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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

शेरशाह का शासन प्रबन्ध

मध्यकालीन भारत के इतिहास में शेरशाह का शासनकाल उसके उत्त्कृष्ट शासन प्रबन्ध के लिये प्रसिद्ध है। शेरशाह पहला शासक था जिसने धार्मिक आधार पर अपनी प्रजा में भेदभाव की नीति को त्याग दिया और उन्हें समान रूप से सुख तथा शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर दिया। उसका प्रशासन कुछ सिद्धांतों पर आधारित था जैसे —प्रजा को अत्याचारों से बचाना, शान्ति-व्यवस्था को स्थापित करना, राज्य की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि करना, संचार-साधनों के विकास के द्वारा साम्राज्य को सुसंगठित करना तथा व्यापार को प्रोत्साहित करना तथा न्याय को सर्वोच्च स्थान देना। इन सिद्धान्तों के द्वारा उसने कल्याणकारी राज्य की स्थापना का प्रयास किया।

केन्द्रीय प्रशासन

प्रशासन का प्रमुख शेरशाह था और उसकी सत्ता निरंकुश थी लेकिन उसने अफगान अमीरों की निष्ठा तथा सेवाओं को प्राप्त करने के लिये अफगान परम्पराओं का भी ध्यान रखा। प्रशासन की सारी शक्तियाँ उसके हाथों में केन्द्रित थीं। यद्यपि उसके केन्द्रीय प्रशासन में उसी प्रकार चार मन्त्री थे जिस प्रकार सल्तनत काल में पूर्व सुल्तानों के शासन काल में रहे थे लेकिन शेरशाह की कार्य प्रणाली में अन्तर था। शेरशाह सभी विभागों के कार्यों को स्वयं देखता था। सभी महत्वपूर्ण निर्णय शेरशाह स्वयं करता था और मन्त्री तथा अमीर उनका पालन करते थे। वास्तव में, उसके मन्त्रियों की स्थिति सचिवों के समान थी।

शेरशाह के शासनकाल में चार मन्त्री थे—

(1) दीवान-ए-वजारत—इस विभाग का प्रमुख वजीर था। उसका मुख्य कार्य वित्त-सम्बन्धी होता था। वह राज्य की आय और व्यय का हिसाब रखता था। अन्य विभागों के मन्त्रियों के कार्यों का निरीक्षण करने का अधिकार भी उसे प्राप्त था। उसकी स्थिति प्रधानमन्त्री के समान थी। मालगुजारी की व्यवस्था ठीक करने के लिये शेरशाह इस विभाग में विशेष रुचि रखता था और वह स्वयं प्रतिदिन की आय और व्यय का हिसाब देखता था।

(2) दीवान-ए-अर्ज—इस विभाग का प्रमुख आरिज था जो सेना मन्त्री था। वह सेनापति नहीं होता था। बल्कि उसका कार्य सेना की भर्ती, रसद और संगठन से सम्बन्धित था। वह सेना के अनुशासन तथा वेतन आदि कार्यों को भी देखता था। शेरशाह स्वयं सैनिकों की भर्ती तथा उनके वेतन निर्धारण का कार्य देखता था। इससे इस विभाग की कुशलता बनी रहती थी।

(3) दीवान-ए-रसालत—इस विभाग का प्रमुख विदेश मन्त्री के समान कार्य करता था। वह विदेशी राजदूतों का स्वागत करता और अन्य राज्यों से पत्र-व्यवहार करता था। कभी-कभी दान विभाग का कार्य भी उसके सुपर्द कर दिया जाता था।

(4) दीवान-ए-इंशा—इस विभाग के प्रमुख को दबीर-ए-खास कहते थे। वह साम्राज्य के अन्दर सभी प्रकार के पत्र-व्यवहार, आदेशों को भेजने का कार्य करता था। सूबेदारों तथा अन्य अधिकारियों से वह उन पत्रों को प्राप्त करता था जो सम्राट् के लिये भेजे जाते थे।

इन चार मन्त्रियों के अतिरिक्त केन्द्रीय सरकार में दो अन्य प्रमुख अधिकारी होते थे जिनका सम्मान और अधिकार मन्त्रियों के समान थे। इनमें से एक दीवान-ए-कजा था जिसका प्रमुख अधिकारी मुख्य काजी होता था। न्याय प्रशासन में सम्राट् के बाद उसका दूसरा स्थान था। दूसरा विभाग वारिद-ए-मुमालिक का था जो साम्राज्य के गुप्तचर विभाग का प्रमुख था। उसका कार्य साम्राज्य के विभिन्न भागों से गुप्तचरों की रिपोर्टों को प्राप्त करना था जो नगरों, कस्बों तथा प्रमुख बाजारों में नियुक्त किए जाते थे। डाक का प्रबन्ध भी यहाँ विभाग करता था। सम्भवतः एक अन्य मुख्य अधिकारी होता था जो महल की देखभाल करता था।

प्रान्तीय प्रशासन—

शेरशाह के प्रान्तीय प्रशासन के बारे में बहुत कम सूचना प्राप्त होती हैं। अतः इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। डॉ. कानूनगो का मत है कि शेरशाह के प्रशासन में ‘सरकार’ से ऊँची प्रशासन इकाई नहीं थी। सम्भवतः वह परगना तथा केन्द्र के मध्य केवल ‘सरकार’ को रखना चाहता था और प्रान्तीय प्रशासन को उसने समाप्त करना चाहा था। डॉ. परमात्माशरण का मत है कि शेरशाह के शासनकाल में फौजी गवर्नरों की प्रथा थी और अकबर से पहले प्रान्तों का अस्तित्व था। डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव का मत है कि दोनों स्थापनाओं में आंशिक सत्य है। वह कहते हैं कि शेरशाह के शासनकाल में प्रान्तों के समान प्रशासनिक इकाई उपस्थित थी लेकिन इनका स्वरूप और आकार एक-सा नहीं था। इन इकाइयों को सूबा न कहकर ‘इक्ता’ कहा जाता था। इक्ता के प्रमुख अधिकारी मुख्य सेनापति या अमीर थे। प्रत्येक प्रान्त ‘सरकारों’ में विभाजित था और सरकारें ‘परगनों’ में विभाजित थीं।

