक विचार




सामाजिक विचार, विचार की वह शाखा है जो मुख्य रूप से मानव के सामान्य सामाजिक जीवन और उसकी समस्याओं के साथ संबंधित है, जो मानव अंतर्संबंधों और अंतःक्रियाओं द्वारा निर्मित और व्यक्त है। ई.एस. बोगार्डस ने सामाजिक विचारों को यह कहकर परिभाषित किया है कि, "सामाजिक विचार सामाजिक समस्याओं के बारे में एक या कुछ व्यक्तियों की मानव इतिहास में या वर्तमान में उनकी सोच रहा है।"



सामाजिक प्रश्नों के बारे में विचार करने वाले समूह के अर्थ में अधिकांश सामाजिक विचारों ने ज्ञान में भले ही बहुत कम योगदान दिया हो लेकिन इनके आन्दोलनकारी तथा परिवर्तनकामी प्रभाव व्यापक रहे हैं। चर्चा-समूह की सोच अपने उच्च स्तरों पर सामाजिक सोच को दर्शाती रही है, लेकिन चर्चा-समूह की सोच अभी तक व्यापक नहीं है। हालांकि, हालफिलहाल के वर्षों में सोशल मीडिया ने जिस तरह चर्चा समूह जैसे फेसबुक ग्रुप और वाट्सएप्प ग्रुप के रूप में न केवल चर्चा समूहों का आसान निर्माण संभव किया है बल्कि प्रभावी  कार्यवाहियों के लिए प्रेरित किया है, को देखते हुए जो परिदृश्य उभर रहे हैं, भविष्य में इससे काफी हद तक उम्मीद की जा सकती है। वास्तव में यह "मुखरता" सामाजिक आन्दोलन बन चुकी है जो समाज के मुख्य प्रकार का परिवर्तनकामी विचार बन जाने का वायदा करता है।



सामाजिक जीवन के बारे में व्यक्तियों की सोच तीन श्रेणियों में आती है:

1. पहली श्रेणी उन समूहों के रूप में सामने आती है जो मानव समुदायों की उन्नति को अपना उद्देश्य बनाते हैं। जैसे सरोकारी बुद्धिजीवी यथा फुले, अम्बेडकर तथा गांधी।

2. दूसरी श्रेणी किसी विशेष समूह या समूह के लाभ के लिए मानव के जोड़तोड़ का जिक्र करता है। जैसे सत्ता या पद की आकांक्षा वाला राजनीतिक समूह या राजनीतिक नेता या कार्यकर्ता।

3. तीसरी श्रेणी का उद्देश्य अंतर्निहित सामाजिक प्रक्रियाओं और कानूनों का विश्लेषण करना है, बिना किसी उपयोग या प्रभाव की आकांक्षा किये । निरपेक्ष बुद्धिजीवी यथा सामाजिक विश्लेषक, विचारक, शिक्षक।



सामाजिक विचारों की विशेषताएं: 

सामाजिक विचार मुख्य रूप से सामाजिक समस्याओं से उत्पन्न होते हैं।

बोगार्डस के अनुसार, सामाजिक विचारों की निम्नलिखित विशेषताएं हैं:

1. सामाजिक विचार सामाजिक समस्याओं से उत्पन्न होते हैं। जैसे जाति विभेद से समतावादी समाज का विचार।

2. सामाजिक विचार मानव के सामाजिक जीवन से संबंधित हैं। जाति उच्छेद का विचार, जातीय दमन से जुड़ा है।

3. यह सामाजिक संबंधों और अंतर्संबंधों का परिणाम है। जैसे जाति व्यवस्था, वर्णव्यवस्था ।

4. सामाजिक विचार समय और स्थान से प्रभावित होते हैं। जैसे महाराष्ट्र की विशेष पृष्टभूमि और फुले अम्बेडकर।

5. विचारक अपने सामाजिक जीवन और व्यक्तिगत अनुभवों से बहुत प्रभावित होते हैं। माली और महार जीवन की त्रासदी फुले, अम्बेडकर।

