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शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

सल्तनत कालीन इतिहास-लेखन की मुख्य विशेषताएं


सल्तनत कालीन भारतीय इतिहास का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विभिन्न स्रोत हैं। इनमें प्रथम स्थान ऐतिहासिक रचनाओं का है जिनमें से अधिकांश फारसी भाषा में लिखे गए हैं। इस काल में विभिन्न कारणों से बड़े पैमाने पर इतिहास लेखन का कार्य हुआ जिसकी प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं।

1.   इतिहास लेखन का उपदेशात्मक होना

उपदेशात्मक इतिहास, वह इतिहास है जो नैतिक शिक्षा देता है। भारत में मुसलमान इतिहासकारों का उद्देश्य सामान्यतः उपदेशात्मक था जिसके अंतर्गत अल्लाह के तरीकों को इंसान के सामने प्रकट किया जाता है। शासक या सुल्तान दैवी प्रयोजन को पूरा करने का माध्यम भर था। शासकों के अच्छे - बुरे कामों को लिपिबद्ध करने का उद्देश्य पूरे मुस्लिम समुदाय को प्रोत्साहित करना, उन्हें परामर्श देना तथा चेतावनी देना था मिन्हाज,अमीर खुसरो, बरनी इन सबने उपदेशात्मक इतिहास पर बल दिया जिसे आचारशास्त्र की एक शाखा और नैतिक उपदेशों का भंडार माना गया।

2.  शोध की कमी और स्रोत केंद्रित आलोचना की कमी

सल्तनत कालीन मुस्लिम इतिहास लेखन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रकृति का विद्वता रहित, प्रभाववादी होना था जिसके फलस्वरूप अतीत का एक यथार्थपरक चित्रण हआ। आरंभिक इंडो - मुस्लिम इतिहासकारों के लिए इतिहास वही था जो विश्वस्त प्रतिवेदकों ने कहा था और अधिक पुरानी किताबों में संग्रहित - समाहित था । यह 'अधिकार' से लिखा गया इतिहास था न कि अतीत के खोज किए ज्ञान का ब्यौरा या लेखा - जोखा किसी भी तरह के शोध या अनुसंधान का इसमें अभाव था। मध्यकालीन इंडो - मुस्लिम इतिहासकार के बारे में हार्डी लिखते हैं : इतिहासकार एक शोधकर्ता की बजाय एक लिपिक है और उसकी कृति सृजन नहीं बल्कि संचार या संप्रेषण है। वह अपनी सामग्री को सजा-संवार सकता है और काट-छांट भी सकता है, पर वह इसे अपने मस्तिष्क में रूपांतरित नहीं करता या इस पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता।

3.  एक विषय के तौर पर इतिहास की गौण भूमिका

पीटर हार्डी हमें सतर्क करते हैं कि भारत पर इस्लामी प्रभुत्व के आरंभिक चरण में तुलनात्मक रूप से ऐतिहासिक लेखन की बहुलता को देखकर हमें यह नहीं मानना चाहिए कि इतिहास को उस काल में एक स्वतंत्र बौद्धिक विषय माना जाता था। मुस्लिम बौद्धिक जीवन में इसकी भूमिका गौण थी। बरनी ने इतिहास को धार्मिक विज्ञानों के बाद रखा और उसे उनका अनुचर माना। यह राजकुमारों के लिए ललित शिक्षा का विषय था। किंतु मदरसों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में इसे कोई स्थान नहीं दिया गया था।