सरकार प्रशासन—

सरकार और परगना प्रशासन की विस्तृत सूचना अब्बास खाँ की रचना तारीखे शेरशाही में प्राप्त होती हैं। प्रत्येक सरकार में दो प्रधान अधिकारी थे—प्रथम, शिकदार-ए-शिकदारान, और द्वितीय, मुन्सिफ-ए-मुन्सिफान। मुख्य शिकदार सरकार का सैनिक अधिकारी था। उसका कार्य सरकार या जिला में शान्ति बनाये रखना, परगना शिकदारों के कार्य का निरीक्षण करना तथा मालगुजारी व अन्य करों की वसूली में सहायता करना था। वह शिकदारों के फैसलों के विरुद्ध अपीलें भी सुनता था। इस पद पर प्रमुख अमीरों की नियुक्ति शेरशाह स्वयं करता था। मुख्य मुन्सिफ का कार्य न्याय से सम्बन्धित था और वह परगना-मुन्सिफों तथा अमीनों के कार्य का निरीक्षण भी करता था। इनकी सहायता के लिये अन्य कर्मचारी भी थे।

परगना प्रशासन—

परगना प्रशासन में शेरशाह ने महत्वपूर्ण सुधार किये थे। उसने परगना स्तर पर न्याय व्यवस्था को प्रभावशाली बनाया, जनता की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखा गया, दो समान अधिकार-सम्पन्न अधिकारियों को नियुक्त करके स्थानीय विद्रोहों की सम्भावना को समाप्त कर दिया। ये दोनों अधिकारी एक-दूसरे पर नियन्त्रण करते थे। परगना अधिकारियों की नियुक्ति भी शेरशाह स्वयं करता था, इससे परगनों पर केन्द्रीय नियन्त्रण बढ़ गया था। प्रत्येक परगना में शिकदार (सैनिक अधिकारी) और अमीन या मुन्सिफ (नागरिक अधिकारी) होते थे। इनके अतिरिक्त, एक फोतदार (खजांची) दो कारकुन (फारसी और हिन्दी के लेखक) होते थे। एक अर्द्ध-सरकारी अधिकारी कानूनगो भी होता था। शिकदार का कार्य शान्ति बनाये रखना और अमीन का कार्य भूमि की पैमाइश कराना तथा मालगुजारी वसूल करना था।

ग्राम प्रशासन—

शेरशाह ने ग्राम प्रशासन स्थानीय लोगों के हाथों में ही छोड़ दिया। प्रत्येक गाँव में मुखिया, पंचायतें और पटवारी होते थे जो स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था करते थे। शेरशाह के काल में गाँव के मुखिया के क्या अधिकार और कर्तव्य थे यह ज्ञात नहीं है। यह महत्वपूर्ण है कि शेरशाह की नीति कृषकों से सीधे सम्बन्ध रखने की थी। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि कृषकों की मालगुजारी निर्धारित करने तथा उसके संग्रह करने में मुखियाओं के अधिकार कम हो गये होंगे। लेकिन पटवारी का महत्व यथावत् बना रहा क्योंकि वह गाँव का लेखा-जोखा रखता था और ग्राम का ही वैतनिक अधिकारी था।

सैनिक प्रशासन—

राज्य की शक्ति तथा सुरक्षा का आधार सेना थी। इसलिये शेरशाह ने सैनिक प्रशासन पर विशेष ध्यान दिया। उसने स्थायी सेना का निर्माण किया जो विभिन्न महत्वपूर्ण सुरक्षा केन्द्रों तथा दुर्गों में रहती थी। उसकी सेना में चार अंग थे—घुड़सवार सैनिक जिनकी संख्या 1,50,000 थी, पदाति सैनिक जिनकी संख्या 25,000 थी, हस्ति सेना जिसमें अब्बास खाँ के अनुसार 5,000 हाथी थे, बन्दूकचियों की संख्या 50,000 बताई गई है। शेरशाह ने घुड़सवारों पर अधिक ध्यान दिया था और ऐसा प्रतीत होता है कि तोपखाना अधिक शक्तिशाली नहीं था। उसके सैनिक प्रशासन की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार थीं— (1) शेरशाह ने स्थायी केन्द्रीय सेना की व्यवस्था की। सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था और इन्हें राज्य के विभिन्न भागों में रखा जाता था। (2) शेरशाह ने सैनिकों की ‘हुलिया’ रखने तथा घोड़ों को दागने की प्रथा पुनः प्रचलित की थी। (3) शेरशाह स्वयं सैनिकों की भर्ती करता था। उसने सैनिकों में कठोर अनुशासन रखा।

वित्त प्रशासन—

शेरशाह अपने वित्तीय सुधारों के लिये प्रसिद्ध है। वास्तव में, मालगुजारी का प्रबन्ध उसकी प्रतिभा का स्थायी स्मारक है। शेरशाह ने मालगुजारी को खेतों की पैमाइश के आधार पर निर्धारित किया। शेरशाह ने कृषकों को भूमि का पट्टा दिया जिसमें भूमि का क्षेत्रफल, स्थिति, प्रकार और मालगुजारी दर्ज रहती थी। उसने मालगुजारी की कबूलियत भी किसानों से प्राप्त की। उसका सिद्धान्त था कि मालगुजारी निर्धारित करते समय कृषकों से उदारता का व्यवहार किया जाये लेकिन संग्रह में उदारता न की जाये।  राजस्व अधिकारियों के भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये शुल्क निश्चित कर दिये। ‘जरीबाना’ अर्थात् भूमि की पैमाइश का शुल्क और ‘महासीलाना’ अर्थात् कर-संग्रहक का शुल्क किसान को देना पड़ता था जो कुल उत्पादन का 2.5% से 5% तक होता था।

