बुधवार, 24 अप्रैल 2024

हिन्दी साहित्य का इतिहास

 

भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना से पूर्व ही हिन्दी भाषा एवं साहित्य का विकास आरम्भ हो चुका था।

A.  आदि काल

इस काल के कवि आश्रयदाता राजाओं और उनके पूर्वजों के पराक्रम, रूप एवं दान की प्रशंसा करते थे। साथ ही इन पर धार्मिक मतों का भी प्रभाव था।

1.      सिद्ध साहित्य

बौद्ध धर्म कालांतर में तंत्र-मंत्र की साधना में बदल गया था। वज्र यान इसी प्रकार की साधना थी। सिद्धों का संबंध इसी वज्र यान से था। इनकी संख्या 84 बताई जाती है। प्रथम सिद्ध सरहपा 8वीं शताब्दी के थे। इन्होंने वैदिक वर्णाश्रम धर्म पर तीव्र प्रहार किया था।

2.      नाथ साहित्य

नाथ शब्द का अर्थ है जो मुक्ति प्रदान करें । इसमें बौद्ध और शैव संप्रदायों के विचारों का मेल था। इस संप्रदाय में नौ नाथों का जिक्र है। इन्होंने सिद्धों के प्रवृति मार्ग के विरुद्ध निवृति मार्ग की स्थापना की। गोरखनाथ कहते थे

"नौ लख पातर आगे नाचें, पीछे सहज अखाड़ा।

ऐसे मन ले जोगी खेलें, तब अंतरि बसे भंडारा।।"

3.      जैन कवि

जैन शब्द जिन से बना है, जिसका अर्थ है विजय पाने वाला, और यह विजय सांसारिक आकर्षणों पर हैं। जैनों को राजाओं और धनी व्यापारियों का संरक्षण प्राप्त था। प्रमुख जैन कवियों में प्रमुख नाम हेमचंद्र का है जो 11 वीं शताब्दी के थे तथा इनके दोहे प्राकृत व्याकरण में संकलित हैं। स्वयंभू की प्रमुख रचना पऊम चरियम है। इसमें राम के चरित्र का वर्णन है। पुष्पदंत जो पहले शैव थे अब जैन हो गए लेकिन इनके वर्ण्य विषय राम ही थे।

4.      रासो या वीरगाथा साहित्य

 रासो काव्य धारा में तीन तरह के ग्रंथ लिखे गए - वीरता प्रधान, शृंगार प्रधान और उपदेश प्रधान।

वीरता प्रधान रचना का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण चंद बरदाई का पृथ्वी राज रासो है। इसमें नायिका का नख सिख वर्णन, सेना का प्रयाण, युद्ध, षडऋतुओं आदि का सुंदर वर्णन है। जगनिक का आल्ह खंड भी महत्वपूर्ण रचना है।

जबकि शृंगार प्रधान रचनाओं में नरपति नाल्ह का बिसलदेव रासो है। इसमें बारहमासा का सबसे पहले वर्णन मिलता है। मुल्ला दाउद की चंदायन भी प्रसिद्ध रचना है।

5.      अन्य कवि

अमीर खुसरो

खुसरो खड़ी बोली हिंदी तथा उर्दू के पहले कवि माने जाते हैं। इनका व्यक्तित्व बहु आयामी था। इनके प्रमुख ग्रंथों में पहेलियां, मुकरियां, दो सुखने, ग़ज़ल, खालिक बारी तथा ढकोसला प्रसिद्ध है। खुसरो की रचनाओं का भाव और कला पक्ष दोनों ही अद्भुत है।

भाव पक्ष

काहे को बियाहे परदेस, सुन बाबुल मोर,

भैया को दिहे बाबुल, महला दो महला

हमको दीहे परदेश, सुन बाबुल मोर

मैं तो हूं बाबुल तोरे खूंटे की गैया,

हांकी हुंकी जाऊं परदेश

https://www.youtube.com/watch?v=YxOwoO40xJw

कला पक्ष

फारसी और ब्रजभाषा का प्रयोग

ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ

कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ

https://www.youtube.com/watch?v=X0bCsxJk3P8

विद्यापति

विद्यापति आदि काल के मैथिल कवि हैं। इनमे भक्ति और शृंगार दोनों की प्रधानता है। पदावली इनकी प्रमुख रचना है। इसने राधा कृष्ण के प्रेम का वर्णन है।

