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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

पुस्तक समीक्षा - सेपियंस


अग्नि ने हमें शक्ति दी
वार्तालाप ने हमें परस्पर सहयोग करने में मदद कीकृषि ने हमें और अधिक के लिए भूखा बनायामिथकों ने कानून और व्यवस्था कायम कीधन ने हमें एक ऐसी चीज दी जिस पर हम सचमुच् भरोसा कर सकते थेअंतर्विरोधों ने संस्कृति की रचना कीविज्ञान ने हमें घातक बनायायह साधारण वानरों से लेकर विश्व के शासकों  तक के हमारे असाधारण इतिहास का रोमांचक वर्णन है। हम बात कर रहे हैं युवाल नोआ हरारी की अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर पुस्तक सेपियंस मानव जाति का संक्षिप्त इतिहास कीजिसका हिन्दी अनुवाद मदन सोनी ने किया है। बड़ी बहसों को जन्म देने वाली यह पुस्तक अपनी उत्तेजक तथा आकर्षक भाषा से न केवल पाठकों को बाँध देती है बल्कि उसकी तमाम धारणाओं को भी ध्वस्त करती है। लेकिन यह पुस्तक अक्सर बिना स्रोत वाले दावे करती है जिससे ग्रन्थवादी इसे कल्पना कहेंगे परन्तु फिर भी इसे इतिहास की एक बेहतरीन समझ पैदा करने वाली पुस्तक कहा जाएगा क्योंकि अगर हम प्रशिक्षित इतिहासकार रामशरण शर्मा से कुछ शब्द उधार लें तो तो कह सकते हैं कि ‘कल्पना नहीं तो इतिहास नहीं’।

यह पुस्तक न केवल भिन्न विश्वास वाली दुनिया में इतिहास के बुनियादी आख्यानों पर सवाल उठाने के लिए हमें प्रोत्साहित करती हैबल्कि यह खोज करती है कि हमारी प्रजाति वर्चस्व की लड़ाई में किस तरह कामयाब हुई हमारे आहार खोजी पूर्वज नगरों और राजवंशों का निर्माण करने के लिए क्यों एकजुट हुए हमने देवताओंराष्ट्रोंऔर मानव अधिकारों में विश्वास करना कैसे शुरु किया साथ ही यह पुस्तक आने वाली सहस्त्राब्दियों में हमारी दुनिया कैसी होगी इसकी भी पड़ताल करती है। लगभग साढ़े चार सौ पृष्ठों वाली यह पुस्तक चार भागों में तथा बीस अध्यायों में बटी हुई है।

पुस्तक के प्रथम भाग में सेपियंस की क़ामयाबी के रहस्य से पर्दा उठाया गया है। इंसानऔर प्रजातियों से अलग है क्योंकि इन्सान अनंत अंतहीन कहानियां बना सकता है। इन्सान ने अपनी अनूठी तथा लचीली भाषा की वजह से दुनिया पर विजय प्राप्त की है। हरारी इसे संज्ञानात्मक क्रांति कहते हैंजिसने 70000 साल पहले इतिहास को क्रियाशील बना दिया। इस गपबाज़ी ने उस ज्ञान के वृक्ष का निर्माण किया जिसने न केवल आने वाली पीढ़ियों को अपनी इस कुशलता को हस्तांतरित किया बल्कि जीन समूह को भी बाईपास किया। इसने दुनिया के बारे में सूचना को दक्षता के साथ  प्रसारित किया जिसके परिणामस्वरूप सेपियंस ने न केवल योजना बनाना सीखा बल्कि उसे क्रियान्वित भी करने लगे।