6. यह सभ्यता और संस्कृति के विकास को प्रेरित करता है। जैसे आधुनिकता और लोकतंत्र के मूल्य स्वतंत्रता समता और बंधुता।

7. सामाजिक विचार अमूर्त सोच पर आधारित होते हैं। सामाजिक धारा के प्रतिकूल सोच। तिलक के दौर में फुले, राष्ट्रवादी समय में "जाति" की मुखरता

8. यह सामाजिक उपयोगिता का एक अभिन्न अंग है। जैसे भारत को एक योग्य संविधान निर्माता मिला, समतावादी लोकतांत्रिक मजबूत समाज और राष्ट्र का निर्माण।

9. यह सामाजिक रिश्तों को बढ़ावा देने में मदद करता है। बंधुता।

10. यह न तो निरपेक्ष है और न ही स्थिर है। यह विकासवादी है।



सामाजिक विचारों के स्तर:

प्रत्येक समाज में सामाजिक चिंतन के तीन चरण या स्तर होते हैं:


1. सामाजिक रूप से लाभकारी चिंतन:

यह आमतौर पर प्रगतिशील या रचनात्मक सामाजिक प्रस्तावों से युक्त होती है, जिन्हें स्पष्ट रूप से समाज में प्रगतिशील बदलाव लाने के लिए डिज़ाइन किया जाता है। इससे समाज का कल्याण होता है। विचारक मानवता के कानून से प्रेरित होते हैं।


2. नकारात्मक सामाजिक चिंतन:

इसमें स्वार्थ, सामान्य कल्याण की अवहेलना आदि की विशेषता होती है। यह प्रकृति में पारलौकिक और प्रतिगामी है। इस नकारात्मक प्रकार की सामाजिक सोच में बहुसंख्यकों के कल्याण पर ध्यान नहीं दिया जाता है। सत्ता या विशेष अधिकार प्राप्त लोग अपने हित को साधते हैं तथा परिस्थिति को अपने पक्ष में हेरफेर कर स्थिति का लाभ उठाते हैं।


3. वैज्ञानिक सामाजिक चिंतन:

यह वर्तमान का प्रगतिवादी लोकतांत्रिक तर्कवाद है। यह वर्तमान समाज की चाहत है। यह सोच निष्पक्ष और उदार होने का दावा करती है। यह एक प्रकार की ऐसी सोच है जो सामूहिक कल्याण को बढ़ावा देती है। इस प्रकार की सोच का वैज्ञानिक रूप से विचार या विश्लेषण किया जा सकता है।



सामाजिक चिंतन का इतिहास

परिवर्तन की शाश्वतता को धारण करने वाले मानव समाज के आरंभिक दौर से ही सामाजिक चिंतन अपने आदिम स्वरूप में एक शक्ति के रूप में रहा है। समाज में उभर आई समस्याओं के हर निदानों में सामाजिक चिंतन व्याप्त रहा है। कवियों, शिक्षकों, संतों, सुधारकों तथा उपदेशकों की बातों में तथा धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलनों की प्रत्येक कार्यवाईयों में इसे साफ तौर पर अपने समय के मुहावरों में देखा जा सकता है।

प्लेटो के समय से ही दिखने वाला सामाजिक चिंतन , इब्न खल्दून की मुक़द्दीमा में सामाजिक एकता और सामाजिक संघर्ष के सामाजिक-वैज्ञानिक विचारों को आगे  लाता है। जबकि रुसो और वाल्तेयर के आंदोलन से प्रेरित फ्रांसीसी क्रांति की व्याकुलता के शीघ्र बाद ही लिखते हुए, ऑगस्ट काम्टे ने प्रस्थापित किया कि सामाजिक निश्चयात्मकता के माध्यम से सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। 19वी सदी में उभरती आधुनिकता की चुनौतियों, जैसे औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और वैज्ञानिक पुनर्गठन की शैक्षणिक अनुक्रिया, आरंभिक समाजवादियों के चिंतन में दिखती है। परिवर्तन की तीव्रता और बदलती सामाजिक संरचना की भिन्न समझ सामाजिक विचारों की असंख्य लहर निर्मित करती है।