सखि हे, कि पुछसि अनुभव मोए।

सेह पिरिति अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए॥

जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल॥                                                

B.     भक्ति काल

भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के पश्चात् इस्लाम धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा। इसके अनेक कारणों में एक प्रमुख कारण हिन्दू समाज में प्रचलित कुरीतियाँ थीं। अतः हिन्दू धर्म सुधारकों ने इस्लाम धर्म के प्रभाव को रोकने तथा हिन्दू धर्म में व्याप्त कर्मकाण्डों एवं वाह्य आडम्बरों को समाप्त करने के लिए भक्ति मार्ग का प्रचार आरम्भ किया जिससे भक्ति आन्दोलन का उदय हुआ।

इस काल के संतों ने भक्ति के निर्गुण तथा सगुण दो रूपों को अपनाया।

1.      निर्गुण शाखा

इस शाखा के संतों ने ज्ञान एवं प्रेम का आश्रय लिया जिससे निर्गुण शाखा के अन्तर्गत ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी उपाशाखाओं की उत्पत्ति हुई।

(क)           ज्ञानाश्रयी

निर्गुण शाखा के अन्तर्गत ज्ञानाश्रयी संतों में कबीर, नानक, रैदास, दादू दयाल, मलूकदास आदि के नाम प्रमुख है। कबीर का जन्म 1398 ई० में काशी में हुआ था। इनका पालन-पोषण अली अथवा नीरू नाम के जुलाहे ने किया था। कबीर पढ़े लिखे नहीं थे फिर भी उन्होंने हिन्दुओं एवं मुसलमानों को बहुमूल्य शिक्षा प्रदान की है। कबीर ने स्वामी रामानन्द का शिष्य होना स्वीकार किया है परन्तु एक स्थान पर वह सुफी संत शेख तकी से भी दीक्षा लेने का उल्लेख करते हैं। उनकी वाणी का संग्रह बीजक के नाम से प्रसिद्ध है जिसमें रमैनी, सबद एवं साखी तीन भाग किए गये हैं।

रैदास कबीर के समकालीन थे। यह जाति के चर्मकार थे। इनका कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। केवल कुछ पद ही 'बानी' के नाम से 'संतबानी सीरीज' में मिलते हैं। 'गुरु ग्रंथ साहब' में इनके चालीस पद संग्रहीत हैं। इनके पदों की भाषा सहज एवं सरल है।

दादू दयाल का जन्म 1544 ई० में अहमदाबाद में हुआ था। यह कबीरपंथी थे जिसके कारण इनकी 'बानी' में कई स्थानों पर कबीर का नाम आया है। इनकी 'बानी' अधिकतर कबीर की साखी से मिलते जुलते दोहों में है। इन्होंने पंजाबी एवं गुजराती में पद लिखे हैं। इनकी भाषा मिली जुली पश्चिमी हिन्दी है जिसमें कहीं-कहीं अरबी, फारसी के शब्दों का प्रयोग मिलता है।

मलूकदास का जन्म 1574 ई० में इलाहाबाद के कड़ा नामक स्थान में हुआ था। इनकी भाषा में अरबी एवं फारसी के शब्दों का प्रयोग मिलता है। इनके कुछ पद खड़ी बोली में भी हैं। इनकी 'रत्लखान' एवं 'ज्ञान बोध' दो प्रसिद्ध रचनायें हैं।

(ख)          प्रेमाश्रयी

निर्गुण शाखा के प्रेमाश्रयी कवियों में मुख्यतः सूफी थे।

कुतुबन चिश्तिया सम्प्रदाय के सूफी शेख बुरहान के शिष्य थे। इन्होंनें 'मृगावती' नामक एक प्रसिद्ध प्रेम-काव्य की रचना की। इसमें चन्द्रनगर के राजा गणपति देव के राजकुमार तथा कंचनपुर के राजा रूपमुरारी की सुपुत्री मृगावती और प्रेमकथा का सुन्दर वर्णन है। इसकी भाषा अवधी है।

मंझन की रचना का शीर्षक 'मधुमालती' है जो अवधी भाषा में है। इसमें कनेसर के राजकुमार मनोहर तथा महारस की राजकुमारी मधुमालती के प्रेम द्वारा ईश्वरीय प्रेम को दिखाया गया है। इसमें प्रति पाँच चौपाई के पश्चात् एक दोहा लिखा गया है।