किताब के दूसरे भाग में 12000 साल पूर्व हुई दूसरी क्रांति का विवरण हैं जिसे हम कृषि क्रांति कहते हैं। हरारी इसे इतिहास का सबसे बड़ा धोखा कहते हैं जिसमें इंसान ने गेहूं को पालतू बना लियाजी नहीं दरअसल गेहूँ ने इन्सान को पालतू बना लिया। गेहूँ ने अपने फायदे के लिए सेपियंस को नियंत्रित किया। इंसान ने चैन से घूमते हुए जीना छोड़ सारी दुनिया में गेहूँ की खेती करने लगा। चूंकि गेहूँ को कंकड़ पत्थर नहीं पसंद थे तो इंसान ने अपनी कमर तोड़ कर उन्हें खेतों से साफ किया। गेहूँ को अपनी जगहपानी और पोषक तत्वों में दूसरी वनस्पतियों से साझा करना पसंद नहीं था तो मर्द और औरतों ने तीखी धूप में निराई की। बीमारी में देखभाल की तथा कीड़ोखरगोश तथा टिड्डी से सुरक्षा प्रदान की। यहाँ तक कि गेहूं ने अपने पोषण के लिए सेपियंस को अन्य जानवरों का मल तक इकट्ठा करने को विवश किया। मनुष्य ने दयनीय अस्तित्व चुना लेकिन इससे फायदा क्या हुआगेहूँ की खेती ने क्षेत्र की प्रति इकाई को कहीं ज्यादा भोजन मुहैया कराया और इस तरह होमो सेपियंस को तीव्रतम गति से अपनी वंशवृद्धि करने में सक्षम बनाया। साथ ही इसने विलासिता का पिंजरा भी दिया। जिसकी सुरक्षा के लिए कानूनधर्मराज्य तथा समाज जैसे कल्पित वास्तविकताओं को रचा गया। इन कल्पनाओं ने उस दुश्चक्र को पैदा किया जहाँ कोई न्याय नहीं था।

पुस्तक के अगले भाग में मानव के एकीकरण की कहानी है। ईसा पूर्व पहली सहस्त्राब्दी में तीन सम्भावित वैश्विक व्यवस्थाओं का प्रादुर्भाव हुआजिसके पक्षधर पहली बार समूची दुनिया और समस्त मानव प्रजाति को नियमों की एक एकल व्यवस्था के अधीन शासित एक इकाई के रूप में कल्पित कर सके। हर कोईकम से कम सम्भावित रूप से हम‘ था। अब कोई वे‘ नहीं थे। ऐसी पहली व्यवस्था आर्थिक थी : वित्तीय व्यवस्था। दूसरी वैश्विक व्यवस्था राजनैतिक थी : साम्राज्यवादी व्यवस्था। तीसरी वैश्विक व्यवस्था धार्मिक थी : बौद्धईसाइयत और इस्लाम जैसे सार्वभौमिक धर्मों की व्यवस्था। व्यापारीविजेता और पैगम्बर वे पहले लोग थेजो हम बनाम वे‘ के युग्म परक विकासवादी विभाजन से ऊपर उठ सके और मानव-जाति की सम्भावित एकता का पूर्वानुमान कर सके। व्यापारियों के लिए पूरी दुनिया एक बाज़ार थी और सारे मनुष्य सम्भावित ग्राहक थे । उन्होंने एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था विकसित करने की कोशिश कीजो हर कहींहर किसी पर लागू हो सकती थी। विजेताओं के लिए सारी दुनिया एक एकल साम्राज्य थी और सारे मनुष्य सम्भावित प्रजा थे।पैग़म्बरों के लिए सारी दुनिया में एक ही सत्य था और सारे मनुष्य सम्भावित आस्तिक थे। उन्होंने भी एक ऐसी व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश कीजो हर कहीं हर किसी पर लागू हो सकती थी ।

पुस्तक के अंतिम भाग में पिछले 500 वर्षों के बारे में बात की गई है जब पहली बार इंसान ने अपनी अज्ञानता को स्वीकार कर उस चीज़ की शुरुआत की जो शायद इतिहास को समाप्त कर सर्वथा किसी पूरी तरह से भिन्न चीज़ की शुरुआत कर सकती हैबात हो रही है वैज्ञानिक क्रांति की। विज्ञान में अनुसंधान के द्वारा लालची इंसान ने शक्ति ग्रहण की जिसकी भनक को शीघ्र ही साम्राज्यों तथा पूंजी ने भांप कर विज्ञान के साथ गठजोड़ कर लिया। हम आज इस दौर में हैं जहाँ सिर्फ काया ही नहीं गढ़ी जाती बल्कि अंतःकरण भी गढ़ा जाता है। लेकिन हमें सचेत रहना चाहिए क्योंकि अगर हम गिलगमेश को नहीं रोक सकते तो हम डॉ फ़्रैंकेन्स्टाइन को भी नहीं रोक सकते। और सवाल यह नहीं है कि हम क्या बनना चाहते हैं बल्कि सवाल यह है कि हम क्या आकांक्षा करना चाहते है। अगर आप इन सवालों से नहीं डरते तो शायद आपने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया है।