4.  अतीत को एक प्रक्रिया के रूप में नहीं देखना

हार्डी यह भी कहते हैं कि एक प्रक्रिया के रूप में इतिहास की अवधारणा संभव नहीं हो पाई थी क्योंकि इसके ठोस रूप ग्रहण करने में अभी बहुत देर थी। भारत के मध्य कालीन मुसलमान इतिहासकारों की दृष्टि में इतिहास परस्पर स्वतंत्र घटनाओं की एक श्रृंखला थी जिसे ईश्वर द्वारा अर्थ प्रदान किया गया। उन्होंने अतीत को व्यक्तिगत संदर्भ में और जीवनियों के रूप में देखा। मुसलमान समुदाय को भी ऐतिहासिक अध्ययन के एक एकीकृत अवयव के रूप में नहीं देखा गया न ही उनकी अंतःक्रिया पर गौर किया गया। न सिर्फ ईश्वर को इतिहास की सभी घटनाओं के लिए उत्तरदायी माना गया बल्कि यह भी कहा गया कि यह सामाजिक शक्तियों या युग चेतना के माध्यम से नहीं बल्कि व्यक्तियों के माध्यम से कार्य करता है।

5.  धार्मिक इतिहास लेखन

हार्डी ध्यान दिलाते हैं कि मुस्लिम इतिहासकारों ने जिनमें बरनी एक अपवाद है, अतीत को इस प्रकार नहीं देखा कि यह परिवर्तन की प्रक्रिया हो या कुछ नया होने या बनने की एक कहानी हो। वर्तमान अतीत का अनुगमन करता है, अतीत की परिणति नहीं है उनमें से अधिकांश की दृष्टि में इतिहास दैवी विधान का भव्य प्रदर्शन है जिसमें मनुष्य  अभिव्यक्ति का केवल माध्यम था। इतिहास मानव क्रिया की नहीं बल्कि दैवी क्रिया की कथा थी। इतिहास का इस्तेमाल इस्लाम को गरिमा मंडित करने के लिए किया गया।

6.  विषय क्षेत्र की संकीर्णता

अंततः यह तथ्य भी ध्यातव्य है कि सल्तनत काल का इतिहास - लेख विषय क्षेत्र की दृष्टि से अत्यधिक संकीर्ण था। आरंभिक इंडो - मुस्लिम इतिहासकारों ने इतिहास के केंद्र में महान धार्मिक व्यक्तियों और शासकों जैसे पैगंबरों, सुल्तानों, कुलीनों और संतों आदि को रखा। गरीब, निम्न जाति या कुल के दीन-हीन आम लोगों के जीवन तथा स्थितियों पर इतिहास द्वारा कभी प्रकाश नहीं डाला गया। आबादी का विशाल बहुसंख्यक भाग अर्थात् हिंदू समुदाय इस तरह की कृतियों में हाशिये पर रहा और उनका उल्लेख 'काफिर' के रूप में किया गया। इसमें सामाजिक ढांचे के खिलाफ किसी चुनौती का भी अभाव दिखता है।

निष्कर्ष

इस प्रकार मध्यकालीन इतिहास के एक विद्यार्थी के लिये यह आवश्यक है कि वह इस काल के इतिहास लेखन का अध्ययन बेहद सावधानी के साथ तथा आलोचनात्मक दृष्टि से करे। तब उसे मूल्यवान तथा प्रचुर अध्ययन सामग्री प्राप्त होगी।

 