जायसी का पूरा नाम मलिक मोहम्मद जायसी था जो उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में स्थित जायस के रहने वाले थे। इन्होंने तीन ग्रंथों की रचनायें कीं- 'प‌द्मावत', 'अखरावट' एवं 'आखिरी कन्गम'। इनके इन तीन ग्रन्थों में 'प‌द्मावत्' सुप्रसिद्ध है। जायसी ने प्रेमकाव्य के द्वारा सम्पूर्ण सूफीवादी दर्शन को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इनकी भाषा अवधी है। हिन्दी साहित्य में 'प‌द्मावत्' की गणना उच्च कोटि की रचनाओं में की जाती है।

2.      सगुण शाखा-

इस शाखा के कवियों ने अपने-अपने इष्टदेवों की भाँति में रचनायें कीं। इनमें कुछ ने राम तथा कुछ ने कृष्ण को अपना इष्टदेव स्वीकार किया जिससे राम-भक्ति उपशाखा एवं कृष्ण-भक्ति उपशाखा का उदय हुआ।

(क)           राम-भक्ति

राम भक्ति का प्रचार स्वामी रामानन्द ने किया परन्तु रामभक्त कवियों में गोस्वामी तुलसीदास एवं आचार्य केशवदास के नाम सर्वप्रमुख हैं। तुलसीदास का जन्म 1532 ई० में 'बाँदा के राजापुर गाँव में हुआ था। इनके सगुण राम राजा दशरथ के पुत्र थे। इन्होंने राम की भक्ति पर विशेष बल दिया तथा संसार को 'सियाराममय' कहा है। इन्होंने राम को ब्रह्म तथा सीता को प्रकृति स्वरूप स्वीकार किया। इनकी रचनाओं में 'रामलला नहछू', 'जानकी मंगल', 'वैराग्य संदीपनी', 'रामचरित मानस', 'सतसई', 'बरवै रामायण', 'विनय पत्रिका', 'गीतावली', बहुत प्रसिद्ध हैं। इनकी भाषा मुख्यतः अवधी है ।

आचार्य केशवदास गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन थे। इनका जन्म 1555 ई० में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनकी सुप्रसिद्ध रचना 'रामचन्द्रिका' है जो कि ब्रजभाषा में है।

(ख)          कृष्ण-भक्ति

सगुण शाखा के कृष्ण भक्तों में वल्लभाचार्य का स्थान सर्वप्रमुख है जिनकी शिष्य परम्परा में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। सूरदास के अतिरिक्त कृष्ण भक्ति उपशाखा के कवियों में मीराबाई, रसखान, नन्ददास, कृष्णदास, परमानन्द दास, के नाम उल्लेखनीय है।

सूरदास का जन्म 1483 ई० में रुक्नता नामक ग्राम में हुआ था। इन्होंने 'सूरसारावली', 'साहित्य लाहरी' और 'सूरसागर' आदि ग्रन्थोंकी रचनायें की। इनकी काव्य-भाषा ब्रज है। कृष्ण चरित का गान करने वाले कवियों में सूरदास का स्थान सर्वश्रेष्ठ है।

मीरा का जन्म 1499 ई० में मेड़ता के कुदकी नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता रत्न सिंह राठौर थे। इनका विवाह उदयपुर के युवराज भोजराज के साथ हुआ था परन्तु विवाह के कुछ समय पश्चात् यह विधवा हो गयीं। मीरा के अधिकतर पदों की भाषा राजस्थानी है परन्तु कुछ पद साहित्यिक ब्रज भाषा में है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार मीरा द्वारा रचित चार ग्रंथ कहे जाते हैं- 'नरसी का मायरा', 'गीत गोविन्द टीका', 'राग गोविन्द' एवं 'सोरठ के पद' ।

रसखान का सम्बन्ध दिल्ली के अफगान राजवंश से था। ऐसा कहा जाता है कि यह कृष्ण के चित्र को देखकर उनके भक्त हो गये इनकी 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रसखान' प्रसिद्ध रचनायें हैं। इनकी भाषा विशुद्ध ब्रज है जिसमें अरबी एवं फारसी के शब्दों का प्रयोग भी मिलता है।

                                  रीतिकालीन साहित्य

रीति काल का उदय हिन्दी साहित्य में 1643 ई० से माना जाता है जिसे कुछ विद्वानों ने 'शृंगार काल' की संज्ञा दी है ।

