शनिवार, 17 सितंबर 2022

बलबन का राजत्व

बल्बन दिल्ली का एकमात्र सुल्तान है जिसने राजत्व संबंधी अपने विचारों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया। सुल्तान के उच्च पद और शासक के दायित्व के विषय में कुछ न कुछ कहने के लिए वह कोई अवसर नहीं खोता था इसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब वह नासिरुद्दीन महमूद का प्रधानमंत्री बना। हबीबुल्लाह का कहना है कि महमूद ने लगभग 20 वर्षों तक राज्य किया परन्तु शासन नहीं किया, शासन तो बलबन ने किया था  

राजत्व की जोरदार अभिव्यक्ति का कारण

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि राजमुकुट को एक उच्च और सम्मानित स्तर पर स्थापित करने के लिए तथा सामंतशाही से संघर्ष और विरोध की समस्त संभावनाएं समाप्त करने के लिए यह आवश्यक था किंतु इन निरंतर उपदेशों के पीछे उसकी हीन भावना और अपराध भाव की जटिल प्रक्रिया का भी आभास मिलता है।

1.    राजहंता का कलंक

अपने मलिकों और अमीरों जिनमें अधिकांश उसके सहचर थे, के कानों में निरंतर चिल्ला चिल्ला कर यह कहने से कि राजत्व एक दैवी संस्था है, उसका यह उद्देश्य था कि राज्यहंता का जो कलंक उसके माथे पर लगा था, उसे धो डाले और उनके मन में यह विचार भलीभांति बिठा दे कि वह देवेच्छा से ही सिंहासनारूढ़ हुआ है न कि किसी हत्यारे के विष भरे प्याले या कटार से।

2.   दासता के कारण कानूनी अयोग्यता

इसके अतिरिक्त मिनहाज या बरनी के इतिहास में उसकी दासता से मुक्ति के विषय में कोई संदर्भ न होना भी महत्वपूर्ण है। संभवतः वह दासता से कभी मुक्त नहीं किया गया। अपनी इस मौलिक क़ानूनी अयोग्यता के कारण वह जनता पर शासन करने का अधिकारी नहीं था और इसी को छिपाने के लिए उसने "दैवी दायित्व" की आड़ लेकर अपनी सत्ता को वैधानिक रूप देने का चालाकी से प्रयत्न किया।                

                    बलबन के राजत्व के सैद्धांतिक और फारसी तत्व

बल्बन के राजत्व सिद्धांत का स्वरूप और सार सस्सानी परसिया से लिया गया था जहां राजत्व उच्चतम स्तर तक ले जाया जा चुका था और उसके अलौकिक और दैवी गुण सार्वजनिक रूप से मान लिए गए थे ताकि सस्सानी साम्राज्यवादी वंश का व्यक्ति ही सिंहासनारूढ़ हो सके। अपने राजनीतिक आदर्श के लिए वह फारस के पौराणिक वीरों से प्रेरणा लेता था और जहां तक संभव हो सकता था उनका अनुसरण करने का प्रयत्न करता था। उसके राजत्व सिद्धांत के मूल तत्व इस प्रकार हैं :

1.    राजपद की गरिमा : राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि

राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि 'नियाबते खुदाई' है और मान-मर्यादा को दृष्टि से वह केवल पैगंबरी के बाद ही है। राजा ईश्वर का प्रतिबिम्ब (जिल्ले अल्लाह) है और उसका हृदय दैवी प्रेरणा और क्रांति का भंडार है। अपना राजसी दायित्व पूर्ण करने के लिए वह निरंतर ईश्वर द्वारा प्रेरित और निर्देशित होता रहता है। इस विचारधारा का वास्तविक अर्थ यह था कि राजा की शक्ति का स्रोत सामंतवर्ग या जनता नहीं बल्कि केवल ईश्वर है और फलस्वरूप उसके कार्य सार्वजनिक जांच के अधीन नहीं हैं। यह एक जटिल धार्मिक युक्ति थी जिस से वह अपनी निरंकुश सत्ता को पवित्र बनाना चाहता था। दिखावटी मान मर्यादा और प्रतिष्ठा राजत्व के लिए महत्वपूर्ण बनाई गई। अपने संपूर्ण शासन काल में बल्बन सदैव जन साधारण से दूर रहा और इस धारणा को वह इतनी दूर ले गया कि वह साधारण व्यक्तियों से बात करना भी पसंद नहीं करता था। फख्र बावनी नामक दिल्ली के एक धनी व्यक्ति ने राजमहल के अधिकारियों को रिश्वत देकर सुल्तान से भेंट करनी चाही किंतु सुल्तान ने अपने अधिकारियों का निवेदन अस्वीकार कर दिया। राजत्व की मान मर्यादा से संबंधित तत्वों के महत्व ने उसे शिष्टाचार का आग्रही बना दिया था। वह दरबार में अपने संपूर्ण राजसी वैभव और उपकरणों के बिना कभी उपस्थित न होता था उसके निजी सेवकों ने भी कभी उसे शाही पोशाक, मोजे और मुकुट के बिना न देखा।

2.   कुलीनता पर जोर : सम्मान के लिए दूरी

बलबन सदैव कुलीन और अकुलीन परिवार के व्यक्तियों के अंतर के महत्व पर बल दिया करता था। वह अकुलीन परिवार के व्यक्तियों से संपर्क रखना या शासन में किसी पद पर उनकी नियुक्ति को शासक की मान मर्यादा गिराने वाला समझता था। उसने तुच्छ कुल में जन्में सभी व्यक्तियों को  महत्वपूर्ण पदों से निकाल दिए। अपने दरबारियों को कमाल महियार नामक एक नए मुसलमान का अमरोहा के मुतसरिफ़' के पद पर चयन किए जाने पर बहुत डांटा। कहते हैं कि उसने कहा कि, 'जब मैं किसी तुच्छ परिवार वाला व्यक्ति देखता हूं तो मेरे शरीर की प्रत्येक नाड़ी क्रोध से उत्तेजित हो उठती है। वंशावली बलबन की सनक बन गई। वह स्वयं अपनी वंशावली फिरदौसी के 'शाह नामा' में उल्लिखित पौराणिक अफ़रासियाब से जोड़ता था और यह बात बड़े गर्व और अहंकार से अपने दरबार में कहता था। अपने एक पत्र में सैय्यद अशरफ़ जहांगीर सम्नानी लिखते हैं कि बलबन ने अपने समस्त अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों के परिवारों के विषय में जांच कराई। देश के सभी प्रदेशों से वंशावली के विशेषज्ञ दिल्ली में एकत्रित हुए थे ताकि वे इन लोगों के पारिवारिक स्तर निश्चित करने के लिए उसकी सहायता करें। 

3.   फ़ारस के रीतिरिवाजों तथा परंपरा पर जोर : संस्कृतिकरण

बलबन की यह धारणा थी कि फ़ारस के रहन-सहन की परंपराएं अपनाए बिना राजत्व संभव नहीं है। अपने निजी तथा सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक विषय में वह फ़ारस के रीतिरिवाजों का अत्यंत सावधानी से अनुसरण करता था। राज्यारोहण के 'पूर्व' उसके जिन पुत्रों का जन्म हुआ उनका नाम उसने महमूद और मुहम्मद रखा किंतु उसके पौत्र जो सिंहासनारोहण के बाद उत्पन्न हुए उनके नाम फ़ारस के सम्राटों की भांति कैकूबाद, कैखुसरो रखे गए।

4.   खलीफा को मान्यता : धार्मिक युक्ति

प्रायः बल्बन राजनीतिक शक्ति का प्रयोग करने के लिए ख़लीफ़ा की अनुमति लेने की चर्चा किया करता था। वह बग़दाद के पतन और ख़लीफ़ा के अंत के विषय में जानता था फिर भी वह ख़लीफ़ा को जो समस्त मुसलमानों के राजनीतिक संप्रदाय का नेता था, राजनीतिक सत्ता की मान्यता पर बल देता था। उसके सिक्कों पर दिवंगत ख़लीफ़ा का नाम अंकित होता था और मस्जिदों के 'खुत्बे' में उसे पढ़ा जाता था।