सल्तनत कालीन इतिहास-लेखन में वृद्धि का कारण


1.    मंगोलियन अस्थिरता के कारण मध्य एशिया से विद्वानों का पलायन

2.   भारत में अनेक कालेजों की स्थापना

3.   साम्राज्य की स्थिरता

4.   इतिहासलेखन की इस्लामी परंपरा

5.   कागज़ का प्रयोग

6.   शासकों की व्यक्तिगत रुचि

7.   फारसी का सरकारी भाषा होना

8.   संतों की जीवनियों तथा वार्तालाप का लेखन

गुरुवार, 29 सितंबर 2022

अबुल फ़ज़ल की अकबरनामा तथा इसके गुण- दोष


अबुल फज़ल के पुरखे नागौर में आकर बसे थे बाद में उलेमाओं के उत्पीड़न से तंग आकर अहमदाबाद चले गए। अबुल फजल के पिता शेख मुबारक का जन्म 1506 में हुआ था। अबुल फ़जल अपने पिता की आठ संतानों में से दुसरे नंबर का था। इसका जन्म 14 जनवरी 1551 में आगरा में हुआ था। इसने अपनी शिक्षा 15 साल में पूरी कर ली तथा 20 साल में स्वयं शिक्षक बन गया। अकबर से इसकी मुलाकात 1574 में हुई। अकबर के दरबार में इसने अपनी शुरुआत बीसी मनसबदार से की। सलीम के सह पर वीर सिंह बुंदेला ने इसकी हत्या कर दी। 1589-90 ईसवी में इसे अकबर नामा लिखने का आदेश प्राप्त हुआ। जिसे इसने सात सालों की मेहनत के बाद 1597-98 में तैयार करके अकबर को सौंप दिया।

                          अकबर नामा

पहला भाग – अकबर के पिता हुमायूँ समेत उसके सभी पूर्वजों का वर्णन

दूसरा भाग – अकबर के शासन के 46 वें वर्ष तक का कालक्रमानुसार वर्णन

तीसरा भाग – आईन ए अकबरी 

                        आईन ए अकबरी 

पहला भाग – 10 आईन – माता पिता, तत्कालीन राज्य व्यवस्था, अकबर का जन्म

दूसरा भाग – 30 आईन – राज्य के कर्मचारी, सैनिक तथा असैनिक अधिकारी तथा दरबारियों का वर्णन

तीसरा भाग – 16 आईन – न्याय विभाग तथा राजस्व

चौथा भाग – हिन्दू साहित्य, ज्योतिष, दर्शन, संतों की जीवनियाँ

पांचवां भाग – सम्राट के नैतिक नियम, आचार संहिता, प्रशासनिक आदर्श, कहावतें तथा अबुल फज़ल की आत्मकथा

           

           अबुल फ़ज़ल की अकबरनामा के गुण


इतिहास दर्शन : भारतीय इतिहास के प्रति नवीन दृष्टिकोण : सकारात्मक बौद्धिक प्रचारतंत्र की आवश्यकता

1.    बुद्धिवादी-उदारपंथी दृष्टिकोण वाला राष्ट्रवादी इतिहासकार : अबुल फजल भारतीय इतिहास के एक अभिनव तथा अधिक व्यापक विचार को अपनाने के लिए प्रवृत्त हुए जो उनके बुद्धिवादी-उदारपंथी दृष्टिकोण से उतना ही अधिक प्रेरित था जितना मुगल साम्राज्य के बारे में उनके संरक्षक बादशाह के नए दृष्टिकोण से। अकबर भरपूर प्रयत्न करते हुए जिस साम्राज्य का निर्माण कर रहा था वह सल्तनत से भिन्न प्रकृति का था, इसकी रूपरेखा एक सच्चे भारतीय साम्राज्य, एक समग्र राष्ट्रीय सत्ता और हिंदुओं के साथ मैत्री पर आधारित साम्राज्य के रूप में निश्चित की गई जो अब लाखों स्थानीय जन समुदायों पर एक विदेशी प्रजातीय और आध्यात्मिक समूह द्वारा थोपी गई शासन व्यवस्था का पर्याय नहीं रह गया था जैसा कि सल्तनत काल में देखा गया था।

2.   धार्मिक समाज में सुलह ए कुल का सिद्धांतकार : उलेमा के घोर कट्टरपंथ के विरुद्ध बुद्धि विवेक और धार्मिक सहिष्णुता की धारा का प्रतिनिधित्व करने वाले अबुल फजल ने बादशाह की अपारंपरिक नीतियों के लिए नैतिक एवं बौद्धिक आधार प्रदान किया। उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों के इस दृष्टिकोण को मानने से इनकार कर दिया कि भारतीय इतिहास का सारतत्त्व इस्लाम और हिंदुत्व की ताकतों के बीच संघर्षो का लेखा - जोखा है। धर्म एवं राजनीति के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण वाले अबुल फजल से अधिक अच्छी तरह यह काम और कोई नहीं कर सकता था