न्याय प्रशासन—

शेरशाह ने निष्पक्ष न्याय व्यवस्था स्थापित की। वह कहता था कि, “धार्मिक कृत्यों में न्याय सर्वश्रेष्ठ है” और काफिरों तथा मुसलमानों, दोनों के राजा इसे स्वीकार करते हैं। उसने मजलूमों का सदैव पक्ष लिया और उत्पीड़कों के विरुद्ध कार्यवाही की। वह न्याय-प्रार्थियों के मामलों की सावधानी से जाँच-पड़ताल करता था और उसने न्याय करने में भी कभी उच्च पदस्थ या दुर्बल व्यक्तियों के मध्य कोई भेदभाव नहीं किया। प्रत्येक बुधवार को वह खुले दरबार में मामलों की सुनवाई करता था और सगे-सम्बन्धियों को भी दण्ड देने में नहीं हिचकता था। शेरशाह ने अपराधों के मामलों में स्थानीय उत्तरदायित्व के सिद्धान्त को लागू किया था। स्थानीय अधिकारियों का उत्तरदायित्व था कि वे शान्ति-व्यवस्था स्थापित करें। अगर अपराधी का पता नहीं चलता था तो गाँव के मुकद्दम गिरफ्तार किये जाते थे और उन्हें क्षतिपूर्ति करने के लिये बाध्य किया जाता था।

मुद्रा सुधार—

शेरशाह ने व्यापार, वाणिज्य, संचार साधनों के विकास पर विशेष ध्यान दिया था। इसके लिये उसने मुद्रा सुधार किया जो आर्थिक विकास के लिये आवश्यक था। उसने पुरानी और खोटी मुद्राओं को प्रचलन से हटा दिया और उनके स्थान पर नवीन सोने, चाँदी और ताँबे की मुद्रायें चलाई। उसके दो प्रकार के सिक्के मुख्य थे—चाँदी का रुपया जिसका भार 178 ग्रेन था और ताँबे का दाम जिसका भार 380 ग्रेन था। शेरशाह का मुद्रा सुधार स्थायी सिद्ध हुआ। विन्सेण्ट स्मिथ लिखते हैं कि, “वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली का आधार रुपया है।” एडवर्ड टॉमस ने भी प्रशंसा करते हुए लिखा है कि, “मुगलों ने भी उसके मुद्रा सुधार को अपनाया था।”

सड़कों तथा सरायों का निर्माण—

शेरशाह के प्रशासन की एक महान उपलब्धि सड़कों तथा सरायों का निर्माण करना था। उसने राजधानी तथा मुख्य नगरों को जोड़ने वाली सड़कों का निर्माण कराया। इससे साम्राज्य के दृढ़ीकरण के अतिरिक्त व्यापार तथा आवागमन की भी उन्नति हुई। उसने मुख्य रूप से चार सड़कों का निर्माण और मरम्मत करायी—1. सोनारगाँव से सिन्धु नदी तक, 2. आगरा से जोधपुर और चित्तौड़ तक जो गुजरात के समुद्र तट तक थीं, 3. आगरा से बुरहानपुर तक, 4. लाहौर से मुल्तान तक। सरायों के व्यय के लिये पास के गाँवों का राजस्व इन्हें दिया गया था। प्रत्येक सराय में चौकीदार, डाक सेवक और दो घोड़े, सदैव तैयार रहते थे। इन सरायों का डाक-चौकी के रूप में भी प्रयोग होता था। शेरशाह की इन सड़कों तथा सरायों को ‘साम्राज्य की धमनियाँ’ कहा गया है। कहा जाता है कि शेरशाह ने 1,700 सरायों का निर्माण कराया था।

इस प्रकार शेरशाह महान् प्रशासक था। सैनिक तथा असैनिक क्षेत्रों में उसकी उपलब्धियाँ महान् थीं। यद्यपि उसने मौलिक सिद्धान्तों पर नवीन प्रशासन का निर्माण नहीं किया था, फिर भी उसने पूर्ववर्ती प्रशासन को नवीन उद्देश्य और प्रेरणा प्रदान कीउसे प्रशासन के लिये लगभग पाँच वर्षों का ही समय मिला लेकिन इस सीमित समय में ही उसके कार्यों की सफलता के कारण उसे महान् प्रशासक माना जाता है। कीन के अनुसार किसी भी सरकार ने यहाँ तक की अंग्रेजों ने भी इतनी बुद्धिमत्ता नहीं दिखाई जितनी इस पठान ने दिखाई।

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

मुगलकालीन भू-राजस्व व्यवस्था

मुगलकाल में भू-राजस्व व्यवस्था के क्षेत्र में अधिक सुधार हुए। इसके पीछे दो प्रमुख कारण थे प्रथम, सल्तनत कालीन सुधारों से, कमियों के बारे में भली-भाँति जानकारी प्राप्त हो गई थी। अब उनके निवारण के लिए उपाय सोचना सरल था । द्वितीय, अफगान शासक शेरशाह ने इस संदर्भ में नया प्रयास कर पथ प्रदर्शन कर दिया था। बाबर और हुमायूँ के शासनकाल में भू-राजस्व व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुए थे। तमाम प्रयोगों के बाद अकबर के समय  15700 में मुजफ्फर खाँ पुनः वित्तमन्त्री बने। उसने प्रत्येक वर्ष भूमि की पैमाइश पैदावार का आंकलन तथा कीमतों की स्थानीय बाजार में स्थिति की जानकारी की व्यवस्था आरम्भ कर दी। इन पर बनी व्यवस्था 'जाब्ती हरसाला' थी। 1580 ई० आईन-ए-दहसाला का निर्माण हुआ। आइन ए दहसाला अर्थात् दस साल का भू-राजस्व बंदोबस्त अथवा ज़ब्ती प्रणाली, जोकि इसके अधिष्ठाता टोडरमल के नाम से प्रसिद्ध हुई, सन् 1582 में प्रचलन में आई। इसे रैयतवाड़ी प्रथा के नाम से भी जाना गया क्योंकि यह प्रत्यक्षतः कृषकों से संबधित थी। आरंभिक तौर पर इस प्रणाली को साम्राज्य के आठ प्रान्तों में शुरू किया गया इलाहबाद, आगरा, अवध, अजमेर, मालवा, दिल्ली, लाहौर व मुल्तान।