5.   बलबन का दरबार : भौकाल

बल्बन ने अपना दरबार ईरानी परंपरानुसार संगठित किया और सस्सानी के शिष्टाचार और औपचारिकता को बड़ी सावधानी और विस्तारपूर्वक ग्रहण किया। सूर्य के समान चमकते अपने चेहरे पर जिस पर कपूर जैसी सफ़ेद दाढ़ी थी। वह अपने सिंहासन पर महान सस्सानी शासकों की भांति बैठता था। सोलहवीं शताब्दी का एक लेखक फ़िजूनी अस्तराबादी कहता है कि उसके लंबे चेहरे पर लंबी दाढ़ी थी और वह बहुत ऊंचा मुकुट इस तरह पहनता था कि उसकी दाढ़ी के अंतिम छोर से उसके मुकुट के शिखर तक लगभग एक गज की लंबाई होती थी। इस भय उत्पन्न करने वाले व्यक्तित्व के साथ दरबार की प्रतिभा और शिष्टाचार तथा औपचारिकता के छोटे-छोटे तत्व जुड़े रहते थे' 'हाजिब' 'सलाहदार' 'जानदार' 'चाऊश' तथा 'नक़ीब' आदि बड़ी गंभीर मुद्रा में मौन होकर उसके चारों ओर खड़े रहते थे। सुल्तान 'सिजदा' (घुटनों पर बैठ कर शीश नवाना) और 'पायबोस' ( चरणस्पर्श ) की परंपरा को उन सभी व्यक्तियों से पूरे करने का आग्रह करता था, जिन्हें उसके समक्ष उपस्थित होने का विशेषाधिकार प्राप्त होता था। उसकी उपस्थिति में कोई मजाक़ या फालतू बातचीत संभव नहीं थी सिंहासन के पीछे केवल कुछ विश्वसनीय मलिक और विश्वासपात्र बैठते थे। अन्य लोग उसके सामने अपने पद और स्थिति के अनुसार खड़े रहते थे। सुल्तान अपने पद की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए बड़ी गंभीर मुद्रा में बैठता था। कभी किसी व्यक्ति ने उसे हंसते हुए या साधारण अवस्था में नहीं देखा। उसके जीवन में बड़े भयंकर व्यक्तिगत तूफ़ान तीव्र और अनपेक्षित रूप से आए। अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक दरबार की औपचारिकताओं का यह सनकी अपने लिए निर्धारित कठिन कार्यक्रम का सावधानी से अनुसरण करता रहा। समारोहों के समय दरबार एक अद्भुत शानशौकत का स्थल दिखाई देता था। कढ़े हुए क़ालीन, सजावटी परदे, रंगबिरंगे वस्त्र, तथा सोने-चांदी के बर्तन देखने वालों की दृष्टि चकाचौंध कर देते थे। दरबानों के स्वर दो कोस तक सुनाई देने थे। बरनी लिखता है कि, 'इन समारोहों के कई दिन बाद तक लोग दरबार की सजावट के विषय में बातें किया करते थे।' विदेशों से जब राजदूत उसके दरबार में आते थे तो वे अवाक और आश्चर्यचकित रह जाते थे। जब सुल्तान जुलूस में निकलता था तो सीस्तानी सैनिक नंगी तलवारें लेकर उसके साथ चलते थे। सूर्य की चमक, तलवारों की जगमगाहट और उसके चेहरे की कांति सभी सामूहिक रूप से एक प्रभावशाली दृश्य प्रस्तुत करते थे। जब शाही जुलूस बाहर निकलता था तो ' बिस्मिल्ला ! बिस्मिल्ला !' के नारे वातावरण चीरते थे। शक्ति, सत्ता और प्रतिष्ठा का यह प्रदर्शन जो अभिन्न रूप से उसके मस्तिक में जमा रहता था, उसके राजत्व सिद्धांत सहित देश के अत्यंत उद्दंड को भी आज्ञाकारी बना देता था और जनसाधारण के मन में भय एवं आतंक उत्पन्न करता था।

 

                  राजत्व को संबल देने वाले व्यवहारिक तत्व

1.   सेना का पुनर्गठन : हिंसा के साधनों पर एकाधिकार

सेना का पुनर्गठन राजनीतिक अनुभव से बल्बन ने यह सीखा था कि सेना शासन का मूल स्तंभ है। इसलिए अन्य किसी विभाग के पूर्व उसका संगठन आवश्यक था। इल्तुतमिश द्वारा प्रचलित परंपराओं की गति मंद पड़ गई थी और इसलिए सेना का संपूर्ण पुनर्गठन आवश्यक था।

1.    बल्बन ने सेना की संख्या में वृद्धि की और सेना के केंद्रीय दल 'क़ल्बे आला’ में सहस्रों निष्ठावान और अनुभवी अधिकारी नियुक्त किए। उनका वेतन बढ़ा दिया गया और वेतन के बदले उनके लिए गांव निश्चित किए गए।

2.    सैनिकों के वेतनों में वृद्धि और उन्हें सुखी और संतुष्ट रखना बल्बन की सामरिक नीति का एक आवश्यक अंग था। उसने अपने पुत्र बुगरा ख़ां को यह परामर्श दिया : सेना के लिए कितना भी धन व्यय करना हो उसे अधिक न समझो और अपने 'आरिज' ( सैनिक भर्ती करने वाला अधिकारी ) को पुराने सैनिकों की व्यवस्था करने और नवीन की भर्ती करने में व्यस्त रहने दो। उसे अपने विभाग में प्रत्येक व्यय के विषय में सूचना होनी चाहिए।

3.   सेना सदैव सतर्क और फुर्तीली बनाए रखने के लिए वह बार बार सैनिक अभ्यास पर बल देता था। प्रत्येक शरद् ऋतु में प्रातःकाल वह रेवाड़ी की ओर शिकार खेलने के बहाने जाया करता था और अपने साथ एक हजार अश्वारोही तथा एक हजार पैदल बाण चलाने वाले ले जाता था और बहुत रात गए वापस आता था।

2.  प्रशासनिक उपाय : प्रबुद्ध निरंकुशता का कल्याणकारी उपाय

सुल्तान की प्रशासनिक उपलब्धियों का वर्णन करते हुए बरनी लिखता है : 'प्रकृति ने सुल्तान बलबन के शरीर पर राजसी वस्त्र सिल दिए थे। जिस समय वह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा तो प्रत्येक राजकीय कर्मचारी स्वेच्छाचारी था और समस्त प्रशासनिक प्रणाली अस्तव्यस्त थी। उसने उसके समस्त ढीले पुर्जे कसे और नौकरशाही को शाही सत्ता के प्रति निष्ठवान और आज्ञाकारी बना दिया। पूर्व और पश्चिम के अधिकांश मध्यकालीन शासनों की भांति बल्बन का शासन भी अर्ध नागरिक तथा अर्धसैनिक था। यह मध्यकालीन युद्ध प्रणाली के कारण था क्योंकि सरकारी अधिकारी तब तक कार्य नहीं कर सकते थे जब तक उनमें नागरिक और सैनिक शासन की क्षमता न हो।

1.    वह प्रशिक्षण और नियुक्तियों पर दृष्टि रखता था। वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति के कारण अब सैनिक प्रशिक्षण अत्यंत विशिष्ट विषय बन गया है। मध्य युग में प्राय: तलवार चलाना और लेखनी पर दक्षता साथ साथ सिखाए जाते थे। राजनीतिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बल्बन ने फूट उत्पन्न करने वाली प्रवृतियां दृढ़ता से रोकीं। वह केंद्रीय राजनीतिक सत्ता में विश्वास करता था। अधिकांश सरकारी नियुक्तियां या तो वह स्वयं करता था या उसकी अनुमति से होती थीं। यह तथ्य कि अमरोहा में की गई एक साधारण नियुक्ति उसका ध्यान आकर्षित कर सकती थी, यह सिद्ध करता है कि वह समस्त नौकरशाही व्यवस्था पर कड़ी दृष्टि रखता था ।

2.   प्रांतीय राज्यपालों को उसे अपनी सामयिक रिपोर्ट भेजनी पड़ती थी। राज्यपालों की आर्थिक क्रियाओं पर अत्यंत दक्ष लेखा परीक्षा प्रणाली नियंत्रण रखती थी। मुल्तान तथा लखनौती जैसे सीमांत प्रांतों की गंभीर परिस्थिति देखते हुए उसने अंत में अपने पुत्रों को इन क्षेत्रों में राज्यपाल नियुक्त किया। बल्बन किसी सामंत या अधिकारी को यह अवसर नहीं देना चाहता था कि वे साम्राज्य के किसी सूक्ष्म क्षेत्र में अपनी स्थिति संगठित कर लें और फिर उसके सामने वह कठिनाई प्रस्तुत करें जो तुग़रिल ने की थी। यदि पश्चिमी सीमा के प्रहरी का पद ही राज्याधिकार के लिए साधन था तो उसके ज्येष्ठ पुत्र के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति उस क्षेत्र का अधिकारी नहीं हो सकता था।

3.   चूंकि सुल्तान की शक्ति कम करने के लिए पहले स्वयं बल्बन ने ही 'नायबे मुमलकत' की भांति नए पदों का सृजन किया था इसलिए उसने इसका ध्यान रखा कि किसी अधिकारी के हाथ में बहुत अधिक शक्ति एकत्र न हो पाए। उसने वजीर से उसके सैनिक और आर्थिक अधिकार छीन कर उसके पद का महत्व कम कर दिया। वजीर पद पर बाजा हसन की नियुक्ति से इस बात का संकेत मिलता है कि प्रधान मंत्री पद के प्रति उसका क्या दृष्टिकोण था और उस से कैसे कार्य की वह आशा करता था। आर्थिक और सैनिक अधिकार पृथक करने के पश्चात किसी राज्याधिकारी द्वारा सत्ता हड़पने की आशंका बिल्कुल समाप्त हो गई।