3.   संघर्ष के वास्तविक क्षेत्र की पहचान : अबुल फजल की दृष्टि में संघर्ष मुगल साम्राज्य और भारतीय राजाओं, जिनमें हिंदू और मुसलमान दोनों थे, के बीच था। मूल रूप से यह सांसारिक तथा आध्यात्मिक दोनों परिप्रेक्ष्यों में जनसाधारण का नेतृत्व करने में समर्थ एक आदर्श सम्राट के अधीन स्थिरता, मजबूती और सुशासन की शक्तियों तथा जमींदारों के नेतृत्व में विखंडन एवं कुशासन की शक्तियों के मध्य संघर्ष था। इसने बादशाह के पक्ष में लड़ने  वालों को मुजाहिदाने इस्लाम या गाज़ियाने इस्लाम की बजाय मुजाहिदाने इकबाल तथा गाज़ियाने दौलत कहा है 

 इतिहास शिल्प : साधन, विषयवस्तु  और शैली 

1. साधन : अबुल फजल लिखता है कि मैंने काफी खोजबीन व मेहनत से महामहिम अकबर की गतिविधियों के सबूत व दस्तावेज़ इकट्ठे किये और बहुत समय तक राज्य के मुलाज़िमों व शाही परिवार के सदस्यों में संवाद किया, मैंने सच बोलने वाले समझदार बुजुर्गों व फुर्तीले दिमाग वाले, सत्य कर्मी जवान, दोनों की बातों को परखा तथा उनके बयानों को लिखित रूप दिया...आदेशों की मूल प्रतियों तथा प्रान्तों से आई सूचनाओं को शामिल किया गया

2. विषयवस्तु : अकबरनामा में अनेकानेक विषयों की वृहद् जानकारी मिलती है। मोटे रूप से युद्धों से सम्बंधित जानकारी की बहुलता है। इसके अतिरिक्त दुसरे देशों तथा प्रदेशों के बारे में भी जानकारी है। इसके अतिरिक्त स्थान वर्णन, फलित ज्योतिष, जानवरों तथा आर्थिक आकड़ों की भी जानकारी मिलती है

3. शैली : अबुल फज़ल की यह मान्यता रही है कि उसने इतिहासलेखन के क्षेत्र  में पुरानी श्रृंगारिक शैली व शब्द जाल की शैली को समाप्त कर एक नई शैली की आधार शिला रखी। परन्तु अकबर नामा को सरसरी तौर पर देखने पर यह मालूम पड़ता है कि उसकी मान्यता ठीक नहीं है। अकबरनामा में शब्दाडम्बरों की भरमार है। जो काई जगह इसे नीरस तथा अनाकर्षक बनाते हैं

            अबुल फ़ज़ल की अकबरनामा के दोष


1.    दोषपूर्ण ऐतिहासिक कारणात्मकता :  इतिहास में कारणात्मकता की संकल्पना के संदर्भ में अबुल फजल का मानना है  कि मुनष्यों का व्यवहार उनकी प्रकृति से उपजता है और यही व्यवहार अलग - अलग घटनाओं का कारण होता है। अकबर इस नियम का अपवाद है क्योंकि वह एक अर्ध - दैवी व्यक्ति है जिसके कार्य कारण के दायरे से बाहर है। चूंकि अबुल फजल ने भी इतिहास को व्यक्तियों या संस्थाओं से संबद्ध अलग - अलग घटनाओं या मामलों की एक समष्टि के रूप में देखा, व्याख्या और सामान्यीकरण की यहां बहुत कम गुंजाइश थी।