राजा टोडरमल के भू राजस्व प्रणाली में एक व्यापक प्रक्रिया विद्यमान थी जिसमें राज्य के साथ-साथ किसानों की भी पूर्ण सन्तुष्टि के लिए कृषि समस्या के स्थायी बन्दोबस्त के लिए पाँच चरण थे-

भूमि का मापन : प्रथम चरण

राष्ट्रीय नीति के रूप में इस प्रणाली के अंतर्गत पूरे देश के लिए भूमि के मापन संबंधी एक ही पद्धति अंगीकार की गई। इस उद्देश्य के लिए गाँव को एक मानक प्रशासनिक इकाई के रूप में अपनाया गया। आरंभ में किसी गाँव की ठीक भू-क्षेत्रीय सीमा का तथा इसके आयामों के अन्तर्गत आने वाली विभिन्न प्रकार की भूमि का निर्धारण किया गया। प्रत्येक किसान स्वामी के पास कृषि योग्य भूमि के सही क्षेत्रफल का निर्धारण किया गया। मापन के उद्देश्य के लिए सुल्तान सिकंदर लोदी के नाम से जाना जाने वाला गज या यार्ड, जो 41 अंको (अंगुल) या 33 इंच की लम्बाई का होता था, राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग में लाया जाने लगा और 32 अंको वाला शेर शाह के समय का गज प्रचलन से हटा दिया गया। इससे पहले रस्सी के बने 'जरीब' को भूमि की मापन के लिए प्रयुक्त किया जाता था, लेकिन यह तापमान में आने वाले अंतर व इसे खींचने में कम-ज्यादा बल प्रयोग के कारण सही नाप नहीं दे पाता था। इसका चलन भी समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर बांस का एक नया 'जरीब', जिसकी पतली पट्टियां लोहे के छल्लों से कसकर बंधी होती थी, प्रयोग में लाया गया। क्षेत्र की मानक इकाई 'बीघा' मानी गई, एक बीघे में 60 गज या 3600 वर्ग गज होते थे।

भूमि का वर्गीकरण : द्वितीय चरण

भूमि के मापन के बाद दूसरा चरण वर्गीकरण का आता है जो भूमि की गुणवत्ता तथा उसकी निरन्तरता पर आधारित होता था। फसल की निरंतरता के आधार पर भूमि को चार श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया था— पोलज, परती, चाचर व बंजर। पोलज वह भूमि होती थी जिसमें एक साल में दो फसले उगाई जाती थी। परती वह होती थी जो दो फसलों के बाद अधिकार लगभग एक वर्ष के लिए खाली छोड़ दी जाती थी जिससे कि वह फिर से उपजाऊ हो सके। चाचर वह भूमि होती है जो अनुपजाऊ होती थी या मुश्किल से तीन चार वर्षो में उसमें एक फसल की जा सकती थी, बंजर भूमि वह भूमि होती थी जो पूर्णतया अनुपजाऊ होती थी और उस पर खेती करना बिल्कुल मुश्किल होता था। उपरोक्त तीनों श्रेणियों को भी उनकी उर्वरकता के आधार पर पुनः तीन श्रेणियों-अच्छी, औसत दर्जे व खराब में बाँटा जाता था ताकि भू राजस्व भुगतान करते समय किसानों के साथ किसी प्रकार का अन्याय न हो सकें।

भू राजस्व का आकलन : तृतीय चरण

भू-राजस्व की वसूली तहसील या परगना स्तर पर होती थी और भूमि की सभी श्रेणियों के लिए फसल उत्पादन का आकलन बीघा के आधार पर किया जाता था। इस प्रकार प्रत्येक मुख्य फसल का प्रति बीघा उत्पाद दस वर्ष के औसत उत्पाद के आधार पर परगना स्तर पर निकाला जाता था। शुरूआत के लिए सन् 1570-71 से 1580-81 तक की उपलब्ध सूचना के आधार पर विस्तृत अनुसूचियां तैयार की गई थीं। अबुल फजल ने लिखा है कि इन सूचियों को तैयार करने में वास्तविक तथ्य आंकड़े 1575-76 से 1580-81 तक की अवधि से ग्रहीत किए गए हैं, जबकि 1570-71 से 1574-75 तक की सूचनाएं जांच पड़ताल से जुड़े निष्ठावान अधिकारियों के आधार पर संकलित की गई थीं। अच्छी फसलों को प्रत्येक वर्ष आकलित किया जाता था और प्रचूर मात्रा में हुई फसल वाले वर्ष को स्वीकार लिया जाता था। विभिन्न श्रेणी की भूमि पर उत्पादित होने वाली प्रति बीघा औसत फसल का एक तिहाई उत्पाद राज्य माँग के रूप में नियत कर दिया जाता था। यह भू-राजस्व कृषक बिना किसी परिवर्तन के दस साल तक अदा करता रहता था । इस बीच सरकारी तन्त्र प्रत्येक श्रेणी की जोत भूमि में होने वाली प्रत्येक फसल के सही उत्पादन का परगना या तहसील स्तर पर वर्ष दर वर्ष हिसाब लगाती रहती थी, जिससे अगले दस वर्ष समाप्त होने के बाद उत्पादों व सरकारी मांगों की एक परिशोधित सूची प्रस्तुत की जा सके।