4.   बल्बन ने यह अनुभव किया कि एक निरंकुश शासन के लिए निष्ठावान गुप्तचर प्रणाली की आवश्यकता थी। उसके गुप्तचर उसे सदैव राज्य के प्रत्येक प्रदेश में होने वाली घटनाओं से भलीभांति अवगत रखते थे। उसके पुत्रों, संबंधियों, प्रांतीय राज्यपालों, सैनिक अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और जनता की गतिविधियों पर गुप्तचर दृष्टि रखते थे और उनकी सूचना भेजते रहते थे। बलबन 'बरीद' (गुप्तचर अधिकारी) की नियुक्ति बड़ी सावधानी से करता था। चरित्र, ईमानदारी यहां तक कि वंशावली की पूरी जांच के पश्चात ही कोई व्यक्ति 'बरीद' के पद पर नियुक्त किया जाता था। 'बरीदों' को जन साधारण तथा गुप्तचर पहचानते थे और उन की सफल व्यवस्था जिस से जनता में चारित्रिक दुर्बलता और अविश्वास उत्पन्न न हो, सुल्तान की चतुरता पर निर्भर थी। इस विषय में बल्बन ने अपने पुत्र को यह परामर्श दिया सूचना देने वालों को और गुप्तचरों को दरबार के निकट न आने दिया जाए, क्योंकि शासकों के पास उनकी निकटता से आज्ञाकारी तथा विश्वसनीय मित्र हो जाते हैं और उनका शासक पर विश्वास जो उत्तम शासन का आधार है नष्ट हो जाता है।

 

बल्बन के राजनीतिक दृष्टिकोण और प्रशासनिक सिद्धांतों की झलक उन दो व्याख्यानों से मिल सकती है जिन्हें उसने अपने पुत्रों को दिया था और जिन से बरनी ने विस्तृत उद्धरण लिए हैं। इन शिक्षाओं से निम्नलिखित सिद्धांतों की जानकारी होती है :

1.    शासन को संरक्षात्मक कानून बनाने चाहिए और समर्थ लोगों के अत्याचार से दुर्बल व्यक्तियों के हितों की रक्षा करनी चाहिए।

2.   संतुलित आचार शासन का आदर्श वाक्य होना चाहिए। जनता से व्यवहार में न तो कठोरता होनी चाहिए और न ढिलाई कर न तो इतना अधिक होना चाहिए जिससे जनता दरिद्र हो जाए और न इतने कम कि वे अवज्ञाकारी और धृष्ट हो जाएं।

3.   शासन इस बात का ध्यान रखे कि जनता की आवश्यकतानुसार उपयुक्त अनाज की उपज होती है।

4.   शासक के आदेश दृढ़ता से लागू किए जाएं और शासन के निर्णयों में बार-बार परिवर्तन नहीं  होना चाहिए

5.   राज्य की आर्थिक स्थिति का समुचित नियोजन और व्यवस्था होनी चाहिए। वार्षिक आय का केवल आधा भाग ही व्यय करना चाहिए। शेष आधा भाग संकटकालीन समय के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।

6.   शासन को चाहिए कि वह व्यापारियों को समृद्ध और संतुष्ट रखने का प्रयत्न करे।

7.   सैनिकों का वेतन उचित समय पर दे देना चाहिए और सेना को प्रसन्न तथा संतुष्ट रखना चाहिए।

 

3.  न्याय : साधारण मनुष्यों की सहानुभूति और प्रशंसा

बलबन न्याय को शासक का सर्वोच्च दायित्व समझता था। उसके निरंकुश शासन की यह संतोषजनक विशेषता थी और उसके फलस्वरूप उसे साधारण मनुष्यों की सहानुभूति और प्रशंसा अवश्य प्राप्त हुई होगी। जब कभी किसी साधारण व्यक्ति के प्रति अन्याय या अत्याचार की सूचना उसे मिलती थी तो वह क्रोध से आग बबूला हो जाता था और अपने अधिकारी या संबंधी तक को दंड देने में संकोच नहीं करता था। क़राबेग के पिता मलिक बक़बक़ को जो बदायूं का इक्तादार था और मलिक किरान के पिता हैबत ख़ां को, जो अवध का इक्तादार था, कठिन दंड दिए गए। मलिक बकबक का वध किया गया और हैबत खां को 20,000 टंके का जुर्माना देना पड़ा क्योंकि उन्होंने अपने निजी घरेलू नौकरों की हत्या कर दी थी।

यद्यपि बल्बन, लोगों के व्यक्तिगत झगड़ों में न्याय करता था किंतु जब किसी व्यक्ति का राज्य से झगड़े का विषय प्रस्तुत होता था जहां उसके निजी या उसके पारिवारिक हितों का प्रश्न होता था तो वह न्याय और ईमानदारी के सिद्धांतों की लेशमात्र परवाह न करता था। ऐसी स्थिति में न तो वह न्याय और ईमानदारी की परवाह करता और न 'शरीयत' की ओर अत्यंत अविवेकपूर्ण व्यवहार करता था।

4.  गुप्तचर व्यवस्था : निरोधक शक्ति

उसके 'बरीद' ( गुप्तचर विभाग के अधिकारी ) साम्राज्य के विभिन्न प्रदेशों के अधिकारियों के कार्यों की पूर्ण सूचना उसे देते रहते थे। यदि कोई 'बरीद' किसी स्थानीय अधिकारियों की निरंकुशता का समाचार नहीं पहुंचाता था तो उसे घोर दंड दिया जाता था। बदायूं के 'बरीद' का वध कर उसकी लाश को सूली पर इसलिए प्रदर्शित किया गया क्योंकि उसने इस कर्तव्य का पालन नहीं किया था।

5.  नीति के क्रियान्वयन पर जोर : कमिटमेंट

बलबन के राजत्व-सिद्धान्त का व्यवहृत रूप अथवा क्रियान्वयन हमें लखनौती के विद्रोह एवं उसके उन्मूलन में स्पष्ट रूप से दिखायी देता है। लखनौती में उसके दास व गवर्नर तुगरिल खाँ ने शासन के आठवें वर्ष (1275 ई.) में विद्रोह कर दिया था। इस विदोह के दमन के लिए अवध के राज्यपाल मलिक ऐतिगिन मुएदराज़ या अमीन खाँ को भेजा। उसके असफल होने पर उसे मृत्युदण्ड दिया गया। सुल्तान की आज्ञा का अक्षरशः पालन न कर पाना अवज्ञाकारिता मानी गयी। उसका शव अवध के मुख्य द्वार पर लटका दिया गया, ताकि भविष्य में सुल्तान के आदेशों के परिपालन में गम्भीरता एवं पूर्ण निष्ठा दिखायी जाए। उसके पश्चात् जब बहादुर भी नियुक्त होकर असफल हुआ, तब बलबन ने उसे भी मृत्यु-दण्ड के लिए उपयुक्त माना, किन्तु बीच-बचाव करने पर अन्ततः उसे दरबार से निर्वासित कर दिया। तत्पश्चात् जब स्वयं एक विशाल सेना व पुत्र बुगरा के साथ बंगाल में तुगरिल का उन्मूलन कर दिया, तब तुगरिल के वध से ही वह सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसने उसका कटा सिर तो बरछी की नोंक पर पूरे राज्य में घुमवाया ही नहीं बल्कि धड़ लखनौती के मुख्य द्वार पर लटका दिया। इतना ही नहीं, लखनौती के मुख्य बाजार में दोनों तरफ फाँसी के तख्ते लगवाए गए और तुगरिल के अनुयायियों, सैनिकों एवं समर्थकों को सार्वजनिक रूप से मृत्यु-दण्ड दिया गया। इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी के वर्णनानुसार, बलबन ने इल्तुतमिश की ही बंगाल नीति का अनुसरण करते हुए, उसके राजनीतिक व सामरिक (दिल्ली से बंगाल की दूरी के कारण) महत्त्व को समझते हुए, अपने पुत्र बुगरा खाँ को वहाँ का गर्वनर नियुक्त किया। इतना ही नहीं, उसने बुगरा खाँ को सम्बोधित करते हुए तीन बार पूछा कि क्या उसने लखनौती का यह वीभत्स दृश्य देखा ? फिर उसे समझाया कि यदि उसे भी 'धूर्त, षडयन्त्रकारियों ने दिल्ली के विरुद्ध विद्रोह के लिए भड़काया, तो उसका एवं उसके सहयोगियों का भी यही हश्र होगा। बलबन ने इस प्रकार अपना राजत्व का सिद्धान्त सुस्पष्ट कर दिया कि, “राजत्व, बन्धुत्व नहीं जानता।"

इन मौलिक सिद्धांतों के अंतर्गत बल्बन ने एक दृढ़ और कार्यकुशल शासन प्रणाली का निर्माण किया। जनता को वह 'शांति और न्याय' दिया जिसकी वह कई दशकों से प्रतीक्षा कर रही थी। बरनी द्वारा लिखित सुल्तान के इतिहास से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि जहां बल्बन अपने मलिकों और अमीरों के प्रति कठोर और काम लेने वाला था जिनकी स्थिति से वह स्वयं उठा था, वहां वह साधारण नागरिक के लिए बड़ा दयालु और उनका ध्यान रखने वाला था। जनता के प्रति वह पिता तुल्य व्यवहार प्रदर्शित करता था यद्यपि उसे अकुलीन व्यक्तियों से घृणा थी।