2.   घोर व्यक्ति पूजक : एक इतिहासकार के रूप में अबुल फजल की सबसे गंभीर त्रुटि उनकी व्यक्तिपरकता थी जो उतनी ही तीव्र थी जितनी बरनी या बदायूंनी की व्यक्तिपरकता। यह अपने संरक्षक के प्रति उनके निकृष्ट पूर्वाग्रह के रूप में व्यक्त हुई। अकबर, जो उनकी दृष्टि में हमेशा सही था क्योंकि वह कभी गलती नहीं कर सकता था, के हर कदम को उचित ठहराने और उसकी प्रशंसा करने में उन्होंने अपनी समस्त बुद्धि, विवेक, शालीनता तथा आत्मनियंत्रण खो दिया। शत्रु चाहे कोई राजपूत शासक हो या मुसलमान शासक, उसके विरुद्ध अकबर के सैन्य अभियानों के उद्देश्यों को हमेशा उचित तथा प्रशंसनीय माना गया लेखक के अटूट विश्वास ने अकबरनामा को एक प्रशस्ति का रूप दे दिया।

3.   ऐतिहासिक वस्तुपरकता का लोप : अपनी व्याख्याओं को सही ठहराने की उसकी प्रक्रिया हमेशा ऐतिहासिक वस्तुपरकता की शर्तों को पूरा नहीं करती हैं। वह शेरशाह के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण और यहाँ तक कि शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण का भी परिचय देता है क्योंकि वह इस महान अफगान को अकबर के पिता का दुश्मन मानता था। अंध आस्था और चापलूसी चापलूसी को अकबरनामा का सबसे बड़ा दोष माना जाना चाहिए।

4.   उलेमा के प्रति आक्रोश :  यह मनोमालिन्य तथा व्यक्तिगत आक्षेप से पूरी तरह मुक्त नहीं है, चूँकि उलेमाओं ने एक समय इसके परिवार को परेशान किया था अतः उलेमा के विरुद्ध इसका पुराना आक्रोश इसकी शक्तिशाली कलम के माध्यम से प्रतिशोध के रूप में फूट पड़ा। उलेमा के प्रति अकबर की घृणा और उनसे उसके अलगाव का जो वर्णन अबुल फजल ने किया है उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता है।

5.   तथ्यों को छुपाना : अकबरनामा के लेखक के विरुद्ध एक और गंभीर आरोप यह है कि इसने कई तथ्यों को छुपाया और इस क्रम में उन घटनाओं एव तथ्यों की अनदेखी कर दी जो अकबर की योग्यता तथा बुद्धिमता से संबंधित लोकप्रचलित दंतकथात्मक धारणा के प्रतिकूल थे। अतः भू - राजस्व बंदोबस्त की करोड़ी प्रणाली के कारण विशाल परिमाण में कृषि योग्य भूमि की जो बर्बादी हुई और रैयतों को जिन भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ा उन पर अबुल फजल पूरी तरह चुप हैं। इन मुद्दों की चर्चा बदायूंनी ने की है और निजामुद्दीन अहमद ने उनकी पुष्टि की है।

6.   साहित्यिक चोरी : अबुल फजल पर यह आरोप लगाया जाता है कि इसने साहित्यिक चोरी की तथा उन स्रोतों से जानकारियां हासिल कीं जिन्हें निश्चितता के साथ स्वीकार नहीं किया गया है। कई बार होता है कि वे अन्य लेखकों की रचनाओं से शब्दशः कई अनुच्छेद ले लेते हैं। ऐसा करते हुए उन्हें किसी तरह का भय नहीं होता और साहित्यिक सामग्रियों की चोरी के आरोप से भी अनभिज्ञ रहते हैं। आइन में हिंदुओं से संबंधित विवरण जो बहुत हद तक अलबरूनी से लिए गए हैं, के मूल स्रोत से संबंधित कोई स्वीकारोक्ति नहीं है।