राजस्व मांग का नगदीकरण तथा लघुकरण : चतुर्थ चरण

प्रस्तुत भू-राजस्व का आकलन करने के बाद इसे क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न खाद्य फसलों की कीमत सूचियों की सहायता से नकदी में बदल दिया जाता था। इस कार्य के लिए समूचे साम्राज्य को कई क्षेत्रोंमें बाँट दिया गया था ‘दस्तूर' के नाम से सुपरिचित इन क्षेत्रों का बंटवारा अपरिवर्तनीय जलवायु, सामाजिक तथ्यों तथा कृषकों को ध्यान में रखकर इस कुछ इस प्रकार किया जाता था कि दशकों तक खाद्य फसलों की कीमतों में उचित सीमा से अधिक उतार चढ़ाव न आए। प्रत्येक 'दस्तूर में प्रत्येक खाद्य फसल के लिए प्रति ‘मन' औसत कीमत उसके पहले के दस वर्षों की कीमत, जैसे 1570-71 से 1580-81 को ध्यान में रखते हुए निकाली जाती थी। उत्पादों व कीमतों की सूची तैयार करने में भी यही पद्धति अपनाई जाती थी अन्तर इतना अवश्य था कि उत्पादों, की सूची परगना स्तर पर तथा कीमतों की सूची दस्तूर स्तर पर तैयार की जाती थी। आमतौर पर एक दस्तूर में कई तहसीलें होती थी. लेकिन कुछ मामले ऐसे भी थे जहाँ एक तहसील में एक या एक से अधिक दस्तूर होते थे लेकिन ऐसा तभी होता था जब असामान्य भौगोलिक तथ्यों या अन्य तथ्यों के कारण खाद्य फसलों की कीमतें बेतहाशा रूप से बढ़ जाती थी।

भू-राजस्व का संग्रहण : पंचम चरण

अकबर ने भू-राजस्व संग्रहण की सराहनीय व्यवस्था की थी। उसने राजस्व संग्रहण की दृष्टि से प्रांत को सरकारों या जिलों में तथा जिलों को तहसीलों या परगनाओं में बांट रखा था। जैसाकि हम जानते हैं जिला स्तर पर राजस्व स्थापना संबंधी प्रभावी अधिकारी अमलगुजार होता था जबकि तहसील स्तर पर इस कार्य से संबंधित अधिकारी को आमिल कहा जाता था। इस राजस्व संबंधी स्थापना में असंख्य पटवारी, कानूनगो, राजस्व समाहर्ता, कोषपाल, लिपिक (क्लर्क) आदि शामिल होते थे। शासन की तरफ से तहसील स्तर पर 'दस्तूर-उल-अमल' अथवा सामान्य आचरण संहिता दी जाती थी, जिसमें भू राजस्व को भुगतान पद्धति की व्याख्या की गई थी । प्रत्येक किसान को एक पट्टा या रूक्का दिया जाता था और उसे एक कबूलियत या करारनामा पर हस्ताक्षर करने होते थे; इसी करारनामे के अनुसार वह अपनी राजस्व अदायगी करता था। पट्टा बहुत ही महत्वूपर्ण वैधानिक प्रलेख माना जाता था जिसमें किसान की भूमि के मालिकाना संबंधी छोटी से छोटी बातों का विवरण भी दिया रहता था और इसे पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित भी किया जा सकता था। भू-राजस्व वर्ष में दो बार वस्तु के रूप में या नगद देय था अर्थात क्रमशः रबी और खरीफ की फसल कटने के पश्चात्। सूखे अथवा अकाल के समय भू राजस्व को माफ किया जाता था तथा इसके अतिरिक्त किसानों को पर्याप्त राहत भी दी जाती थी। कठिनाईयों से मुकाबला करने के लिए 'तकावी' ऋण भी दिए जाते थे।

आईन-ए-दहसाला अकबर के काल में साम्राज्य के केन्द्रीय भाग में लागू किया गया था। सब जगह उसे नहीं लागू किया जा सका। सिन्ध, काबूल, कंधार और कश्मीर में बंटाई प्रथा चलती रही। बंगाल, गुजरात और काठियावाड़ में नस्क ( कनकूट ) प्रथा चलती रही। जहाँगीर ने बंगाल और गुजरात में भी दहसाला प्रबंध को लागू करने का प्रयास किया। शाहजहाँ के समय दक्षिण में औरंगजेब की दूसरी सूबेदारी के समय मुर्शीद कुली खाँ के द्वारा भू-राजस्व के संबंध में काफी सुधार किए गए। जहाँगीर के समय से ही प्रशासनिक शिथिलता के कारण कमियाँ दिखाई पड़ने लगी थीं। शाहजहाँ के समय से इजारादारी प्रथा जोर पकड़ने लगी। शाहजहाँ के समय 70 प्रतिशत भूमि जागीरों में आवंटित थी। औरंगजेब के समय तक आते-आते मुगल भू-राजस्व प्रणाली अत्यन्त त्रुटि पूर्ण हो गई। राज्य का यह एकमात्र प्रमुख आय का स्रोत सूखने की कगार पर पहुंच गया। राज्य दिवालियापन की स्थिति में पहुंच गया। सैनिकों को वेतन चुकाना मुश्किल हो गया। जागीरों की कमी हो गई। जागीरों पर एक से अधिक प्रतिद्वन्द्वी कब्जे के लिए संघर्ष करने लगे। पूरी भू-राजस्व प्रणाली अस्तव्यस्त हो गई। मुगल साम्राज्य के पतन में इसका भी योगदान था। जागीरदारों ने कृषकों का भरपूर शोषण किया। कृषि के विस्तार के लिए सुविधाएं बढ़ाने की कोशिश करने वाला अब कोई नहीं था।

सल्तनत कालीन भू-राजस्व प्रशासन

उत्तरी भारत में जब से दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई, भू-राजस्व प्रशासन के क्षेत्र में धीरे-धीरे व्यापक परिवर्तन हुआ। इसकी शुरुआत इक्ता व्यवस्था से होती है। मुस्लिम विचारधारा के अनुसार भूमि को सुलही, उस्री और खिराजी में बांटा गया था। 'सुलही' भारत में नहीं थी। उस्री भूमि सैद्धान्तिक रूप से मुस्लिम कृषकों के लिए थी। खिराजी भूमि से खराज़ नामक भूमि कर वसूल किया जाता था। लगातार वंश परिवर्तन के कारण भू-राजस्व प्रशासन में एकरूपता नहीं थी बल्कि उसमें लगातार परिवर्तन होता रहा। अल्लाउद्दीन खिलजी के समय से पूर्व भू-राजस्व व्यवस्था में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं हुआ वह अपने पुराने रूप में पुराने लोगों द्वारा ही चलता रहा।

अलाउद्दीन 

अलाउद्दीन पहला सुल्तान था जिसने गाँवों में केन्द्र की सरकार का हस्तक्षेप बढ़ाया। भू-राजस्व सुधारों के पीछे उसके  उद्देश्य थे –