 

                          राजत्व का नकारात्मक पक्ष

तुर्क सामंत बलबन जो उसी चट्टे बट्टे वाला एक व्यक्ति था, तुर्क शासक वर्ग की शक्ति और दुर्बलताएं भलीभांति जानता था। उसकी शक्ति इस वर्ग के समर्थन पर निर्भर थी किंतु उसे तीन बातों से सतर्क रहना था।

(1) राजमुकुट और सामंतों के बीच हुए पहले जैसे संघर्ष

(2) अपनी मृत्यु के पश्चात उसके पुत्रों और तुर्क सामंतों से बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा और

(3) सीमांत प्रदेशों में तुर्क सामंतों द्वारा शक्ति का एकाधिकार

इस उद्देश्य के लिए उसने जो नीति अपनाई वह भारतवर्ष में तुर्क शासक वर्ग के व्यापक हितों के लिए बड़ी घातक सिद्ध हुई।

(1) उसने इल्तुतमिश के परिवार के सभी सदस्यों को बड़ी निर्दयता से मार डाला।

(2) उसने योग्य तुर्क सामंतों को जो उसके उत्तराधिकारियों को चुनौती दे सकते थे, मार्ग से हटाने के लिए विष और कटार का मुक्त प्रयोग किया।

(3) उसने तुर्काने चिहलगानी के दल पर जिसका वह स्वयं सदस्य था, घातक प्रहार किया और उसके प्रमुख सदस्यों की हत्या कर उसके सामूहिक जीवन का अंत कर दिया जो पारस्परिक विरोध और वैमनस्य होते हुए भी गैर तुर्क तत्वों से संघर्ष के समय सफलतापूर्वक उपयोग में लाया जा सकता था।

(4) उसने अपने संबंधियों जैसे शेर-खां तक की केवल ईर्ष्या वश हत्या कर दी।

चूंकि बल्बन अपने तथा अपने वंश के निजी हितों की रक्षा करने के लिए उत्सुक था इसलिए उसने तुर्क शासक वर्ग के हितों की लेशमात्र भी परवाह नहीं की। उसने तुर्की में योग्य व्यक्ति इतनी निर्दयता से नष्ट कर दिए कि जब ख़ल्जी उनके विरुद्ध सिंहासन के लिए प्रतिस्पर्धी के रूप में राजनीतिक क्षेत्र में उतरे तो वे बिल्कुल विस्मित हो कर पराजित हुए। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतवर्ष में तुर्क सत्ता के पतन के लिए बलबन उत्तरदायी था। उसके संगठन कार्यक्रम ने निस्संदेह दिल्ली सुल्तान की स्थिरता आश्वस्त कर दी और ख़ल्जियों के अंतर्गत उसके और अधिक प्रसार के लिए मार्ग बना दिए किंतु तुर्क सामंतों के लिए उसकी नीति ने उसे दुर्बल बना दिया और उसकी आयु कम कर दी।

इल्तुतमिश का राजत्व सिद्धांत

इल्तुतमिश के विषय में तो डॉ. राम प्रसाद त्रिपाठी का सुस्पष्ट अभिमत हैं कि, 'भारतवर्ष में मुस्लिम प्रभुसत्ता का वास्तविक श्रीगणेश उसी से होता है'। वस्तुतः जब उसने राजसत्ता संभाली तब न तो कोई स्पष्ट पूर्व परम्पराएँ थीं। और न ही स्थापित व्यवस्था किन्तु जब उसने अपनी आँखें मूंदी, तब  एक राजवंश की दृढ़ स्थापना हो चुकी थी। अब हमें इल्तुतमिश के काल में 'मुस्लिम राजत्व सिद्धान्त' की एक स्पष्ट अवधारणा दिखायी देती है। उक्त अवधारणा के अनुसार मुस्लिम संप्रभुता या राजत्व सिद्धान्त के दो पहलू थे एक, व्यवहारिक (De Facto) एवं दूसरा संवैधानिक (De Jure)

      इल्तुतमिश के राजत्व का व्यवहारिक पहलू   

व्यवहारिक दृष्टिकोण से तो जो शासक, राज्य में कानून - व्यवस्था बनाए रखें; बाह्य आक्रमणों से देश को सुरक्षित व संरक्षित रखे, एवं निश्चित अवधि में निर्धारित मात्रा में राजकीय करों की वसूली सफलतापूर्वक करें, तो वह एक व्यवहारिक शासक है।

1.   उत्तराधिकार की समस्या का सहज समाधान

अपनी योग्यतम सन्तान नासिरूद्दीन महमूद को उसने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, किन्तु उसकी मृत्योपरान्त जब रज़िया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने को वह परिस्थितिवश बाध्य हुआ था, तब भी ग्वालियर के अभियान के दौरान उसने राज्य का प्रशासनिक दायित्व रज़िया को सौंपकर, वास्तव में, उसका परीक्षण किया था। उसकी प्रशासनिक निपुणता के मूल्यांकन के बाद ही उसने रज़िया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

2.  मंगोल आक्रमण के समय अभूतपूर्व तटस्थता

दूसरी घटना चंगेज़ खाँ के नेतृत्व में हुए मंगोल आक्रमण की है। उसने 'अभूतपूर्व तटस्था' (Splendid Isolation ) की जो नीति अपनायी तथा अपने राज्य को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने के जो कूटनीतिक कदम उठाए, उससे एक बड़ी विभीषिका सफलतापूर्वक टल गयी।

3.  राजवंशीय राजतन्त्र के दैवी सिद्धांत में आस्था

प्रोफेसर के. ए. निज़ामी के विचारानुसार, इल्तुतमिश की आस्था एक राजवंशीय राजतंत्र में थी एवं उसने 'आदाबुस्सलातीन' तथा 'मआसिरूस्सलातीन' नामक पुस्तकें इसी उद्देश्य से बगदाद से मँगवाई थीं, कि, उसके पुत्रों को ईरानी राजतंत्रीय परम्पराओं एवं राजनय के सिद्धान्तों का ज्ञान प्रदान किया जा सके। उसने स्वयं इनका अध्ययन किया तथा भारतीय वातावरण में इन्हें समन्वित भी किया। वह शासक के दैवी सिद्धान्त में पूर्ण विश्वास रखता था एवं ऐसा आचरण करता था, जिससे स्पष्ट ही वह अपने अधीनों को सफलतापूर्वक नियन्त्रित रख सका।

4.  राजतंत्र के आधार - सैन्य एवं उमरा

उसके राजतंत्र के आधार - सैन्य एवं उमरा थे। उमरा में भी तुर्क, अफ़गानों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में ताज़िकों को भी उसने सहर्ष सम्मिलित किया था तथा उनके पूर्व प्रशासनिक अनुभव का लाभ, उसके उदार संरक्षण में दिल्ली के शैशव राज्य को प्राप्त हो सका था। समर्थन के लिए चालीसा का गठन किया।

5.  प्रशासन का भारतीय स्वरुप

यही नहीं, 'मुस्लिम प्रभुसत्ता' की नींव रखने वाले इस सुल्तान ने हिन्दू शासकों को भी संरक्षण प्रदान करके एक 'भारतीय' प्रशासनिक स्वरूप का आधार भी रखा था, जिसकी तार्किक परिणति हमें अकबर तथा महान मुगलों के काल तक देखने में मिलती है।

6.  न्याय व्यवस्था

न्याय के लिए नगरों में काज़ी व अमीरे दाद नियुक्त किया गया। इब्नेबतूता के अनुसार सुलतान के महल के समक्ष गले में घंटी युक्त दो सिंह बने हुए थे, जिसे बजा कर न्याय प्राप्त किया जा सकता था। फरियादी लाल वस्त्र पहनते थे।

     इल्तुतमिश के राजत्व का संवैधानिक पहलू 

दरअसल संवैधानिक रूप से उसे ही शासक उसे ही स्वीकार किया जा सकता था, जो न्यूनतम संवैधानिक अर्हताओं की पूर्ति करता हो। इस दृष्टिकोण से तो इल्तुतमिश ही इन अर्हताओं की पूर्ति करने वाला प्रथम सुल्तान था। अतः वह प्रथम संवैधानिक सुल्तान माना जाता है।

1.   सिक्के का प्रचलन

मुद्रा का प्रचलन तथा उसकी सर्वमान्यता किसी भी राज्य के शासन को वैधता प्रदान करती है। साथ ही यह नागरिकों की “हम बनाम वे” की भिन्नता को पाट कर एक तरह की एकता को सृजित करता है। इस प्रकार प्रत्येक सुल्तान को अपने नाम की मुद्रा प्रचलित करनी पड़ती थी। इसने शुद्ध अरबी सिक्के चाँदी का टंका तथा ताम्बे के जीतल का प्रचलन कराया जिस पर टकसाल तथा खलीफा का नाम अंकित था।

2.  खुत्बे में नाम

'खुत्बा' अर्थात् सिंहासनारोहण के पश्चात् की विशेष शुक्रवार की दोपहर (प्रायः एक बजे के लगभग) सुल्तान के नाम से अदा की जाती थी; इस ख़ुत्बे में इल्तुतमिश का नाम भी शामिल कर लिया गया।