निष्कर्ष

इन सब दोषों के बाद भी हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि अकबर नामा को लिखने में उसने जो परिश्रम किया तथा थका देने वाली शोध - पद्धति को अपनाया वह निश्चित ही प्रमाणिक इतिहास लिखने का एक विकसित प्रयास था। यद्यपि उसकी धारणायें सहज लगती हों अथवा उसका पूर्वानुमान अमान्य हो परन्तु इसके बाद आज भी उसकी रचनायें मध्यकालीन इतिहास लेखन में एक ऐतिहासिक अथवा युगान्तरकारी घटना है।

गुलबदन बेगम की हुमायूँ नामा, गुण-दोष


बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम का जन्म 1523 ई. में हुआ था। इसकी माता दिलदार बेगम थी।
हिन्दाल, गुलबदन का सगा भाई था। इनका विवाह ख़िज़ ख़्वाजा ख़ाँ मुग़ल से हुआ था। अकबरनामा के लिये सामग्री एकत्र करने के उद्देश्य से, बहुत से लोगों को अकबर ने आदेश दिया कि बाबर तथा हुमायूँ के सम्बन्ध में जो जानकारी रखते हों, उसे लिपिबद्ध करें। गुलबदन बेगम द्वारा रचित हुमायूँ नामा भी इसी आदेश का परिणाम है। उसने अपनी रचना को दो भागों में बांटा है- एक में बाबर सम्बन्धी घटनायें तथा दूसरे में हुमायूँ का इतिहास। यद्यपि हुमायूँ नामा मूलरूप से फ़ारसी भाषा में लिखा गया है मगर इसमें तुर्की तथा फ़ारसी शब्दों का मिश्रण है। इससे ऐसा अनुभव होता है कि रचियता न केवल विदूषी थी अपितु पढ़ने लिखने की शोकीन भी थी। श्रीमती बेवरिज ने गुलबदन के मूल ग्रंथ का संस्करण सम्पादित किया है तथा टिप्पणियों के साथ उसका अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित किया है। यह ग्रंथ एशियाटिक सोसायटी द्वारा प्रकाशित हुआ है।

                   हुमायूँ नामा के गुण

स्त्री जीवन के बारे में जानकारी

स्त्री होने के कारण अन्य लेखकों से इसका दृष्टिकोण भिन्न है तथा इसने मुग़ल स्त्रियों के विषय में महत्वपूर्ण बातों का वर्णन किया है। मुग़ल काल की बेगमों की दशा की जानकारी के लिए यह ग्रंथ महत्त्वपूर्ण है।

1.    युद्ध और प्रेम में स्त्री का वर्णन :  प्रो. रिज़वी अनुसार, "इसके इतिहास की विशेषता स्त्रियों के जीवन के सजीव चित्र एवं उनके चरित्र का रोचक विवरण है। सुलेमान मिर्जा मीरान शाही की पत्नी हरम बेगम द्वारा सेना के नेतृत्व का उल्लेख बेगम ने बड़े स्पष्ट रूप से किया है। मिर्ज़ा कामरान की मूर्खता एवं हरम बेगम से ईश्क की घोषणा के दुष्परिणाम की गुलबदन बेगम ने सविस्तार चर्चा की है।"

2.   पारिवारिक बिखराव के शोक और संताप का वर्णन  : इसके अतिरिक्त प्रो. रिजवी के अनुसार, "बेगम ने मिर्जा हुमायूँ के शोक एवं बेगेमों के विलाप तथा उसकी लाश के दफ़न का उल्लेख किया है। मिर्जा कामरान के बन्दी बना लिये जाने पर हुमायूँ ने जिस प्रकार उसकी हत्या के विरुद्ध आपत्ति प्रकट की उसका गुलबदन बेगम ने बड़े मार्मिक शब्दों में उल्लेख किया है।"