सोमवार, 27 जनवरी 2020

पुस्तक समीक्षा : 'इस बार तेरे शहर में(2018)' और  'अक्टूबर उस साल(2019)

वर्तमान कविता जटिल जगत की यथार्थता तथा मानव की अनुभूतिजन्य आवश्यकता के मध्य संघर्ष कर रही है। त्रासदीपूर्ण विडंबना के दौर में अपने पक्ष में खड़ा व्यक्ति सामाजिक संबंधों, अपने जीवन और साहित्य को लहूलुहान कर रहा है। ऐसे में कुछ कविताएं मूल्यों की रक्षा के लिए संजीवनी दे रही है तथा संबंधों को सहज बनाने का प्रयास कर रही है। वर्तमान युग के भाव बोध को समझने और रंजीत करने की क्षमता जिन कवियों में नजर आती है उनमें से एक युवा कवि मनीष हैं।

हाल ही में उनकी दो रचनाएं 'इस बार तेरे शहर में(2018)' और  'अक्टूबर उस साल(2019)' प्रकाशित हुई हैं। दोनों रचना संग्रह भाव प्रवणता, विषय वैविध्य तथा प्रस्तुति योजना और शब्द शक्ति की दृष्टि से प्रशंसनीय हैं। इनमें जटिल यथार्थ को समेटने की शक्ति भी दिखाई पड़ती है।

'कविताओं के शब्द' कविता में कविता की भाषा के संवर्धन के महत्व व कवि की इस संदर्भ में दृष्टि स्पष्ट है। कवि काव्य की भाषा की उपयोगिता तथा संवेदनशीलता से भलीभांति परिचित है। स्त्री-पुरूष के यांत्रिक समानता के स्थान पर यथोचित समता व व्यक्तिनिष्ठता को महत्त्व दे कर स्त्रीत्व को पढ़ा गया है। 'दुबली-पतली और उजली-सी लड़की' 'उसका मन'  'उसके संकल्पों का संगीत' 'तुम जो सुलझाती हो' यह निर्मला पुतुल के पठन के आग्रह को पूरा करने का प्रयास नज़र आता है कि (तन के भूगोल से परे, स्त्री के मन की गाँठे खोल कर, पढ़ा है कभी तुमने उसके भीतर का खौलता इतिहास..)।

युवाकवि मनीष की दोनों रचनाओं में स्त्री-पुरूष संबंधों की जटिलता तथा उसके उलझे सूत्रों को स्पर्श किया गया है। प्रेम और आकर्षण के कार्यव्यापार में उद्दीपन व प्रतिकर्षण के पहलू प्रकाशित होते हैं। 'तुम्हारे ही पास' 'तृषिता' 'कही अनकही' 'चाँदनी पीते हुए' 'गांठो की गठरी' 'बचाना चाहता हूँ' इत्यादि में प्रेम के प्रति जैविक व सामाजिक अंतर को उद्दात्ततापूर्वक परोसा गया है। संबंधो के प्रति 'दूरी की छटपटाहट' तथा 'निकटता के अनछुएपन' को आत्मीयतापूर्वक प्रस्तुत किया गया है। 'मैं नहीं चाहता था' में प्रेम के कलंकित विजय व गौरवपूर्ण पराजय को व्यंजित किया गया है। कई स्थानों पर प्रेम श्रद्धा के स्तर को छूता प्रतीत होता है। अस्तित्व की क्षणिकता व जीवन की नश्वरता में भावों व अनुभूति की शाश्वतता को कवि..'कि तुम जरूर रहना' में उकेरने का सार्थक प्रयास करता है। 'अनगिनत मेरी प्रार्थनाएं' 'चाय का कप' में कवि संबंधों की बुनियाद व उसके कोमलता व कांतता को प्रतिष्ठित करता है। 'कही-अनकही' में व्यक्तित्व की भिन्नता के बावजूद स्नेहशक्ति से दृढ़बंधित मनुष्य की विनम्र अपेक्षा झलकती है।