3.  अमीरों की निष्ठा की शपथ “बैय्यद” 

बैय्यद या बैय्यत, यह अमीरों द्वारा सुल्तान के प्रति ली जाने वाली निष्ठा की शपथ थी, जिसके माध्यम से अप्रत्यक्ष चुनाव का बोध होता था; निष्ठा की यह शपथ शासक को, शासक को शासन के लिए वैधता प्रदान करती थी।

4.  दासता से मुक्ति

इल्तुतमिश को तो यह दासता मुक्ति-पत्र 1206 ई. में प्राप्त हो गया था। राज्याभिषेक के समय काजी वजीहुद्दीन काशानी के नेतृत्व में विधिवेत्ताओं ने इस पर जब सवाल उठाये तो उन्हें दासता मुक्ति प्रमाण पत्र दिखा दिया गया।

5.  खलीफा से मान्यता

इल्तुतमिश दिल्ली का प्रथम सुल्तान था, जिसे फरवरी 18, 1229 ई. को बगदाद के खलीफ़ा अत्त् मुस्तनिसर बिल्लाह से मान्याभिषेक प्राप्त हुआ था। इस अवसर पर राजधानी को सजाया गया तथा उत्सव मनाया गया।

निष्कर्ष

इस प्रकार इल्तुतमिश राजत्त्व के प्रचलित सिद्धान्तों से पूर्णतया परिचित एवं उसका पालन/क्रियान्वयन करने वाला सुल्तान था।


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

शोध आलेख - डॉ बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और बुद्धिज्म : नव यान

सन्दर्भ के लिए - Pandey, Rajiv Kumar, and Siddharth Shankar Rai. “डॉ॰ बाबासाहब भीमराव अंबेडकर और बुद्धिज्म : नवयान.” समसामयिक सृजन अक्तूबर - दिसंबर (2021): 220–222. Print.


सार

डॉ० अंबेडकर के आध्यात्मिक अंतर्द्वंद्व का अनथक बौद्धिक प्रयास उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में स्पष्ट हो गया। उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार ही नहीं किया बल्कि संकल्प लिया कि वह अब उसके बारह सौ वर्ष के बनवास को दूर करेंगे तथा उसे उसकी मातृभूमि में पुनः स्थापित कर भारतीय संस्कृति को एक शाश्वत संशोधनवादी पुनर्जीवन देंगे। उनकी तीक्ष्ण बुद्धि की तार्किकता तथा नैतिकता के आग्रह ने धर्म का एक ‘नया रास्ता’ विकसित किया जिस पर उनके लाखो लोग चल पड़े।

बीज शब्द

डॉ अंबेडकर, नवयान, बुद्धिज्म, धर्म, भारत, संस्कृति  

1. पृष्ठभूमि

धर्म के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए डॉ अंबेडकर कहते हैं कि व्यक्ति के सद्गुणों का विकास सच्चे धर्म का अन्तिम उद्देश्य है। वह सनातन संस्कृति के अग्रणी नेता तिलक की इस बात से इत्तेफाक रखते थे कि ’’जिस कारण प्रजा का धारण होता है वही धर्म है।’’ धर्म प्रजा के धारण के लिए बंधुभाव, समता और स्वतंत्रता के सद्गुणों के संस्कार डाले, ऐसी अपेक्षा ही नहीं बल्कि धर्म की अहम जिम्मेदारी होती है। हिन्दू धर्म इन सद्गुणों के संस्कार पैदा नहीं करता इसलिए इसको नकारना पड़ता है। उनकी यह स्थापना है कि अस्पृश्यता के कारण ही करोड़ों व्यक्तियों के गुणो का विकास नहीं हो सका। ऐसा धर्म जो सदियों से एक पूरे वर्ग को मानवीय अधिकारों से, धन संचय से, शस्त्र से वंचित करता गया वह धर्म कहलाने की योग्यता नहीं रखता। जो धर्म अज्ञानियों को अज्ञानी, निर्धनों को निर्धन रहने की सीख देता हो, वह धर्म न होकर भयावह कैदखाना है। इसलिए डॉ अंबेडकर ने 13 अक्तूबर 1935 को येवला कांफ्रेंस में, बहुत सोच समझ कर, धर्मान्तरण की घोषणा की और कहा - ’’दुर्भाग्य से मैं हिन्दू समाज में एक अछूत के रूप में पैदा लिया। यह मेरे वश में नहीं था लेकिन हिन्दू समाज में बने रहने से इनकार करना मेरे नियंत्रण में हैं और मैं आपको आश्वासन देता हूँ कि मैं मरते समय हिन्दू नहीं रहूँगा।’’1

15 अक्तूबर 1956 को, अपनी मृत्यु से लगभग डेढ़ माह पूर्व, इस बात का ध्यान रखते हुये कि इससे भारतीय इतिहास और परम्परा को कोई नुकसान न हो उन्होंने अपने तीन लाख अस्सी हज़ार अनुयायिओं के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया।2 इससे अनेक आलोचक यह प्रश्न उठातें हैं कि जब अंबेडकर ने हिन्दू धर्म को त्यागने का संकल्प कर ही लिया था तो उन्होंने बीस साल का समय क्यों लिया। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने जान बुझ कर बुद्ध के 2500 वें जन्म दिन का इंतजार किया। जबकि बी एस मूर्ति को ऐसा लगता है कि हिन्दू धर्म में जो सबसे बेहत्तर था अंबेडकर उसे काफी पसंद करते थे।3 अंबेडकर का दावा था कि संविधान के निर्माण के दौरान उन्होंने इसका आधार विकसित किया तथा राष्ट्रीय झण्डे पर अशोक चक्र लगवाया तथा अशोक स्तम्भ के शेरों को राष्ट्रीय प्रतीक बनवाया जिससे भारतीय संस्कृति के दायरे को विस्तृत तथा समावेशी बनाया जा सके।

2. शोधपत्र का उद्देश्य

इस शोध पत्र का उद्देश्य उन बौद्धिक कारणों, सामाजिक परिस्थितिओं तथा व्यवहारिक कारणों की पड़ताल करना है जिन्होंने डॉ अंबेडकर को बौद्ध धर्म अपनाने के लिए आकृष्ट किया। यह लेख तर्कशील बौद्ध धर्म के उस नयेपन की विशेषताओं की भी पहचान करेगा जिसको स्वयं एक डॉ ने रचा।

3. शोध परिणाम 

3.1. धर्म की आवश्यकता : मानव गतिविधि का प्रेरक तत्व

डॉ अंबेडकर ने धर्म की आवश्यकता का जो तर्क बुना वह जीवन तथा समाज के आचार के लिये धर्म को आवश्यक आधारशिला तथा सामाजिक धरोहर घोषित करता है। यह कर्मकाण्डीय पाखण्ड के परे सकारात्मक मानव गतिविधि का प्रेरक तत्व है। वो मार्क्सवाद की आलोचना करते हुए कहते हैं कि इंसानी जीवन की शर्त सिर्फ रोटी नहीं है क्योंकि उसके पास एक दिमाग भी है जिसे विचार रूपी भोजन चाहिए। धर्म मनुष्य में आशा जगाता है तथा उसे क्रियाशील बनाता है।4 

3.2. धर्म की विशेषताएं : सदाचार, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व

’बुद्ध और उनके धर्म का भविष्य’ नामक एक लेख में डॉ बाबा साहेब ने मानवीय जीवन में धर्म और उसकी विशेषताओं को इस प्रकार स्पष्ट करते हैं -

1- समाज की ’स्थिरता’ और ’नियंत्रण’ के लिए नीति की आवश्यकता होती है। इनमें से किसी एक के अभाव में समाज रसातल में जा सकता है। इसलिये किसी भी समाज को धर्म की आवश्यकता होती है।

2- धर्म को अगर बने रहना हो तो उसे बुद्धि प्रामाण्यवादी होना चाहिए। विज्ञान बुद्धि प्रामाण्यवादी है।

3- केवल ’नीति की संहिता’ का अर्थ धर्म नहीं हैं। धर्म की नीति संहिता में स्वतंत्रता, समता और बन्धुता इन मूलभूत तत्वों को मान्यता प्राप्त होनी चाहिये।

4- दरिद्रता को पवित्र मानने का आग्रह किसी भी धर्म को नहीं करना चाहिए, अथवा दरिद्रता का गौरवगान भी नहीं होना चाहिए।5