शाहजहाँ के दरबार में सुन्दर दास, चिन्तामणि और कवीन्द्र आचार्य प्रमुख कवि थे ।

सुन्दर दास जाति के ब्राह्मण थे और ग्वालियर के रहने वाले थे। इन्हें शाहजहाँ ने 'महा कविराय' की उपाधि से विभूषित किया था । इन्होंने सुन्दर  शृंगार', 'सिंहासन बत्तीसी' और 'बारहमासा' नामक ग्रन्थ लिखे ।

चिंतामणि कानपुर के रहने वाले थे । वे अपने समय के उच्चकोटि के कवि थे । शाहजहाँ ने इन्हें प्रश्रय दिया। इन्होंने 'छन्द विचार', 'काव्य विवेक', 'कविकुल  कल्पतरु' और 'काव्य प्रकाश' नामक ग्रन्थ लिखे ।

कवीन्द्र आचार्य बनारस के रहने वाले थे । उन्होंने 'कवीन्द्र कल्पलता' शाहजहाँ और उसके पुत्रों की प्रशस्ति में लिखा ।

जोधपुर के राजा जसवन्त सिंह की रुचि हिन्दी भाषा में थी । उन्होंने ब्रज- भाषा में 'भाषा भूषण' नामक ग्रन्थ लिखा ।'

बिहारी लाल का जन्म ग्वालियर के समीप गोविन्दपुर में हुआ था । इन्हें मिर्जा राजा जयसिंह का संरक्षण प्राप्त था, जिन्होंने इनको राजकवि की उपाधि से विभूषित किया था । अपने संरक्षक को विलास में डूबा हुआ देख कर निम्नलिखित दोहा लिख कर उनके पास भेजा :-

नहि पराग नहि मधुर मधु नहि विकास यहिकाल ।

अली कली ही सो बँध्यो, आगे कौन हवाल ।।

बिहारी ने 'सतसई' की रचना की है, जिसमें दोहे और छन्दों का प्रयोग किया गया है। बिहारी ने शृंगार का सुन्दर वर्णन किया है और संयोग तथा वियोग की सभी अवस्थाओं को कुशलता से दर्शाने का प्रयास किया है।

भूषण (1613-1715) को चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्र ने 'कवि भूषण' की उपाधि से विभूषित किया। तभी से ये भूषण के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके तीन प्रख्यात ग्रन्थ हैं- 'शिवराज भूषण', 'शिवा बावनी' और 'छत्रसाल दशक' । इन पुस्तकों पर रीतिकाल का प्रभाव है।

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

वहाबी आन्दोलन

 

तात्पर्य

जब इस्लामी जनता मूल-धर्म से अलग हटकर रूढ़ियों और अन्धविश्वासों में जकड़ी जा रही थी, ठीक उसी समय, इस्लाम का प्राचीन तेज बाहर निकला और इस्लाम के जन्म-स्थान, अरब के रेगिस्तान में, एक धार्मिक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ जिससे रूढ़ियों और कुरीतियों को झाड़ गिराने में इस्लाम को बहुत बड़ी सहायता मिली। इतिहास में यह आन्दोलन वहाबी आन्दोलन के नाम से विख्यात है।

कब और किसने

वहाबी आन्दोलन के प्रवर्तक मुहम्मद इब्न-अब्दुल वहाब थे जिनका जन्म सन् 1700 ई. के करीब अरब-देश के नज्द प्रान्त में हुआ था।

कहाँ

स्टोडार्ड ने लिखा है कि इस्लाम के इस विश्वव्यापी पतन के काल में भी, नज्द ही ऐसा प्रान्त था जहाँ लोग पूर्ण रूप से पतित नहीं हुए थे तथा जहाँ अब भी धर्म का दीपक झिलमिला रहा था।

कैसे

1.       मौलिक इस्लाम पर जोर

अब्दुल वहाब बचपन से ही विचारशील थे। उन्होंने बचपन में ही हज की यात्रा की थी तथा मदीने में काफी साल रहकर उन्होंने इस्लाम के मौलिक साहित्य का अध्ययन भी किया था। इस्लाम का गम्भीर अध्ययन करते-करते उनका ध्यान तत्कालीन इस्लाम के पतन पर गया और रूढ़ियों, अन्धविश्वासों एवं कुरीतियों के विरुद्ध उनके भीतर सात्विक क्रोध के भाव भर गए।