आधुनिक जीवन की जटिलताओं में प्रमुख है एक साथ कई भूमिकाओं को निभाना या उसमें अनुकूलतम उपलब्धि प्राप्त कर लेना, कवि मनीष में 'मौन प्रार्थना के साथ' निष्पक्षतापूर्वक इसे समेटने और पाठकों में सहृदयता भर देने की प्रखर क्षमता है। सामाजिक अलोचनापरकता तथा व्यक्ति का इसमें उलझाव चिन्तनीय है जो रचना संग्रह में कई बार उभर कर सामने आता है। आधुनिक जीवन का अजनबीपन, विसंगति बोध व रिक्त हृदय के त्रास में कवि ने 'रिक्त स्थानों की पूर्ति' जैसी रचनाएं भी हैं।

मनीष जी की कई रचनाओं में स्त्री सौंदर्यबोध व प्रेमदृष्टि छायावादी प्रतीत होती है विशेषकर पंत जी काव्य जैसी - (सरल भौहों में था आकाश, हास में शैशव का संसार..)। स्निग्ध कोमल गात वर्णन व भावप्रवणता का स्तर मात्रात्मक दृष्टि से निःसन्देह कम होते हुए भी समान है परंतु ध्यातव्य है कि 'जीवनराग' जैसी कुछेक कविताओं को छोड़ दे तो आभिजात्यता की जगह मानक भाषा ही मिलती है। यह श्रद्धामूलक झुकाव 'सवालों में बंधी' 'प्यार के किस्सों में' तथा 'जीवन यात्रा' में भावनात्मक पदचिह्न छोड़ता चला जाता है।

अच्छा बिस्तर नींद की गारंटी नहीं है न ही धन सुख का है। कवि कई दैनिक जीवन की वस्तुओं जैसे 'कैमरा' से याद 'पेन' द्वारा नवीनता तथा 'विजिटिंग कार्ड' द्वारा मतलबी संबंधों पर व्यंग्य करते हैं।

आधुनिक साहित्य पर्यावरण चिंताओं व सतर्कतावों से भरा चिंतन बन गया है परन्तु 'हे देवभूमि' व 'वह गीली चिड़िया' में पर्यावरण भावभूमि पर समांगीकरण का प्रयास करता है। 'अक्टूबर उस साल में' कई कविताएं जैसे 'मतवाला करुणामय पावस' 'बसंत का ख़ाब क़बीला' में प्रकृति वर्णन व आयामगत विविधता की दृष्टि से श्रेष्ठ है। 'भूली-भूली जनश्रुतियों ने' में भी प्रकृति के प्रतीक बंद प्रतीत नहीं होते हैं।

अधिकांश कवियों के आरंभिक संग्रहों में स्वच्छंद भाववमन अधिक प्रदर्शित होता है परन्तु मनीष जी के संग्रह इससे भिन्न हैं जहाँ सहज भावनाओं का उच्छलन है। बावजूद इसके इसमें भाषाई साफगोई, तार्किकता व अनुभूति की विशिष्टता साहित्यिक संस्कारों से युक्त बना देती है जैसे 'जब कोई किसी को याद करता है' 'जीवन के तीस बसंत', 'तुम मिलती तो बताता', 'यह पीला स्वेटर', 'कच्चे से इश्क' आदि। प्रेम में अस्तित्व की अंतर्निर्भरता जो विलय तक पहुंचती है कहीं-कहीं अचानक प्रखर हो उठती है जैसे 'हे मेरी तुम' रचना में हुई है।

इन काव्य संग्रहों में अन्तर्जगत की सिक्तता, मरुता और ग्रंथियाँ लंबे प्रवास पर निकल चुकी प्रतीत होती है। 'आज मेरे अंदर की रुकी हुई नदी' 'विकलता के स्वप्न' 'कृतघ्न यातना' में कवि के उद्वेलन व संघर्ष के ताने-बाने बनते बिगड़ते गतिमान है।