3.   पुत्र की आकांक्षा का सनातन स्त्री भाव का वर्णन  : उसने लिखा है कि माहम बेगम को हुमायू के पुत्र न होने की कितनी चिन्ता थी और उसने किस प्रकार प्रयत्न करके मेवा जान से उसका विवाह कराया। मेवा जान द्वारा पुत्र जन्म पर माहम बेगम ने उत्सव के लिये जिस प्रकार की तैयारियां कराई उनका विवरण गुलबदन बेगम ने खुलकर किया है।

4.   विवाह के चयन पर स्त्री अधिकार का वर्णन :  गुलबदन ने हुमायूँ की सिन्ध यात्रा तथा हमीदा बेगम से उसके विवाह को विस्तार से लिखा है  गुलबदन के अनुसार लगभग 40 दिन तक हमीदा बानो से विवाह का आग्रह चलता रहा हमीदा का कहना था कि वह उस व्यक्ति से विवाह करना पसंद करेगी जिसके गिरेबान तक उसका हाथ पहुँच सके। अन्त में हमीदा बानो की माता दिलदार वेगम के कहने पर वह राजी हुई।

मुग़ल परिवार के बारे में जानकारी

गुलबदन के इस विवरण से हमें यह पता चलता है कि उस समय मुग़ल परिवार में क्या चल रहा था, अमीरों व मिर्जाओं का सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन कैसा था और किस प्रकार मिर्ज़ा लोग एक दूसरे के विरुद्ध कार्य कर रहे थे।

1.    विजय उत्सव का वर्णन  : पानीपत में इब्राहीम लोदी की पराजय के बाद बाबर ने जिस प्रकार दिल खोलकर दान दिया था, गुलबदन ने उसका बड़ा ही रोचक वर्णन किया है। उसके अनुसार न केवल उसने अपने सम्बन्धियों को उपहार भेजे अपितु अनेक फकीरों और सन्तों को भी भेंट भेजीं। 

2.   बाबर का अपने सम्बन्धियों से स्नेह का वर्णन :  गुलबदन के बाबर सम्बन्धी विवरण से यह भी जानकारी मिलती है कि वह अपने सम्बन्धियों से किस प्रकार स्नेह करता था। अपने सम्बन्धियों से निश्चित दिन मिलने में किसी भी प्रकार का प्राकृतिक प्रकोप उसके आड़े नहीं आ सकता था। गुलबदन ने काबुल से आगरा की यात्रा की कई रोचक घटनाओं का वर्णन किया है जिससे मालुम पड़ता है कि बाबर कितनी उत्सुकता से उनकी प्रतिक्षा कर रहा था। हुमायूँ के प्रति बाबर का स्नेह भी गुलबदन ने बड़े ही रोमांचित ढंग से लिखा है। मिर्जा हिन्दाल के प्रति बाबर के स्नेह की जानकारी भी उसी की रचना से मिलती है।

3.   परिवार में एकता के लिए प्रयास का वर्णन  : कन्नौज के युद्ध में पराजित होने पर जब हुमायूँ आगरे पहुँचा तो गुलबदन बेगम ने भाइयों का पुनः संगठित करने के जो प्रयास किये उनका उसने रोचक वर्णन किया है और जब कुछ समय के लिये सब भाई संगठित हो गये तब हुमायूँ ने जिस प्रकार से इस अवसर पर उत्सव मनाया उसका गुलबदन ने विस्तार से वर्णन किया है। गुलबदन की रचना से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि हुमायूँ को अपनी माता, बहनों व वेगमों से कितना अधिक स्नेह था और वह उनके लिये कितना चिंतित रहता था।