2.       भोग विलास की निंदा

जीवन के भीतरी और बाहरी विलासों की उन्होंने कड़े शब्दों में निन्दा प्रारम्भ की। उन्होंने संगीत, रेशम, सोना, चाँदी और हीरे को भी विलासिता की वस्तु कह कर निंदा की थीं।

3.       बुतपरस्ती के खिलाफ निंदा

पीरों, औलियाओं तथा अन्य मानवों की पूजा एवं उनकी कब्रों की आराधना के खिलाफ उन्होंने युद्ध-घोषणा कर दी। फकीरों एवं साधुओं की पूजा को वे घृणित पाप बताने लगे। बुजुर्गों की क़ब्रों की कौन कहे, हज़रत मुहम्मद की क़ब्र पर जाकर पूजा करने को भी उन्होंने शिर्क करार दिया।

4.       कयास की निंदा

तसव्वुफ और सूफी-मत की आलोचना वे इसलिए करने लगे कि सूफी इस्लाम के नियमों का उल्लंघन करते थे। उलमाओं के द्वारा कुरान की की जानेवाली व्याख्याओं को उन्होंने अमान्य बताया और लोगों से यह कहा कि कुरान का अर्थ तुम्हें सुन्नत के प्रसंग में समझना चाहिए और पंडितों के मतवाद के फेरे में नहीं पड़ना चाहिए। कुरान का, कल्पना से जो अर्थ लगाया जाता था, उसे उन्होंने बिलकुल रोक दिया एवं परम्परा से जो अर्थ मान्य समझा जाता था, उसे ही उन्होंने प्रामाणिक ठहराया।

5.       नशा खोरी की निंदा

टर्की के सुलतान मुराद ने तम्बाकू पीने पर रोक लगा रखी थी। एक दूसरे सुलतान ने कॉफी पीने की मनाही कर रखी थी। ये धार्मिक नहीं, राजकीय फरमान थे। अब्दुल वहाब ने रोकों की जो धार्मिक सूची तैयार की, उसमें तम्बाकू और कॉफी ही नहीं, बल्कि संगीत, रेशम, सोना, चाँदी और हीरे भी आ गए क्योंकि ये सामग्रियाँ भी विलासिता की थीं।

6.       सूदखोरी की आलोचना

सूदखोरी इस्लाम में पाप समझी जाती थी, किन्तु, इस पाप से फायदा उठानेवाले लोगों की कमी नहीं थी। अब्दुल वहाब इस पाप पर अग्नि के वेग से टूटे और, इस प्रकार, धार्मिक जनता के साथ-साथ वे निर्धन मुसलमानों के भी श्रद्धा-भाजन हो उठे। सारी गरीब जनता अब्दुल वहाब की पूजा करने लगी।

इस प्रकार अब्दुल वहाब के आन्दोलन का उद्‌देश्य इस्लाम के उस रूप को वापस लाना था, जिसकी रचना हज़रत मुहम्मद ने की थी और जिसका विकास आरम्भ के चार खलीफों ने किया था। आरम्भिक इस्लाम ईश्वर के सिवा और किसी की पूजा नहीं करता था। उसमें वैराग्य-वृत्ति का अभाव था। उसमें सामाजिक कुरीतियाँ नहीं थीं, न उसमें मुसलमान-मुसलमान में कोई भेद था। । यह अतीत की ओर चलने का संकेत था। यह इस्लाम को घसीटकर फिर से सातवीं सदी में ले जाने का आग्रह था।

राजनीतिक रुझान

शेख अहमद सरहिन्द, इब्ने तीमिया, औरंगजेब, वहाब, हाली और इक़बाल ने इस्लाम के लिए जो कुछ किया, वह लगभग एक ही प्रकार का कार्य था। जब से नज्द के सऊद-खानदान के सरदार मुहम्मद अब्दुल वहाब के शिष्य हुए, वहाबियों का जोर बहुत अधिक बढ़ गया और वे धर्म के साथ राजनैतिक प्रभुता का गठबन्धन करके सारे संसार के मुसलमानों को एक छत्र के नीचे लाने का स्वप्न देखने लगे।

अब्दुल वहाब की मृत्यु (सन् 1787 ई.) के बाद, सऊद वहाबी-सम्प्रदाय के नेता हुए। प्रतिष्ठा में उनका राज्य अबूबक्र और हजरत उमर की खिलाफत की याद दिलाने लगा, क्योंकि मुसलमान उन्हें अपना धार्मिक गुरु भी मानते थे तथा राजनैतिक नेता भी। सऊद का देहान्त सन् 1814 ई. में हुआ। किन्तु, तब तक वहाब-सम्प्रदाय शक्ति और धार्मिक प्रतिष्ठा में इतना उन्नत हो चुका था कि लोग उसे प्राचीन खिलाफत का सहज उत्तराधिकारी मानने लगे थे।