मानवीय संबंधों की अनुभूत चेतना कई कविताओं में सहजता पूर्वक प्रवाहित होती गई है जो पाठकों के लिए कथ्य व कथन के अंतराल की नगण्यता के कारण अतिग्राह्य है, 'मुझे आदत थी' व 'उस साल अक्टूबर' जैसी कविताएं इस दिशा में आगे ले जाती है।

कवि कलाकार होता है यह रंगरेज़ पाठकों के हृदय पृष्ठ पर शब्द तूलिका से मर्मस्पर्शी चित्र बनाता है। मनीष जी जैसा कवि हो और विषय बनारस जैसा शहर हो तो बस कहना ही क्या ?  लगता है जैसे 'इस बार तेरे शहर में' 'बनारस के घाट' देख ही आएं क्या' ? 'लंकेटिंग' फीलिंग भला कविताओं में कहाँ तक समाए ? बहरहाल 'अयोध्या' और 'मणिकर्णिका' जैसी कविताएं पाठकों में जीवनमूल्यों के प्रति यह गहरी समझ विकसित करती है की जीवन नश्वर है और परंपरा का प्रवाह शाश्वत है।

हिन्दी प्रदेश में भाषाई क्षेत्रवाद की स्थिति विचित्र है यह एक साथ जोड़ती व बाँटती है। 'मैंने कुछ गालियाँ सीखी है' में रचनाकार ने पाठकों को इस स्थिति में डाल दिया है जहाँ वह यथेष्ट की तलाश में बेचैन हो उठता है। भाषाई गालियाँ तेजी से प्रतिनिधि वाक्य बनती जा रही हैं तथा भाषाई तमीज़ हाशिए पर लटक रही है।

वर्तमान काव्य प्रवृत्तियों में प्रमुख है उत्तर छायावाद जहाँ मानव जीवन में असंगति बढ़ी है तथा गुंथे हुए यथार्थ को पकड़ने की सतर्कता काव्य में भी विद्यमान है। 'आत्मीयता' में स्थिर मान्यताओं से जुड़ा धोखा उद्घाटित होता है। कवि मनीष ने स्थितप्रज्ञ हो इस चुनौती को स्वीकार किया है। भावना व संवेदना भी बाज़ारवाद से बच नहीं सकी है तथा यह भी समय व वज़न के घेरे में आ गया है- 'स्थगित संवेदनाएं' में कवि ने त्रासद मानवीय स्थिति को व्यंजित किया है। कवि हृदय की आत्मीयता व प्रेम रिश्तों की गरमाहट 'वो संतरा' जैसी कविताओं में दिखाई देती हैं जहाँ आत्मपरकता तथा अभिव्यंजनात्मकता दोनों ही प्रखर हैं।

वाह्य व आंतरिक स्थिति लगातर सुसंगत होने तथा एकात्मकता का आनंद उठाने के बारे में कविताओं विशेषकर 'अक्टूबर उस साल' संग्रह तथा कविता 'वह साल वह अक्टूबर' में उत्कृष्ट स्तर को प्राप्त करती है। जो शब्द चयन में सटीकता, संगीतात्मकता तथा वातावरण की गतिशीलता पाठकों को आकर्षित करती है। ऋतु सौंदर्य व मौसमी बहार साहित्य के लिए लम्बे समय से कच्चा माल रहा है परन्तु यहां यह भावों के साथ आंदोलित होता है।

स्त्री-पुरुष प्रेम व्यापार इन रचना संग्रहों में पाठकों को अधिक संस्कारित करता है तथा प्रतिशोध आधारित त्रुटि की संभावना को कम करता है। 'बहुत कठिन होता है' में कवि प्रेम के यथार्थ बिम्ब को प्रस्तुत करता है जहाँ एकान्तिक ठहराव मिलता है।