4.   विवाह तथा उत्सवों का वर्णन : इत्यादि उसने हिन्दाल मिर्ज़ा के विवाह का वर्णन और भी अधिक विस्तार से किया है और विभिन्न सम्बन्धियों के न केवल बैठने के स्थान को बताया है अपितु विवाह के लिये बनाये गये घर का बहुत ही बारीकी से विवरण दिया है। उसने दावत में दिये गये अनेक खाद्यानों का वर्णन किया है और इनाम- इकराम का बड़ी ही सजगता से रोचक वर्णन छोड़ा है। इस प्रकार गुलबदन बेगम उत्सवों आदि के विवरण में सिद्धहस्त मालुम पड़ती है। वह उस समय के रीति-रिवाजों का वर्णन करने में भी अनूठी है। राजनीतिक घटनाओं के अतिरिक्त इसमें समकालीन रीति-रिवाज़, सामाजिक मान्यताओं इत्यादि का भी वर्णन है।                           

            हुमायूँ नामा के दोष

1.    संक्षिप्त राजनीतिक विवरण तथा दोषपूर्ण तिथिक्रम : गुलबदन बेगम ने लिखा है कि, "जिस समय बाबर की मृत्यु हुई उस समय वह मात्र 8 वर्ष की बालिका थी और इसलिये उसे जो कुछ भी याद रहा उसे उसने दूसरों द्वारा दी गई जानकारी मिलाकर लिखा। इसीलिये बाबर सम्बन्धी उसका विवरण बहुत ही संक्षिप्त है।" गुलबदन बेगम का तिथिक्रम कहीं-कहीं दोषपूर्ण है और उस द्वारा दिया गया सूक्ष्म राजनैतिक वर्णन बड़ा ही अखरता है।

2.   युद्ध और हिंसा में कम रूचि का स्त्री स्वभाव  : गुलबदन एक स्त्री थी और स्वाभाविक रूप से उसमें युद्धों और युद्ध रचनाओं के प्रति कम रूचि थी। इसीलिये उसने साधारणतया युद्धों का बड़ा ही कम वर्णन किया है। हुमायूँ के गौंड़ पर अधिकार का विवरण केवल कुछ पंक्तियों में है। चौसा के युद्ध के सम्बन्ध में भी वह बहुत ही कम जानकारी देती है। उसने लिखा है कि, "मुगल सैनिक असावधान थे कि शेर खाँ ने पहुँच कर आक्रमण कर दिया। सेना पराजित हुई और अधिकांश लोग एवं परिवार वाले बन्दी बना लिये गये’’। उसकी रचना में कामरान को अन्धा करने की घटना नहीं मिल पाती है। सम्भवतः इसका कारण था कि वह इस हृदय विदारक घटना को लिखना नहीं चाहती थी।

निष्कर्ष

गुलबदन बेगम इतिहासकार नहीं थी। हुमायूँनामा उसका संस्मरण है। वह इसमें वर्णित घटनाओं से संबंधित थी। इससे कहीं - कहीं वह भावनाओं से प्रभावित हो जाती है तथा निष्पक्ष नहीं रह जाती। उदाहरणतया, अपने सगे भाई हिन्दाल के प्रति वह कहीं-कहीं पक्षपात करती है, उसकी मृत्यु की घटनाएँ तो अत्यन्त ही मार्मिक शब्दों में वर्णित हैं। माहम बेगम द्वारा जश्नों का आयोजन, तिलिस्म का जश्न, हिन्दाल मिर्ज़ा के विवाह का जश्न, माहम की हुमायूँ के पुत्र-जन्म की आकांक्षा तथा सुंदर लड़कियों से हुमायूँ के विवाह के लिए उनका प्रयत्न, मुग़ल स्त्रियों की पारस्परिक स्पर्द्धा तथा ऐसी अनेक घटनाएँ गुलबदन के वर्णन के बिना अप्राप्य रहतीं। गुलबदन बेगम का तिथिक्रम कहीं-कहीं दोषपूर्ण है और उस द्वारा दिया गया सूक्ष्म राजनैतिक वर्णन बड़ा ही अखरता है। इस कमी के बाद भी उसने हुमायूँ के व्यक्तिगत गुणों और उसकी कमियों का जिस प्रकार चित्रण किया है वह निश्चित ही रोचक है।

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