टर्की के सुलतान से बैर तथा पराजय

चूँकि वहाबी लोग सऊद-राज्य को खिलाफत का उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, इसलिए, टर्की के सुलतान से उनका विरोध हो गया, क्योंकि खिलाफत का ओहदा अभी टर्की के ही सुलतान के पास था। टर्की का सुलतान जानता था कि वहाबियों में जो धार्मिक उन्माद है, उसके सामने कोई भी मुस्लिम देश घुटने टेक सकता है। अतएव, सुलतान ने अल्बानिया के मुहम्मद अली से सन्धि की और यूरोपीय बन्दूकों के सहारे उसने वहाबियों को मिट्‌टी चूमने को लाचार कर दिया।

आध्यात्मिक उत्तरजीविता

किन्तु, यह वहाबियों की सामरिक पराजय मात्र थी। आध्यात्मिक दृष्टि से वे तब भी मुसलमानों के धार्मिक नेता बने रहे। इस्लाम को प्राचीन गरिमा पर फिर से प्रतिष्ठित करने का स्वप्न वहाबी लोग, हमेशा, मुसलमानों में फैलाते रहे और मक्का में हज करने को जो भी मुसलमान जाते, उनके जरिए वहाबियों का यह सन्देश आसानी से विश्व के कोने-कोने में पहुँचता रहा।

                                         भारत में वहाबी आन्दोलन

भारतीय इस्लाम में कुरीतियाँ

मक्का जानेवाले हाजियों के द्वारा ही इस आन्दोलन का सन्देश अरब से भारत पहुँचा। अरब, सीरिया, मिस्र और ईरान में इस्लाम जिस दुरवस्था में जा फँसा था, भारत में उसकी उससे अच्छी अवस्था नहीं थी। हिन्दु-समाज से जो लोग निकलकर इस्लाम में दीक्षित हुए थे, वे अपने साथ हिन्दुओं की बहुत-सी तथाकथित कुरीतियाँ भी ले गए थे। हिन्दुओं का सगुन-विचार, सधवा स्त्रियों का सिन्दूर तथा नथ और शंख की चूड़ी पहनना एवं दहेज और श्राद्ध, ये सारे आचार, हिन्दुओं के समान, मुसलमानों में भी प्रचलित हो गए थे ।

अरब से प्रेरणा

अब अरब के वहाबी आन्दोलन से प्रेरणा लेकर भारत के उलमा भी इस्लाम को उन कुरीतियों से मुक्त कराने के काम में लग गए। यद्यपि, इस बात का उन्हें तनिक भी ज्ञान नहीं था कि सुधारों के जरिए वे मुसलमानों को हिन्दू-समाज से अलग कर रहे हैं।

फ़रायज़ी

सन् 1804 ई. के लगभग हाजी शरीयतुल्लाह ने बहादुरपुर (जिला फरीदपुर, बंगाल) में किसान-आन्दोलन का आरम्भ किया। उनके अनुयायी फ़रायज़ी कहलाते थे। इन लोगों ने इस्लाम पर पड़े हुए हिन्दू-प्रभावों को गर्हित बतलाया और जनता से कहा कि इन प्रभावों से निकलकर उस मार्ग पर आओ, जो शुद्ध कुरान का मार्ग है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत भर अब मुसलमानों का राज्य नहीं है, अतएव, यह देश दारुल-हरब (शत्रु-देश) हो गया है। इसलिए, मुसलमानों को चाहिए कि वे इस देश में जुमे की नमाज़ पढ़ना छोड़ दें। जो लोग इस उपदेश को मानने पर आमादा हुए, वे बेजुमा कहलाने लगे। शरीयतुल्लाह की मृत्यु के बाद उनके बेटे दुधू मियाँ ने उनके उपदेश को जोर-शोर से फैलाया तथा दुधू मियाँ के समय में पूर्वी बंगाल में बेजुमा सम्प्रदाय की संख्या काफी बड़ी हो गई।