1.    राज्य की आमदनी में वृद्धि करना

2.    आर्थिक रूप से लोगों को पंगु बनाकर उनकी विद्रोह करने की शक्ति को तोड़ना

3.    सेना का खर्च चलाने के लिए राजस्व बढ़ाना था

4.    ऐसी व्यवस्था करना कि धनी लोगों का बोझ गरीबों पर न पड़े

इसके लिए उसने कुछ कानून बनाए –

1.    जो व्यक्ति खेती करे, नाप और प्रति बिस्वा उपज के आधार पर आधी उपज कर के रूप में दे

2.    गाँव के सभी लोग समान दर से लगान दें

3.    खूत, मुकद्दम या चौधरी भी साधारण कृषक (बलाहार) की तरह अपना पूरा लगान दें

अपनी योजना को अल्लाउद्दीन ने तीन चरणों में पूरा किया।

प्रथम चरण

सबसे पहले उसने भूमि अनुदानों अर्थात मिल्क, इनाम, वक्फ को रद्द करके सभी भूमियों को खालिस भूमि में बदल दिया तथा अधिकारियों को नगद वेतन देना शुरू कर दिया। हालाँकि सीमित मात्रा में अनुदान चलते रहे।

द्वितीय चरण

इसके बाद उसने भूमि की माप कराई तथा भूमि की वास्तविक आय पर राजस्व निश्चित किया। मध्यस्थों अर्थात खुत, मुकद्दम और चौधरी के राजस्व विशेषाधिकारों हूकुके खोती(राज्य से प्राप्त) तथा किस्मते खोती( किसानों से प्राप्त) को समाप्त कर दिया।

तृतीय चरण

कर को औसत उत्पादन के आधार पर लगाया गया तथा उसको बढ़ा कर पच्चास प्रतिशत कर दिया गया।

इन कानूनों से सरकार का किसानों से पहली बार सीधा सम्बन्ध स्थापित हुआ। सरकारी कर्मचारी अब गाँव-गाँव पहुँचे। ये थे मुहस्सिल (खिराज वसूल करने वाले), आमिल (कर संग्रह करने वाले) गुमाश्ता (प्रतिनिधि), मुतसर्रिफ ( हिसाब की जाँच करने वाले), ओहदा दाराने दफातिर (कार्यालय के अध्यक्ष), और नवीसिन्दा (लिपिक)। ये जिला स्तर पर कार्य करते थे लेकिन इनकी पहुँच गाँवों तक थी। कृषकों के लिए अब कृषि लाभदायक नहीं रह गई। यह लगान व्यवस्था बहुत कृषक - विरोधी थी। पचास प्रतिशत भू-राजस्व तथा चराई, घरी, जजिया का भार कृषक की कमर तोड़ने वाला था। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद इतनी सख्ती फिर कभी नहीं हुई।

गयासुद्दीन तुगलक

गयासुद्दीन तुगलक ने शासन व्यवस्था के पुनर्गठन में मध्यम मार्ग अपनाया। उसने खूतों के विशेषाधिकार तथा भत्ते बहाल कर दिए। कृषकों से उतना ही कर लिया कि वे 'भिखारी न बनें क्योंकि उस परिस्थिति में वे खेती करना छोड़ देंगे। उसने भूमि नापने (हुक्मे मसाहत) तथा प्रति बिस्वा उपज का नियम रद्द कर दिया। उसके स्थान पर बँटाई (हुक्मे हासिल) की प्रणाली पूर्ववत् बहाल कर दी। इसमें किसानों के साथ अधिक न्याय होता था। जितनी फसल हुई उसी की बँटाई होती थी। यदि फसल खराब हो जाती तो कृषक की तरह राज्य का भी नुकसान होता था। कर के बारे में बरनी ने लिखा है कि : सुल्तान ने आज्ञा दी कि एक बार में दसवें या ग्यारहवें भाग से अधिक कर वृद्धि न की जाय। उसने मध्यवर्ती जमीदारों, विशेषत: मुकद्दम और खुतों को उनके 'हक्क ए खोती' के पुराने अधिकार लौटा दिए, उनके खेतों और चरागाहों को कर मुक्त कर दिया, किन्तु उन्हें 'किस्मत एक खोती' का अधिकार नहीं दिया

मुहम्मद बिन तुगलक

मुहम्मद बिन तुगलक के काल में कर बढ़ते ही विद्रोह शुरू हो गया अकाल ने स्थिति को और भयानक बना दिया। बाद के वर्षों में सुल्तान ने कृषि को सामान्य बनाने के लिए प्रयास किया। ऊसर भूमि पर खेती करने का उसका प्रयास विफल रहा। इब्न बतूता ने लिखा है कि अकाल के वर्षों में सुल्तान ने राजधानी के बाहर कुएं खोदने तथा वहाँ खेती करने का आदेश दिया था । इसके लिए उसने किसानों को बीज एवं धन भी दिया था। बरनी ने लिखा है कि कृषि की उन्नति के लिए 'दीवाने अमीर कोही'. (कृषि विभाग ) का गठन किया। दो वर्षों में राज्य ने सत्तर लाख टंके खर्च कर दिए। बंजर पर खेती नहीं हो सकी। उसने किसानों के लिए सोनधर नामक कृषि ऋण का भी प्रबंध किया।

सुल्तान फीरोजशाह तुगलक

सुल्तान फीरोजशाह तुगलक ने भू-राजस्व नीति में सुधार करके बहुत प्रसिद्धि प्राप्त किया। उसके समय कृषि में वृद्धि, सिंचाई के साधनों में वृद्धि तथा अनाज के मूल्य में कमी रही। जो तकाबी पहले के सुल्तान ने बांटी थी, कृषक उसे चुकाने में असमर्थ थे। फीरोज ने पूरी तकाबी माफ कर कृषकों को खुश कर दिया। ऋण पंजिकाएं नष्ट कर दी गईं। वजीर खाने जहां मकबूल शिक्षित न होते हुए भी अत्यन्त बुद्धिमान था । उसने राजस्व विभाग को पूर्ण रूप से व्यवस्थित किया।