आधुनिक भारत में जाति विभेद की सामाजिक संरचना के अनुभव ने फुले, अम्बेडकर को जन्म दिया जिन्होंने इससे निज़ात के लिए आंदोलन किया तथा इससे  और लोगों को जोड़ कर इसे और मजबूत किया बल्कि इनके चिंतन ने इसे और धार प्रदान किया तथा सामाजिक परिवर्तन को जन्म दिया। इस प्रकार भारत एक समतावादी समाज की तरफ अग्रसर हुआ।

                                  
                                       


    सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में:-सामाजिक वर्ग

सामाजिक वर्ग, सामाजिक स्तरीकरण से जुड़ी अवधारणा है। क्लासिक सामाजिक आंदोलनों को सामान्यतः उनके वर्ग घटकों के आधार पर समझा जा सकता है क्योंकि ये अधिकत्तर 'वर्ग बद्ध' आंदोलन होते हैं। सरलतम शब्दों में यहां सामाजिक वर्ग का अर्थ है:-

1-  जनसंख्या का असमान समूह में विभाजित होना।

2-  संसाधनों में विभेदी वितरण के कारण समूहों के बीच आर्थिक असमानता का होना।

3- अभिजन समूहों को आर्थिक संसाधनों के स्वामित्व तथा नियंत्रण में उनकी आवश्यकता से अधिक भाग का मिलना तथा इसके परिणाम स्वरूप बहुजनों को कम भाग का मिलना।

4- संपत्ति तथा संसाधनों के इस असमान वितरण की दोषपूर्ण प्रणाली के कारण अमीर गरीब तथा मध्यवर्गी तथा श्रमजीवी वर्गों का जन्म होना।

5-  गरीबों में 'एक ही नाव में सवार होने' यानी एक सी स्थिति के कारण वर्ग एकता का बोध विकसित कर लेना तथा अपने से उच्च वर्ग के साथ एक विरोधी संबंध बना लेना।

6- भारत में जाति व्यवस्था अपनी विशिष्टताओं में एक वर्ग भी है। जाति व्यवस्था एक "बंद वर्ग" है जो इसे और जटिल, कठोर, परिवर्तनहीन तथा सुधार से परे बनाता है। इसलिए इससे जुड़े सामाजिक आन्दोलन परिवर्तन के रूप में संरचनाओं को उलट देना चाहतें हैं।


सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में:- सामाजिक संरचना

सामाजिक आंदोलन सामाजिक संरचनाओं में उभर आए दोषों, उनके तनाव या उनकी ईकाईयों के बीच प्रतिस्पर्धा के परिणाम होते हैं सामाजिक संरचना की विशेषताएं इनकी कारक बन जाती हैं। सामाजिक संरचना शारीरिक अंगों तथा उनकी पारस्परिक निर्भरता की तरह होती है सामाजिक संरचना का अभिप्राय समाज की इकाइयों के क्रमबद्धता तथा उनके आपसी संबंधों से होता है। समूह समिति, संस्थान परिवार तथा सामाजिक प्रतिमान और उनके संबंधों को सामाजिक संरचना कहते हैं।

1- सामाजिक संरचना अमूर्त होती है तथा अनेक उप संरचनाओं से मिलकर बनती है।

2 - संरचना की इकाइयां परस्पर संबंधित होकर एक ढांचे का निर्माण करती है जिससे उनके स्वरूप का बोध होता है।

3- संरचना की इकाइयों के आपसी संबंधों तथा क्रमबद्धता में आई किसी कमी से संरचना कायम नहीं रह पाती है।

4-  इकाइयों का पद और स्थान पूर्व निर्धारित होता है जिन्हें प्रतिस्थापित करने की कोशिश  परिवर्तन को जन्म देती है।

5- प्रत्येक समाज की संस्कृति भिन्न-भिन्न होती है अतः संस्कृति द्वारा निर्धारित प्रतिमान में भिन्नता के कारण संरचना भी भिन्न-भिन्न होती है।