रायबरेली के सैयद अहमद

भारत में वहाबी-आन्दोलन के सबसे प्रभावशाली नेता रायबरेली के सैयद अहमद हुए। सन् 1822 ई. में उन्होंने मक्का की तीर्थ-यात्रा की और वहीं वे वहाबी आन्दोलन के मूल-प्रवर्तकों के सम्पर्क में आए। वहीं उन्होंने यह प्रभाव भी ग्रहण किया कि विलासिता और आराम-तलबी इस्लाम की शिक्षा के विरुद्ध है एवं यूरोपीय जातियाँ इस्लाम से शत्रुता रखती हैं। सैयद अहमद शीघ्र भड़क उठने वाले स्वभाव के थे और उन्हें 'हाल' या आवेश आया करता था जिसमें उन्हें यह दैवी संदेश सुनाई पड़ता था कि तुम धर्म की सेवा के लिए अपनी जान कुरबान कर दो।

1.       इस्लाम के वास्तविक रूप पर जोर

सैयद अहमद ने भारत में भी सारे देश की यात्रा की और अपने धर्म-बन्धुओं को बताया कि उनका धर्म कितना रूढ़िपूर्ण हो गया है तथा कैसे वे रूढ़ियों को छोड़कर धर्म के वास्तविक मार्ग पर आ सकते हैं। कुरान और हदीस में जिनका उल्लेख नहीं है, उन रीति-रस्मों, आचारों और विश्वासों को उन्होंने इस्लाम-विरोधी माना एवं कुरान और हदीस की नई व्याख्याओं को भी उन्होंने गलत कहा।

2.       भारत दारुल हर्ब

सैयद अहमद ने भी ऐलान किया था कि भारत पर मुसलमानों का राज्य नहीं रहने के कारण यह देश दारुल-हरब हो गया है और यहाँ के मुसलमानों को भी जिहाद का धर्म-सिद्ध अधिकार है। किन्तु, धर्म के भीतर से यह राजनीति झाँक रही थी, इसलिए, वहाबियों की पहले रणजीत सिंह फिर अंग्रेजों से ठन गई और अंग्रेज उनका दमन करने लगे, यहाँ तक कि थोड़े ही दिनों में भारत का वहाबी-आन्दोलन बिलकुल ठंडा पड़ गया।

3.       तरीका- इ-मुहम्मदिया पर जोर

तरीका- इ-मुहम्मदिया को फिर से स्थापित कर वह पैगम्बर मोहम्मद के चरणचिह्नों पर चलना चाहते थे। मुसलिम समाज को ऊपर उठाने के लिए उनके तीन सूत्र थे-इलहामी किताब कुरान शरीफ को धर्मराज्य के लिए सबसे ऊपर रखना, मजहब में कौल और अमल से अकीदा रखना और पवित्र जेहाद। उन्होंने सबसे अधिक महत्व कर्म या अमल को दिया। मजहब के 5 स्तंभों - नमाज, अपने गुनाहों का एतराफ, खैरात, रोजा और हज, में वह अंतिम तरीके को सबसे अच्छा मानते थे।

4.       शिर्क से बचाव

यानी एक अल्लाह के अलावा किसी को न मानो, न किसी को अल्लाह के समकक्ष या उनकी शक्तिवाला समझो। वह कहते थे कि सच्चे मुसलमान को यह न मानना चाहिए कि फरिश्ते, जिन, पीर, मुर्शिद, पैगम्बर और संत, अल्ला से इंसान को मिला सकते हैं या उनकी इच्छा पूरी कर सकते हैं। किसी भी मुसलमान को उनसे दुआ नहीं मांगनी चाहिए या उनसे डरना नहीं चाहिए, क्योंकि वे भी उतने ही असहाय हैं जितने कि दूसरे।

5.       बिदत की आलोचना

सब लोग 'बिदत' यानी नई बातें छोड़ दें और 'सुन्नत' यानी हजरत द्वारा बताए हुए नियमों का हर बात में पालन करें, चाहे वह बात बड़ी हो या छोटी। सैयद अहमद के सरल जीवन, उनके जोश और ईमानदारी ने लोगों पर बड़ा असर डाला। उनके बहुत से अनुयायी हो गए और उन्होंने उनका हुक्म मानने की प्रतिज्ञा की।

6.       जेहाद

जेहाद शुरू करने से पहले उन्होंने मक्का की यात्रा करने की सोची। भारत में लौटने के बाद ही उन्होंने अपने जेहादी आंदोलन का संगठन शुरू किया। उन्होंने भारतीय इतिहास के एक सबसे बड़े पुनरुत्थान आंदोलन का प्रवर्तन किया जिससे 50 सालों तक ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद रहा।'