परिवर्तन ही शाश्वत है, हर पीढ़ी अपने संक्रमण तथा उसकी पीड़ा को लेकर सजग, उत्सुक पर शिकायती रही है। 'कुछ उदास परम्पराएं' में परम्पराओं से विचलन तथा नई व्यवस्था के साथ सामंजस्य की कमी दिखाई पड़ती है।

भाषा अभिव्यक्ति का सर्वाधिक मान्य माध्यम है लेकिन इसमें भाषाई आवरण में अपने मंतव्य छिपा लेना तथा कलात्मकता का दुरूपयोग भी नया नहीं है,। भाषा कई बार विनम्रतापूर्वक अन्याय को पोषित करती है तथा उस पर प्रश्न नहीं खड़ा करती परंतु कवि भाषा के लिबास में अभिव्यक्ति की सुगमता तथा खतरे से भिज्ञ है जैसे (दरख्तों को, कुल्हाड़ी के नाखूनों पर भरोसा है)।

सभ्यता के इतिहास में अन्याय आधारित प्रथाओं को उद्दात प्रभाव प्रदान किया गया है, इसके परतों को उधेड़ना साहित्य का कर्तव्य है। कवि मनीष कई कविताओं में इस दिशा में प्रगतिशील प्रतीत होते हैं। वर्जनाओं व सीमाओं की लकीर पर गुणा-गणित करने के बजाए इसके औचित्य पर तार्किक विचार करते हैं। साहित्य में सत्य की पड़ताल की दीर्घ परंपरा रही है, कवि मनीष ने दर्शन के वैचारिक वाद -विवाद की जगह अनुभूतिजन्य सत्य को अधिक समीचीन माना है। 'इतिहास मेरे साथ' कविता में सत्य के प्रति समझौता हो जाने की संभावना को उदघाटित किया गया है। 'गंभीर चिंताओं की परिधि में' कवि ने वैयक्तिक चेतना को साध्य माना है। वे मनुष्य और समाज को प्रयोग शाला बना देने के पक्षधर नही हैं। 

‌'अक्टूबर उस साल' की कुछ रचनाएं भविष्य में नारा बन जाने की संभावनाओं से युक्त हैं। समाज की लंबी कुलबुलाहट के बाद दबी चेतना को जैसे ही अभिव्यक्ति मिलती है वह समाज द्वारा हाथों-हाथ ली जाती है। ऐसा दुष्यंत कुमार की रचनाओं में सिद्ध भी हो चुका है। कवि मनीष जी की रचनाओं में 'यूं तो संकीर्णताओं को'(वहन कर रहा हूं), 'दौर-ए-निजाम' जैसी कविताएंं वर्तमान विडम्बनापूर्ण सामाजिक  स्थिति पर सटीकता से जनता का पक्ष रखती हैं तथा बाजार व सत्ता के कुचक्र में निस्सहाय व्यक्ति के सामग्री या दर्शक बन जाने की अभिशप्तता को उचित रूप में रखती हैं।

सिद्ध बहुरूपिये भूमण्डलीय बाज़ार ने व्यक्ति की इच्छाओं,वासनाओं व सुगमताओं को अधिक कठोरतापूर्वक परिभाषित कर लिया है, तंत्र द्वारा अव्यवस्था के प्रति व्यक्ति की सहनशीलता की सीमा को बढ़ा दिया गया है। तंत्र की जटिलता व अन्यायपरकता को समझते हुए भी व्यक्ति अभिशप्त है। इन संग्रहों में न्यूनतम शब्दों में अनुभव व चिंतन सहजतापूर्वक व्यक्त हुआ है। उर्दू,फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग लोक प्रचलन के अनुपात में ही प्रयोग किया गया है। अर्थों के स्तर पर पर लय व तुकों का सृजनात्मक रूप उभर कर सामने आया है। बहुअर्थी प्रतीक और उपमानों की ताज़गी रचना संग्रह की आकर्षक विशेषता है। अलक्षित, संश्लिष्ट व गतिशील बिम्बों का प्रयोग हुआ है जो सामग्री की ताज़गी बरकरार रखती है।

राजीव कुमार पाण्डेय

Popular and Aristocratic Culture in India

Introduction The cultural history of the Indian subcontinent reveals complex layers of social life, consumption, aesthetics, and power. In ...