3.3. बौद्ध धर्म ही क्यों? : करुणा, सदाचार और तर्क

डॉ अंबेडकर जी जैसी प्रतिभा को बौद्ध धर्म आकृष्ट क्यों कर गया इसका उत्तर उनके विवेचन में मिलता है। हिन्दू धर्म में असामाजिक और विखण्डनकारी वर्ण व्यवस्था की कल्पना, इस्लाम की लोकतंत्रघाती कट्टरता तथा ईसाई धर्म की साम्राज्यवादिता और रंगभेद की नीति का खुला समर्थन के कारण इन धर्मो ने उन्हें आकर्षित नहीं किया। समता, बन्धुता और स्वतंत्रता जैसे मूल्यों का समावेश जिस धर्म में हो वे उसकी खोज में भटक रहे थे। सिद्धार्थ नामक व्यक्ति ने जिस धर्म की बात की वह इन प्रचलित धर्मों से एकदम भिन्न था। इस धर्म में गूढ़ शक्ति का किसी प्रकार का स्थान नहीं है। ईश्वरीय कृपा, वरदान या शाप, स्वर्ग या नरक इसकी कोई गुंजाइश इस धर्म में नहीं है। सिद्धार्थ का यह धर्म हाड़ मांस के व्यक्ति द्वारा उसके ही जैसे हाड़- मांस के लोगों के लिए, उनकी ही भाषा में, उनके ही शब्दों में कहा गया है। इस धर्म में श्रद्धा के लिए कोई स्थान नहीं है। प्रश्न करो, शकाएँ उपस्थित करो, विचार करो और अगर तुम्हारे विवेक को मान्य हो तभी स्वीकार करो। सिद्धार्थ कहीं पर भी सर्वज्ञता का दावा नहीं करते। कोई आदेश, संदेश या कोई निर्णायक बात नहीं और यही इस धर्म की शक्ति है।

3.4. बौद्ध धर्म में कालगत बुराइयाँ : अंध श्रद्धा और कर्मकांड

परन्तु गौतम बुद्ध की मृत्यु के बाद बौद्ध धर्म में अनेक अंधश्रद्धायें और कर्मकांड घुस गए थे। बाद के सैकड़ों वर्षों में इसके कई पंथ उपपंथ बने ढाई हजार वर्ष की परंपरा में मुक्त बौद्ध धर्म खो सा गया था। डॉ बाबासाहेब बौद्ध धर्म को उसकी तेजस्विता के साथ प्रस्तुत करना चाह रहे थे। ’बुद्ध एंड हिज धम्म’ में उन्होंने यह कार्य पूर्ण किया। यह ग्रंथ केवल बौद्ध धर्म की महिमा को ही स्पष्ट नहीं करता उसका नया स्वरूप प्रस्तुत करता है। हिंदू धर्म की तरह बौद्ध धर्म की भी एक सीमा थी कि बाइबल, कुरान या जेंद अवेस्ता की तरह बौद्ध धर्म का कोई एक मूल ग्रंथ नहीं है। ग्रंथ के नाम पर अनेक ग्रंथ तथा  सैकड़ों भारतीय संस्करण उपलब्ध थे। कुछ को परंपरा ने बहुत महत्व दिया है कुछ में मतभेद या मीमांसा भेद है। उसके दार्शनिक सिद्धांत, संघ संबंधी नियम, उसकी शिक्षा आदि को लेकर अराजकता की स्थिति है इन सबके बीच से मार्ग निकालकर बौद्ध धर्म के मूलभूत तत्वों को प्रस्तुत करना काफी परिश्रम का काम था। बौद्ध धर्म की श्रेष्ठता को सिद्ध करने हेतु उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया। सिद्धार्थ के गौतम बुद्ध पद प्राप्त हो जाने के बाद उनके चरित्र के सभी प्रश्न, उनके सभी प्रवचन उनके संदर्भ, इन सब का गंभीर अध्ययन डॉ बाबासाहेब ने किया। यह 1935 से 1956 तक चलता रहा। बुद्ध के स्वतंत्र जीवन दर्शन की खोज में अंबेडकर जी ने अपनी बुद्धिमत्ता तथा शास्त्रीय दृष्टि को दांव पर लगा दी। व्यापक अध्ययन के बाद परंपरागत बुद्ध चरित्र की कई विसंगतियां उनके ध्यान में आ गईं।

3.5. बौद्ध धर्म का पुनर्जीवन : डॉ का उपकार

बुद्ध चरित्र और बौद्ध दर्शन की नई सीधी-सादी तर्क बुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि पर आधारित व्याख्या करना वास्तव में एक साहस का कार्य था। यह ग्रंथ वास्तव में बीसवीं शताब्दी का एक नया भाष्य था। इस भाष्य की नैतिकता को पढ़कर विद्वानों ने इसकी तुलना ’नये बाइबल’ के साथ की है’। यह भाष्य उन्होंने नव बौद्धों के लिए तैयार किया है। बौद्ध धर्म का स्वीकार सिर्फ राजनीतिक या केवल सामाजिक ही नहीं है अपितु यह एक नए जीवन दर्शन को स्वीकारने का प्रश्न है। इस कारण बौद्ध धर्म में प्रवेश एक विशिष्ट काल की घटना ना होते हुए निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, ऐसी उनकी धारणा थी। इसलिए नव बौद्धों को स्थाई रूप से मार्गदर्शन करने वाले अभिनव ग्रंथ की रचना उन्होंने की।

3.6. ’बुद्ध और उनका धम्म’ : बौद्ध धर्म का संशोधन और उद्घाटन

यह पुस्तक बौद्ध धर्म के आधुनिक छात्रों के लिए लिखी गई है जो उनके तमाम आध्यात्मिक तथा सांसारिक प्रश्नों का उत्तर देती है। बाबा साहेब ने इस पुस्तक में बौद्ध धर्म की कुछ समस्याओं के निदान के लिए चार प्रश्नों को सूचीबद्ध किया है। पहला प्रश्न है कि भगवान बुद्ध ने प्रव्रज्या क्यों ग्रहण किया? दूसरा प्रश्न है कि क्या चार आर्य सत्य भगवान बुद्ध की मूल शिक्षाओं में समाविष्ट हैं? तीसरी समस्या है कि अगर आत्मा ही नहीं है तो कर्म कैसा और पुनर्जन्म कैसा? चौथा प्रश्न यह है कि भगवान बुद्ध ने भिक्षु संघ की स्थापना किस उद्देश्य से की? डॉ अंबेडकर ने अपनी पुस्तक में परंपरागत जवाबों को दरकिनार कर इन प्रश्नों के नए तथा तर्कसंगत उत्तर ढूढ़ने का प्रयास करतें हैं तथा पाठकों से  इस पर नए सिरे से विचार की मांग करते हैं। डॉ अंबेडकर की यह पुस्तक भारतीय इतिहास तथा बौद्ध धर्म की कई गलत मान्यताओं को खारिज़ करती है। जैसे बुद्ध के पलायनवादी होने की धारणा को यह पुस्तक नकारती है। इस पुस्तक में अंबेडकर की मुख्य पुनर्व्याख्या बुद्ध के लौकिक जीवन की पुनर्स्थापना करती है। बुद्ध की परम्परागत जीवनी का युवा राजकुमार मानवीय पीड़ा को देख भावुक हो जाता है तथा सन्यासी बन जाता है जबकि अंबेडकर जल अधिकारों पर संघर्ष के दौरान बुद्ध की उस सामाजिक अंतरात्मा की शक्ति पर प्रकाश डालते हैं जो युद्ध विरोधी तर्कसंगत और शांतिपूर्ण समाधान के एवज में अपने देश निकाले को सहर्ष स्वीकार करता है।

3.7. सिद्धार्थ : एक मनुष्य दुसरे मनुष्य के लिए

अंबेडकर बौद्ध धर्म के संस्थापक सिद्धार्थ को वे एक मनुष्य के रूप में ही देखतें हैं। उसका चरित्र महामानव का चरित्र नहीं, एक मनुष्य का चरित्र है। एक ऐसे मनुष्य का जो मनुष्य मात्र को दुखों से मुक्त करना चाह रहा था। बौद्ध  धर्म  की विशेषता उसके संघ में है। इस संघ में सभी को खुला प्रवेश था। इस संघ को बुद्ध ने ’त्रिशरण’ तथा ’पंचशील’ दिया। समाज परिवर्तन के लिए बुद्ध ने भिक्षु संघ की आवश्यकता पर बल दिया। संघ स्वयंभू शासित थे। सम्पूर्ण समाज ही स्व शासित हो ऐसी बुद्ध की अपेक्षा थी।

3.8. ज्ञान मीमांसा : शब्द और ग्रन्थ नहीं तर्क और प्रत्यक्ष है प्रमाण

बुद्ध की ज्ञानमीमांसा में शब्दप्रमाण तथा ग्रंथप्रमाण को कहीं पर भी स्थान नहीं दिया गया है। प्रत्यक्ष प्रमाण और अनुमान प्रमाण पर ही बुद्ध का ज्ञानमीमांसीय तर्कशास्त्र खड़ा है। बुद्ध ने एक स्थान पर कहा है कि मेरे शब्दों को प्रमाण ना मानो। तुम्हारी बुद्धि अथवा अनुभव से जो बात जंचती हो उसे ही सत्य मानों। इस विश्व में अंतिम और अपरिवर्तनीय कुछ भी नहीं है, सतत परिवर्तन ही सत्य है। डॉ बाबासाहेब बुद्ध के इन बातों से अत्यधिक प्रभावित थे। दुनिया के और धर्म और धर्म ग्रंथ शब्दप्रमाण को महत्व देते हैं परंतु बुद्ध ऐसा कोई दावा नहीं करते। अपने उत्तराधिकारी के रूप में भी अपने धम्म की ओर इशारा करते हुये कहतें हैं कि किसी भी प्रश्न पर अगर निर्णय लेना हो तो संघ में उस पर खुली चर्चा हो ऐसा उनका आग्रह था। इस चर्चा में अगर सहमत ना हो रही हो तो मतदान से निर्णय लिया जाए। जनतंत्र में निष्ठा रखने वाले बाबा साहब को इसी कारण बौद्ध धर्म अच्छा लगा।