जेहाद की तैयारी में तीन बातें खास थीं- (1) योद्धाओं की ऐसी टोली तैयार करना जो संख्या और हथियार दोनों दृष्टि से विरोधियों का मुकाबला कर सके, (2) उपयुक्त नेता या सिपहसालार का चुनाव तथा (3) ऐसा इलाका चुनना जिसमें मुसलिम शासन हो, जहां से जेहाद का संचालन सुरक्षित ढंग से किया जाए।

पहली दो शर्तें तो इस प्रकार पूरी हो गईं कि सैकड़ों भारतीय मुसलमान जेहादियों की टुकड़ी में भर्ती किए गए और सैयद अहमद इनके इमाम चुने गए। पर तीसरी बात, सुरक्षित अड्डा भारत की सीमा के अंदर नहीं मिल सका। इसके लिए उत्तर- पश्चिमी सरहद का इलाका चुना गया। सरहदी कबीलों में धर्मांधता का जोर था, जिसका मुल्ला लोग अच्छा उपयोग कर सकते थे। यह भी मालूम था कि इस इलाके में अरब के अब्दुल वहाब का वहरवी आंदोलन कुछ हद तक फैल चुका था।

7.       हिजरत

पहला कदम यह था कि दारुल अर्ब 'भारत' से इन दीनदार लोगों की हिजरत दारुल इस्लाम, सरहदी इलाके में कराई जाए। पांच-छः सौ पुरुष, कुछ स्त्रियों और बच्चों तथा 5,000 रुपये की एक थैली के साथ वह अपनी ऐतिहासिक हिजरत पर चले। यह दल बोलान दरें के जरिए क्वेटा पहुंचा, क्वेटा से कंदहार, गजनी और काबुल गया और अंततोगत्वा 20 नवंबर, 1826 को पेशावर पहुंचा। लगभग 3,000 मील की इस यात्रा में 10 महीने लगे।

यह बहुत ही आश्चर्यजनक तथा साहसिक कार्य था पर इससे भी आश्चर्यजनक बात यह थी कि ब्रिटिश सरकार, जो अवश्य ही सैयद अहमद की यात्राओं और उद्देश्यों से परिचित होगी, इन लोगों की तरफ से आंखें मूंदे रही और यह छोटी-सी सेना उन्हीं के राज में निर्बाध प्रचार और यात्रा करती रही। क्या अंग्रेजी सरकार ने इनको इसलिए नहीं रोका कि इस जेहाद का लक्ष्य महाराजा रणजीत सिंह का राज्य था, न कि ब्रिटिश भारत । सैयद अहमद का आंदोलन विफल हुआ, पर यह अपने पीछे एक सुदूरगामी परिणामों की लीक छोड़ गया। इसने भारतीय समाज की पृथकतावादी प्रवृत्तियों को उत्तेजना दी।

सैयद अहमद ने इस बात पर जोर दिया कि अच्छी हों या बुरी, महत्वपूर्ण हों या तुच्छ भारत में हिंदुओं के साथ रहने के कारण मुसलमानों ने जो रिवाज और आदतें प्राप्त की (बिदत-इ-हसना और विदत-इ-सू) उनको छोड़ देना है और हजरत मुहम्मद के समय की खालिस अरबी रूढ़ियों को लौट जाना है।

इससे दोनों संप्रदायों में खाई बढ़ने की ही संभावना थी। इस आंदोलन से एक ऐसी विचारधारा चल निकली जिससे पृथकता और कूपमंडूकता की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिला।

इस आंदोलन से मुसलमानों में पुनरुज्जीवनवादी या पुराने जमाने को फिर से लाने के प्रचार को उत्तेजना मिली। इस परिवर्तन का नतीजा यह हुआ कि राजनीति में धार्मिक कठमुल्लापन का प्रभाव प्रकट होने लगा। फिर भी सैयद अहमद के आंदोलन की स्मृति ने मुसलमानों में स्वतंत्रता की इच्छा को जीवित रखा। बाद में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जितने भी संग्राम हुए, उनमें, उदाहरणस्वरूप 1857 के विद्रोह में मौलवियों ने शक्तिशाली सहायता दी।

Popular and Aristocratic Culture in India

Introduction The cultural history of the Indian subcontinent reveals complex layers of social life, consumption, aesthetics, and power. In ...