6- सामाजिक संरचना स्थानीय विशेषताओं से प्रभावित होती है प्रत्येक समाज की संस्कृति स्थानीय परिवेश के अनुकूलन के परिणाम स्वरूप विकसित होती है।

7- सामाजिक प्रक्रिया सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण पक्ष है। समाज में सहयोग व्यवस्थापक्ष, अनुकूलन, प्रतिस्पर्धा जैसी प्रक्रिया चलती रहती है।

8-  सामाजिक संरचना में अनुकूलन की क्षमता होती है।


इस प्रकार अगर हम उदाहरण के तौर पर फ्रांस, रूस, ब्रिटेन तथा भारत की सामाजिक संरचना को गौर से देखें तो  यहां के आंदोलनों पर न केवल असर डालती हैं बल्कि परिवर्तन के स्वरूप को भी प्रभावित करती हैं ।

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

सहिष्णुता नहीं बंधुता चाहिये

क्रिस्टोफर नोलन द्वारा निर्देशित और लियोनार्डो डी कैप्रियो द्वारा अभिनीत विज्ञान गल्प फ़िल्म इन्सेप्शन में दो महत्वपूर्ण कल्पनायें की गई हैं पहली कि यदि हम किसी  स्वप्न में लंबे समय तक रहें तो हमें हमारा स्वप्न ही यथार्थ लगता है और हमारा यथार्थ स्वप्न प्रतीत होता है। दूसरी जो महत्वपूर्ण कल्पना की गई है वह है कि कोई हमारे स्वप्न में आकर या अपने स्वप्न में बुलाकर न केवल हमारे विचारों को चुरा सकता है बल्कि वह हमारे अंतर्मन में नए विचारों का इज़ाद भी कर सकता है और हमें इसकी भनक भी नहीं लग सकती। भारतीय इतिहास का औपनिवेशिक काल एक तरह का इन्सेप्शन ही रहा है। आजादी के इतने सालों बाद भी हम इससे पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। यह नए सिरे से फिर प्रारम्भ हुआ लगता है। भारत में सकारात्मक और परिणामी संवाद के विचार कहीं चोरी हुए से लगतें हैं और लगता है कि जैसे संघर्ष के विचारों को भारत के अंतर्मन में रोप दिया गया हो। हर एक के बरक्स हर एक का संघर्ष जैसे हमारी स्थाई नियति बनती जा रही है। प्रेम, मिलन, और समर्पण के शब्द जैसे गायब किये जा रहें हैं इसकी जगह पर नफ़रत, अलगाव और संघर्ष के शब्द ढूंढे जा रहें हैं। निशाने पर लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गई सरकार, राष्ट्र और हमारा समाज दोनों हैं।