अफीफ ने लिखा है कि राज्य की आय पर विचार किया गया। ख्वाजा हुसामुद्दीन जुनैद को इसका ब्यौरा जुटाने का कार्य सौंपा गया। कार्य कठिन था । इसमें छः वर्ष लग गए। उसने सभी प्रान्तों में निरीक्षण के उपरान्त वहाँ की आय ज्ञात किया। अन्ततः सम्पूर्ण राज्य की आय छः करोड़ पचहत्तर लाख टंका ज्ञात हुई। फीरोजशाह ने जागीरों की संख्या में वृद्धि कर दिया। यह कृषकों के लिए आगे चलकर अहितकर हुआ। वेतन के बदले बड़ी-बड़ी जागीरें देना उसकी नीति थी। अफीफ ने लिखा है कि जीवन वृत्ति के लिए उदारतापूर्वक जागीरें दी गईं। राजस्व में ठेकेदारी की प्रथा लागू की गई जो कृषकों के लिए हितकर नहीं होती है। फीरोजशाह तुगलक ने नहरें बनवाई। तारीखे मुबारकशाही में नहरों के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है। मुख्य नहर शासन के खर्च से बनवाई जाती थी। छोटी नहरें या उसकी पतली शाखाएं जो खेतों तक पहुंचती थीं, जागीरदारों के माध्यम से कृषकों के व्यय से बनती थीं। इसके लिए एक सिंचाई कर लिया जाता था। सिंचाई कर (हक्के शुर्ब) कुल उपज का 1/10 निश्चित था। नहरों से दो लाख टका वार्षिक आय होने लगी ।

फीरोजशाह ने 24 करों (आबवाबों) को समाप्त कर दिया। ये भू-राजस्व के अलावा थे। ये स्थानीय स्तर पर सभी पर लगते थे चाहे वे कृषक हों या न हों। व्यापारी तथा घरेलू उद्योगों में लगे लोग भी इनकी चपेट में थे। इन करों की माफी से लोगों को बहुत राहत महसूस हुई।

पूरा भू राजस्व प्रशासन वजीर के नियन्त्रण में रहता था। उसकी सहायता के लिए नायब वजीर होता था। मुस्तौफी-ए-मुमालिक (महालेखा परीक्षक) तथा मुशरिफे ममालिक (सम्पूर्ण राज्य के कर वसूल करने वाला), ये दोनों वजीर के अधीन होते थे। अनेकों गुमाश्ता, सरहंग, नवीसंद भी होते थे आमिल जिलास्तरीय एक प्रमुख अधिकारी होता था। पटवारी गाँव में रहने वाला वंशानुगत पदाधिकारी था। नकद भुगतान कृषक के लिए हमेशा कष्टदायक होता था। इसके लिए वह अपनी फसल सस्ते मूल्य पर कटाई के मौसम में ही बेचने को मजबूर था। सेठ साहूकार से कर्ज भी लेना पड़ता था। कृषकों एवं अन्य ग्रामीणों पर साहूकारों का आर्थिक शोषण चलता रहा। इससे ग्रामीण कर्जदारी एवं गरीबी बढ़ी। मध्ययुगीन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की यह एक बहुत बड़ी त्रासदी थी।

रविवार, 6 नवंबर 2022

मुगल कालीन प्रांतीय प्रशासन

अबुल फजल के अनुसार, अपने शासन के चौबीसवें वर्ष अपने साम्राज्य को बारह प्रान्तों में विभक्त करने के समय अकबर ने प्रत्येक सूबे में एक सिपहसालार, एक दीवान, एक बख्शी, एक मीर अदल, एक सद्र, एक कोतवाल, एक मीर-ए-बहर तथा एक वाकियानवीस नियुक्त किया। प्रान्तों की संख्या 1602 ईसवी सन में 15 हुई जो शाहजहाँ के समय 18 तथा औरंगजेब के समय तक 20 हो गई 

1.    सिपहसालार अथवा नाज़िम

एक प्रांत के प्रमुख कार्यवाही अफसर या प्रांतीय अफसर को अकबर के समय सिपहसालार तथा बाद में नाज़िम कहा जाता था। लेकिन वह सूबेदार या सूबा के नाम से अधिक लोकप्रिय था। उसका मुख्य काम प्रांत में कानून और व्यवस्था बनाए रखना तथा शाही फरमानों की तालीम कराना था । वह आंतरिक लड़ाई झगड़ों तथा बलवों को दबाकर शांत किया करता था और बाहरी आक्रमण की स्थिति में केंद्र से सहायता लेता था। वह स्थानीय राजा रजवाड़ों से नजराना भी लिया करता था तथा जरूरत पड़ने पर वसूल करने में दीवान की सहायता करता था। वह इजलास में बैठकर अधिकतर फौजदारी मुकद्दमों का फैसला भी किया करता था। वह पदोन्नति तथा पुरस्कार के लिए अपने मातहत अफसरों की सिफारिश लिख कर केंद्र को भेजा करता। अपने प्रांत में होने वाली घटनाओं के संबंध में वह केंद्र को साप्ताहिक रिपोर्ट भेजता था। सूबेदार की नियुक्ति के लिए फरमान-ए साबती नामक एक विशेष फरमान जारी किया जाता था, उसके कर्तव्यों के लिए विशेष आदेश "हिदायत-उल- कवायद जारी होता था। लगभग दो हजार से पांच हजार सिपाहियों को रखने वाले श्रेष्ठ मनसबदारों को ही इस पद पर नियुक्त किया जाता था।

2.   दीवान :