3.9. तत्व मीमांसा : चर्चा योग्य नहीं

जिन प्रश्नों के कारण व्यक्ति का विवेक कुंठित हो जाता है, अंधश्रद्धा का आरंभ होता है, ऐसे प्रश्नों की चर्चा को बुद्ध ने वर्जित किया जिसे तत्व मीमांसा के प्रश्न कहा जाता है। इसको व्याख्याकर्ताओं ने बुद्ध के अव्यक्तानी प्रश्नानी कहा है क्योंकि ऐसे प्रश्नों के समक्ष वह चुप हो जाया करते थे। यह प्रश्न कि मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा, आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, संसार क्या है इत्यादि। ये सभी कल्पनाएं मानव को वास्तविक समस्याओं के समाधान से भटकाती हैं अतः बुद्ध ने इनको नकारा है। जबकि इन्हीं  की सर्वाधिक चर्चा दुनिया के अन्य धर्मों में हुई है। यही वे प्रश्न है जिनके आधार पर अंधश्रद्धा और कर्मकाण्ड की शुरुआत होती है। धर्मभीरु बनते हैं, मनुष्य और मनुष्य में अंतर किया जाता है इन्हीं प्रश्नों के आधार पर ईश्वर के तथाकथित दलाल सामान्य आदमियों का शोषण करते हैं, सत्ता प्रतिष्ठान या संपत्ति की प्राप्ति कर लेते हैं। यही वे प्रश्न थे जिनका उत्तर देते देते हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ था।

3.10. रचनात्मक बुद्धिवाद : कार्यकारण तथा अष्टांगिक मार्ग

बुद्ध की रचनात्मक दृष्टि ने कार्यकारण का महान सिद्धांत दिया। मनुष्य और उसके संसार में जो भी घटित होता है वह ईश्वरीय इच्छा के अनुसार ही घटित होता है इस सिद्धांत को नकारते हुए उन्होंने यह शास्त्रीय सिद्धांत दिया। आत्मा की मुक्ति तथा मोक्ष के स्थान पर उन्होंने निर्माण का तत्व स्वीकार किया। दुखों की निवृति का अष्टांगिक मार्ग सुझाया मानव गतिविधि का प्रेरक तत्व बुद्ध के अनुसार सभी वस्तु में श्रेष्ठ, सभी बातों का केंद्र बिंदु है मन है। यह वस्तु को निर्मित करता है, मन ही वस्तु पर सत्ता चलाता है, सभी मानसिक क्रियाओं पर नियंत्रण का नेतृत्व मन करता है मन को संस्कारित करना बहुत महत्व की बात है। सभी अच्छाइयों और बुराइयों का मूल स्रोत मन है। इस कारण मन शुद्ध सच्चे धर्म का सार है, केवल मन की शुद्धि से बात पूरी नहीं होती, उसके अनुसार आचरण की आवश्यकता भी है। उपर्युक्त विशेषताओं के कारण अंबेडकर जी को बौद्ध धर्म आधुनिक मनोविज्ञान के निकट लगा था तथा परिवर्तन के प्रति प्रतिबद्धता और व्यक्ति के प्रति निष्ठा इन दो कारणों से यह अधिक वैज्ञानिक लगा।

3.11. बुद्ध : अहिंसक मार्क्सवाद

इसके अलावा ’बुद्ध और मार्क्स’ नामक अपने एक भाषण में उन्होंने बौद्ध धर्म की एक और विशेषता को स्पष्ट किया। बाबा साहेब बुद्ध और मार्क्स को एक दूसरे का शत्रु अथवा प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं देखते हैं बल्कि इन दोनों के बीच स्थित साम्यता को भी सामने लाते हैं। डॉ अंबेडकर के अनुसार इनमें हिंसा के सिवा दूसरा भेद ही नहीं है। इस कारण उन्होंने बौद्ध साम्यवाद शब्द का प्रयोग किया है। साम्यवाद से अगर हिंसा निकाल दी जाए तो बुद्ध ही शेष रह जाते हैं।6

3.12. नवयान बौद्ध धर्म : भविष्य का धर्म

बौद्ध धर्म के संबंध में उनके निष्कर्ष इस प्रकार के हैं - बुद्ध का धम्म परलोक के संबंध में नहीं है। इहलोक से ही उसका संबंध है। वह न स्वर्गवादी है, न नर्कवादी है, वह पृथ्वीवादी है। यह धम्म व्यक्तिगत मोक्ष की बात नहीं करता, सामाजिक मुक्ति का संदेश देता है। यह धम्म निरीश्वरवादी, अनात्मवादी, भौतिकवादी और बुद्धिवादी है। यह धम्म अपरिवर्तनीय नहीं है, परिवर्तनवाद का खुला समर्थक है। अपने 45 वर्ष के धर्म प्रसार कार्य में खुद बुद्ध ने अपने धर्म में, उसकी शिक्षा में, उसके आचार विचारों में, नियम उप नियमों नियमों में सतत परिवर्तन किए हैं अर्थात बौद्ध धर्म विकासशील तथा यह धर्म विचारशील है।

इन अनेक विशेषताओं के कारण विश्व के अन्य धर्मों की तुलना में बौद्ध धर्म की मौलिकता को वे स्पष्ट करते जाते हैं। इन धर्मों की तुलना में बुद्ध धम्म आधुनिक, वैज्ञानिक निष्कर्षों पर, कसौटी पर श्रेष्ठ सिद्ध होता है। आधुनिक युग की चुनौतियों को वह स्वीकार कर सकता है। बुद्धिवाद, सामाजिक सत्ता, बंधुता स्वतंत्रता, समाजवाद, जनतंत्र आदि आधुनिक मूल्यों के आलोक में इस धम्म  को सिद्ध किया जा सकता है। ऐसा अंबेडकर जी का दावा था। इस धम्म की उपर्युक्त शक्तियों से अपने अनुयाई परिचित हो जाएं इस उद्देश्य से उन्होंने इस ग्रंथ की रचना की। इसके मूल में इतनी ही दृष्टि थी कि इस धम्म की जीवंतता और आधुनिकता को विश्व को विश्व के सभी लोग जान लें और बौद्ध धम्म वैश्विक धर्म बने।5

4. निष्कर्ष : नैतिक समाज का निर्माण

इस प्रकार अंबेडकर की इस धम्म यात्रा को उनके जीवन के लगभग 40 वर्षों में खोजा जा सकता है। उनका यह सामूहिक प्रयाण मानवता पर एक महान उपकार के तौर पर गिना गया जिसने करोड़ो लोगों का जीवन बदल दिया। इस घटना को अकसर हिन्दू धर्म के विरुद्ध, जो सुधारों के परे है, विरोध के एक चरम सार्वजनिक कृत्य के रूप में पेश किया गया। अंबेडकर ने बौद्ध धर्म को पुनर्निरुपित किया, धार्मिक मताग्रहों की आलोचना की, अतिवादी सामाजिक सन्देश को उभारा ताकि भारतीय समाज में धर्म की जिस नैतिक भूमिका की वे कल्पना करते थे उसे पूरा कर सकें। दलित समाज को हिंदू धर्म से निकालकर नव बौद्ध धर्म में प्रवेश करवाते समय उनका या अटूट विश्वास था कि बौद्ध धर्म के श्रेष्ठ मूल्यों को दलित अपनाएंगे। प्रखर बुद्धिवाद, अनात्मवाद  और स्वशासन  की वृति को स्वीकार करते हुए वे संगठित होंगे संघर्ष करेंगे तथा अपनी यातनाओं से मुक्त हो जाएंगे। समाज जैसे-जैसे अधिक बुद्धिवादी होता जाएगा वैसे-वैसे बौद्ध धर्म की तरफ आकृष्ट होता जाएगा।


सन्दर्भ

 

1.     Dirks, Nicholas B. (2011). Castes of Mind: Colonialism and the making of modern India. Princeton University Press. pp. 267–274.

2.     Robert E. Buswell Jr.; Donald S. Lopez Jr. (2013). The Princeton Dictionary of Buddhism. Princeton University Press. p. 34.

3.   Shetty, V. T. R. (1980). In Ambedkar and His Conversion: a critique.  Dalit Action Committee, Karnataka. p. 79

4.    Fuchs, Martin (2001). "A religion for civil society? Ambedkar's Buddhism, the Dalit issue and the imagination of emergent possibilities". In Dalmia, Vasudha; Malinar, Angelika; Christof, Martin (eds.). Charisma and Canon: Essays on the religious history of the Indian subcontinent. Oxford University Press. pp. 250–273.