क्या 1976 के पहले भारत समाजवादी नहीं था या बाद में पूंजीवादी नीतियों ने सहयोग नहीं किया। पंथनिरपेक्ष संविधान वाले भारत में राजीव गांधी ने शाहबानो जैसो के लिए क्या किया और क्या यह राममंदिर के दुष्परिणामी ताला खुलने की वजह नहीं बना ? क्या अखंडता शब्द नक्सलवाद और कश्मीरी आतंकवाद इत्यादि को बढ़ने से रोक पाया। हमने उन धारणाओं को जो समाज और राज्य के मानस में होने चाहिए वहां से हटा कर संविधान की शोभा मात्र बना कर रख दिया। समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता के बाद एक और शब्द भविष्य में संविधान में जगह पाने का इन्तजार कर रहा है। शायद यह सहिष्णुता पिछले साल का सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाने वाला शब्द है। यह संविधान में जगह पाये अपने पूर्ववर्तियों से अलग होगा लेकिन कुछ कुछ पंथनिरपेक्ष शब्द जैसा ही इसका हश्र होगा। मगर चिंता की बात यह है कि इससे पहले ही भारत के राजनीतिक सामाजिक जीवन में इसकी जगह बनाई जा चुकी है। सहिष्णुता एक विरोधाभाषी शब्द है और असहिष्णुता तो चरम विरोधाभाषी है। इसका विरोधाभास वाल्ज़र के इस प्रश्न में दिखता है जिसमे वे कहते है कि क्या हम असहिष्णुता के प्रति सहिष्णु हो सकतें हैं।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में सहिष्णुता एक पूर्णतया नकारात्मक शब्द और विचार है जो संविधान विरुद्ध भी है। ज्यादा सहज शब्दों में कहा जाय तो सहिष्णुता का अभिप्राय उन चीजों को सहन करना या बर्दास्त करना है जिसे हम नापसंद करतें हैं। यह मन का बोझ है। प्रश्न उठता है कि गलत चीजों को हम क्यों और कब तक बर्दास्त करें और अगर बात सही है तो हम उसे क्यों स्वीकार नहीं करें। सवाल यह भी उठता है कि हम कोई गलत बात करें ही क्यों जिससे उसे किसी को बर्दास्त करना पड़े। किसी को गाली देकर हम कब तक उससे सहिष्णुता की उम्मीद रख सकतें हैं। अपराध के शिकार व्यक्ति के प्रतिरोध को हम असहिष्णु कह कर कब तक उसका खून जलातें रहेंगे। सहिष्णुता और असहिष्णुता का खेल वर्चश्व के शोर से ज्यादा कुछ नहीं है। यह प्रतिरोध के स्वर को मुर्दा शांति से भर देने का एक षड़यंत्र मात्र है। यह एक सामाजिक पाखंड है जो अस्वीकार्यता को स्वीकृति देता है। समाज को हमेशा उस दहलीज पर रखता है जहाँ कोई भी छोटी चिंगारी इसमें आग लगा देती है। सहिष्णुता का विचार हमें ऐसा समाज मुहैय्या कराता है जिसमे नफ़रत का विचार साथ साथ चलता है जो सहमति और स्वीकार्यता में बाधा बनता है।

सहिष्णुता से इतर बंधुता एक संविधान सम्मत शब्द और विचार है। यह हमारी परंपरा से भी मेल खाता है। अशोक का बारहवां दीर्घ शिलालेख अपने सम्प्रदाय को आदर देने के साथ ही दूसरे सम्प्रदाय को भी आदर देने की बात करता है। यहाँ आदर की बात हो रही है न कि बर्दास्त करने की। 1948 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंगीकृत मानव अधिकार’ की घोषणा के अनुच्छेद 1 में यह कहा गया है कि ‘‘सभी मनुष्य जन्म से ही गरिमा और अधिकारों की दृष्टि से स्वतंत्र और समान हैं। उन्हें बुद्घि और अंतश्चेतना प्रदान की गयी है। उन्हें परस्पर "भ्रातृत्व" की भावना से रहना चाहिए।’’  भारत के संविधान की कुंजी उद्देशिका में कहा गया है कि हम भारत के लोग समस्त नागरिकों में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित कराने वाली, "बंधुता" बढ़ाने के लिए इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। यहाँ उद्देश्य भारतीय नागरिकों के मध्य "बंधुत्व" की भावना स्थापित करना है, क्योंकि इस के बिना देश मे एकता स्थापित नही की जा सकती है। संविधान में "सहिष्णुता" नहीं बल्कि "बंधुता" की भावना के साथ रहने को कहा गया है। बंधुता पूर्णतया सकारात्मक मन का उल्लास है जिसमे स्वीकार्यता भरी है। यह सामाजिक प्राण वायु है। जिस प्रकार एक भाई को चोट लगे और आह दूसरे की निकले, एक की संवेदनाएं दूसरे के साथ इस प्रकार एकाकार हो जाएं कि उन्हें अलग करना ही कठिन हो जाए तो वास्तविक बंधुता वही कहलाती है। नागरिकों की ऐसी गहन संवेदनशीलता राष्ट्र निर्माण का परमावश्यक अंग है।

Popular and Aristocratic Culture in India

Introduction The cultural history of the Indian subcontinent reveals complex layers of social life, consumption, aesthetics, and power. In ...