5.     Buddha and future of his religion – dr. B. R. Ambedkar     . Dr. B. R. Ambedkar's Caravan. (2015, May 29). Retrieved April 18, 2021, from https://drambedkarbooks.com/2015/05/31/buddha-and-future-of-his-religion-dr-b-r-ambedkar/  

6.   Skaria, A. (2015). Ambedkar, Marx and the Buddhist question. South Asia: Journal of South Asian Studies, 38(3), 450–465. https://doi.org/10.1080/00856401.2015.1049726


पुस्तक समीक्षा - सेपियंस


अग्नि ने हमें शक्ति दी
वार्तालाप ने हमें परस्पर सहयोग करने में मदद कीकृषि ने हमें और अधिक के लिए भूखा बनायामिथकों ने कानून और व्यवस्था कायम कीधन ने हमें एक ऐसी चीज दी जिस पर हम सचमुच् भरोसा कर सकते थेअंतर्विरोधों ने संस्कृति की रचना कीविज्ञान ने हमें घातक बनायायह साधारण वानरों से लेकर विश्व के शासकों  तक के हमारे असाधारण इतिहास का रोमांचक वर्णन है। हम बात कर रहे हैं युवाल नोआ हरारी की अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर पुस्तक सेपियंस मानव जाति का संक्षिप्त इतिहास कीजिसका हिन्दी अनुवाद मदन सोनी ने किया है। बड़ी बहसों को जन्म देने वाली यह पुस्तक अपनी उत्तेजक तथा आकर्षक भाषा से न केवल पाठकों को बाँध देती है बल्कि उसकी तमाम धारणाओं को भी ध्वस्त करती है। लेकिन यह पुस्तक अक्सर बिना स्रोत वाले दावे करती है जिससे ग्रन्थवादी इसे कल्पना कहेंगे परन्तु फिर भी इसे इतिहास की एक बेहतरीन समझ पैदा करने वाली पुस्तक कहा जाएगा क्योंकि अगर हम प्रशिक्षित इतिहासकार रामशरण शर्मा से कुछ शब्द उधार लें तो तो कह सकते हैं कि ‘कल्पना नहीं तो इतिहास नहीं’।

यह पुस्तक न केवल भिन्न विश्वास वाली दुनिया में इतिहास के बुनियादी आख्यानों पर सवाल उठाने के लिए हमें प्रोत्साहित करती हैबल्कि यह खोज करती है कि हमारी प्रजाति वर्चस्व की लड़ाई में किस तरह कामयाब हुई हमारे आहार खोजी पूर्वज नगरों और राजवंशों का निर्माण करने के लिए क्यों एकजुट हुए हमने देवताओंराष्ट्रोंऔर मानव अधिकारों में विश्वास करना कैसे शुरु किया साथ ही यह पुस्तक आने वाली सहस्त्राब्दियों में हमारी दुनिया कैसी होगी इसकी भी पड़ताल करती है। लगभग साढ़े चार सौ पृष्ठों वाली यह पुस्तक चार भागों में तथा बीस अध्यायों में बटी हुई है।

पुस्तक के प्रथम भाग में सेपियंस की क़ामयाबी के रहस्य से पर्दा उठाया गया है। इंसानऔर प्रजातियों से अलग है क्योंकि इन्सान अनंत अंतहीन कहानियां बना सकता है। इन्सान ने अपनी अनूठी तथा लचीली भाषा की वजह से दुनिया पर विजय प्राप्त की है। हरारी इसे संज्ञानात्मक क्रांति कहते हैंजिसने 70000 साल पहले इतिहास को क्रियाशील बना दिया। इस गपबाज़ी ने उस ज्ञान के वृक्ष का निर्माण किया जिसने न केवल आने वाली पीढ़ियों को अपनी इस कुशलता को हस्तांतरित किया बल्कि जीन समूह को भी बाईपास किया। इसने दुनिया के बारे में सूचना को दक्षता के साथ  प्रसारित किया जिसके परिणामस्वरूप सेपियंस ने न केवल योजना बनाना सीखा बल्कि उसे क्रियान्वित भी करने लगे।

किताब के दूसरे भाग में 12000 साल पूर्व हुई दूसरी क्रांति का विवरण हैं जिसे हम कृषि क्रांति कहते हैं। हरारी इसे इतिहास का सबसे बड़ा धोखा कहते हैं जिसमें इंसान ने गेहूं को पालतू बना लियाजी नहीं दरअसल गेहूँ ने इन्सान को पालतू बना लिया। गेहूँ ने अपने फायदे के लिए सेपियंस को नियंत्रित किया। इंसान ने चैन से घूमते हुए जीना छोड़ सारी दुनिया में गेहूँ की खेती करने लगा। चूंकि गेहूँ को कंकड़ पत्थर नहीं पसंद थे तो इंसान ने अपनी कमर तोड़ कर उन्हें खेतों से साफ किया। गेहूँ को अपनी जगहपानी और पोषक तत्वों में दूसरी वनस्पतियों से साझा करना पसंद नहीं था तो मर्द और औरतों ने तीखी धूप में निराई की। बीमारी में देखभाल की तथा कीड़ोखरगोश तथा टिड्डी से सुरक्षा प्रदान की। यहाँ तक कि गेहूं ने अपने पोषण के लिए सेपियंस को अन्य जानवरों का मल तक इकट्ठा करने को विवश किया। मनुष्य ने दयनीय अस्तित्व चुना लेकिन इससे फायदा क्या हुआगेहूँ की खेती ने क्षेत्र की प्रति इकाई को कहीं ज्यादा भोजन मुहैया कराया और इस तरह होमो सेपियंस को तीव्रतम गति से अपनी वंशवृद्धि करने में सक्षम बनाया। साथ ही इसने विलासिता का पिंजरा भी दिया। जिसकी सुरक्षा के लिए कानूनधर्मराज्य तथा समाज जैसे कल्पित वास्तविकताओं को रचा गया। इन कल्पनाओं ने उस दुश्चक्र को पैदा किया जहाँ कोई न्याय नहीं था।

पुस्तक के अगले भाग में मानव के एकीकरण की कहानी है। ईसा पूर्व पहली सहस्त्राब्दी में तीन सम्भावित वैश्विक व्यवस्थाओं का प्रादुर्भाव हुआजिसके पक्षधर पहली बार समूची दुनिया और समस्त मानव प्रजाति को नियमों की एक एकल व्यवस्था के अधीन शासित एक इकाई के रूप में कल्पित कर सके। हर कोईकम से कम सम्भावित रूप से हम‘ था। अब कोई वे‘ नहीं थे। ऐसी पहली व्यवस्था आर्थिक थी : वित्तीय व्यवस्था। दूसरी वैश्विक व्यवस्था राजनैतिक थी : साम्राज्यवादी व्यवस्था। तीसरी वैश्विक व्यवस्था धार्मिक थी : बौद्धईसाइयत और इस्लाम जैसे सार्वभौमिक धर्मों की व्यवस्था। व्यापारीविजेता और पैगम्बर वे पहले लोग थेजो हम बनाम वे‘ के युग्म परक विकासवादी विभाजन से ऊपर उठ सके और मानव-जाति की सम्भावित एकता का पूर्वानुमान कर सके। व्यापारियों के लिए पूरी दुनिया एक बाज़ार थी और सारे मनुष्य सम्भावित ग्राहक थे । उन्होंने एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था विकसित करने की कोशिश कीजो हर कहींहर किसी पर लागू हो सकती थी। विजेताओं के लिए सारी दुनिया एक एकल साम्राज्य थी और सारे मनुष्य सम्भावित प्रजा थे।पैग़म्बरों के लिए सारी दुनिया में एक ही सत्य था और सारे मनुष्य सम्भावित आस्तिक थे। उन्होंने भी एक ऐसी व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश कीजो हर कहीं हर किसी पर लागू हो सकती थी ।

पुस्तक के अंतिम भाग में पिछले 500 वर्षों के बारे में बात की गई है जब पहली बार इंसान ने अपनी अज्ञानता को स्वीकार कर उस चीज़ की शुरुआत की जो शायद इतिहास को समाप्त कर सर्वथा किसी पूरी तरह से भिन्न चीज़ की शुरुआत कर सकती हैबात हो रही है वैज्ञानिक क्रांति की। विज्ञान में अनुसंधान के द्वारा लालची इंसान ने शक्ति ग्रहण की जिसकी भनक को शीघ्र ही साम्राज्यों तथा पूंजी ने भांप कर विज्ञान के साथ गठजोड़ कर लिया। हम आज इस दौर में हैं जहाँ सिर्फ काया ही नहीं गढ़ी जाती बल्कि अंतःकरण भी गढ़ा जाता है। लेकिन हमें सचेत रहना चाहिए क्योंकि अगर हम गिलगमेश को नहीं रोक सकते तो हम डॉ फ़्रैंकेन्स्टाइन को भी नहीं रोक सकते। और सवाल यह नहीं है कि हम क्या बनना चाहते हैं बल्कि सवाल यह है कि हम क्या आकांक्षा करना चाहते है। अगर आप इन सवालों से नहीं डरते तो शायद आपने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया है।

Popular and Aristocratic Culture in India

Introduction The cultural history of the Indian subcontinent reveals complex layers of social life, consumption, aesthetics, and power. In ...