प्रांत में दूसरा महत्वपूर्ण अफसर दीवान होता था, जिसका काम राजस्व से संबंधित था। वह शाही दीवान के प्रति उत्तरदायी था और उसी के द्वारा नियुक्त किया जाता था। उसका मुख्य काम अपने अफसरों अमील, तहसीलदार आदि के द्वारा भूमिकर, बिक्रीकर, राहदारीकर, चुंगीकर आदि वसूल कर केंद्र को भेजना था। वह वसूली, उसके लेखे जोखे तथा लेखा परीक्षा के लिए उत्तरदायी होता था वह शाही हुकूमत के द्वारा अनुमोदित कार्यों के लिए धन की स्वीकृति भी देता था। जहां फसलें मारी जातीं वहां के लिए राजस्व में छूट देने का अधिकार भी इसे प्राप्त था। वह प्रत्येक पखवारे में अपने सूबे की रिपोर्ट केंद्र को भेजता था। इस प्रकार दीवान वहां के सूबेदार पर एक अंकुश स्वरूप था, हालांकि वह मनसबदार के रूप में काफी छोटा अफसर था और कम वेतन पाता था। बुलाए जाने पर उसे सूबेदार के इजलास में उपस्थित होने का अधिकार भी था, अन्यथा दीवान अपने से वरिष्ठ रूप में सूबेदार को मान्यता नहीं देता था। इन दो अफसरों में बहुधा झगड़ा होने की घटनाएं हुई हैं, जिनमें केंद्र को दखल देना पड़ा। कई बार गवर्नर ने खिलाफत की है, किंतु वह अपने साथ दीवान को सहमत नहीं कर पाया। फिर भी, अकबर द्वारा बड़ी चतुराई से प्रतिबंध और संतुलन के लिए चलाई गई यह प्रथा  औरंगजेब काल में अवरुद्ध हो गई, जबकि एक ही व्यक्ति को सूबेदार और दीवान दोनों का पद दिया जाने लगा।

3.   बख्शी

प्रांत में बख्शी दूसरा महत्वपूर्ण अफसर होता था। वह मीरबख्शी का प्रतिनिधि होता था और उसकी राय से नियुक्त किया जाता था। वह प्रांत में फौजी इंतजाम का प्रभारी अधिकारी होता था तथा सैनिकों की भर्ती तथा उनके साज सामान के बारे में दिए गए शाही एलान का पालन करवाया करता था। वह मनसबदारों के द्वारा रखे जाने वाले फौजी दस्तों का मुआइना करता था तथा उनके बारे में सालाना रिपोर्ट भी बनाता था। युद्ध के समय वह यह सुनिश्चित करता था कि अफसरों के पास उचित संख्या में सिपाही हैं तथा उन से सेना की आवश्यकता पूरी हो जाएगी। वास्तविक रूप में अभियान के समय उसका एक प्रतिनिधि भी सेना के साथ होता था। मनसबदारों तथा उनके सिपाहियों के निमित्त भुगतान के लिए बिल पास करने का उत्तरदायित्व भी उसी का था। मुख्य रिपोर्टर या वाकयानवीस के रूप में प्रांतीय मामलों के संबंध में नियमित रूप से वह केंद्र को रिपोर्ट भेजा करता था जिसकी सूचना वह प्रत्येक परगना में रखे गए अपने एजेंट से लेता था ।

4.   दीवान-ए-बयूतात:

प्रांत में सरकारी इमारतों, कारखानों तथा सड़कों के रख रखाव के लिए दीवान-ए-बयूतात जिम्मेवार होता था। वह किसी मृत मनसबदार की संपत्ति का भार भी संभालता था और उसकी तालिका बनाकर केंद्र को भेज देता था। जब कभी बादशाह उस प्रांत का दौरा करता तो उसके आराम और देख-रेख की जिम्मेदारी भी दीवान-ए-बयूतात की होती थी।

5.   प्रांतीय सद्र

केंद्र के सद्र उस सूदूर की संतुति पर सम्राट प्रांत में एक सद्र की नियुक्ति करता था। प्रांतीय सद्र अपने क्षेत्र में इस्लाम धर्म के हित के लिए उत्तरदायी था। इस सन्दर्भ में उसका प्रमुख कार्य धार्मिक, शैक्षणिक अनुदानों तथा भूमि अनुदानों का वितरण करना था।

6.   क़ाज़ी-ए-सूबा

प्रान्त में प्रमुख न्यायिक अधिकारी क़ाज़ी-ए-सूबा था। उसकी नियुक्ति सम्राट क़ाज़ी-उल–कुज़ात की संस्तुति पर करता था। उसे दीवानी तथा फ़ौजदारी दोनों, तरह के मुकदमों का फैसला करने का अधिकार था। वह मुसलमानों के वैवाहिक तथा सम्पति सम्बन्धी मुकदमों का भी फैसला करता था।

7.   अन्य अफसर :

प्रांत के अन्य अफसरों में पुलिस और जेल का प्रभारी कोतवाल, लोक नैतिकता को देखने वाला मुहतसिब तथ्यों की जांच करने वाला मीर अदल तथा जल मार्गों की देख रेख करने वाला मीर बहर प्रमुख था।

अकबर ने प्रांतीय शासन पर अंकुश लगाने और अधिकारियों में संतुलन बनाये रखने की नीति अपनाई थी और इसके लिए वह सदैव सतर्क दृष्टि और कड़ा नियंत्रण रखता था जिसकी वजह से उसका प्रांतीय शासन सुचारू रूप से चला जो बाद के शासकों के काल में लापरवाही के कारण भंग होने लगा।

दिल्ली सल्तनत में प्रांतीय प्रशासन

1. तीन तरह के प्रांत

सल्तनतकाल में तीन तरह के प्रांतों का अस्तित्व था। 

सीमित प्रांतपति : इमरात-ए तफ़वीद

क्षेत्रफल में छोटे प्रांत, जिनके प्रांतपति सुल्तान द्वारा नियुक्त होते थे। इन पर सुल्तान का अधिक नियंत्रण रहता था। ये मुस्लिम विधिवेत्ताओं के सीमित प्रांतपतियों (इमरात-ए तफ़वीद) में आते हैं। उत्तरी भारत, विशेषतः दिल्ली के निकटस्थ भाग, इस श्रेणी में आते थे। 

असीमित प्रांतपति : इमारत-ए-ख़स्सा

इस  श्रेणी में दूरवर्ती प्रांत आते थे जिन पर दिल्ली से पूरी तरह नियंत्रण रखना सम्भव नहीं था। ये मुस्लिम विधिवेत्ताओं के असीमित प्रांतपतियों (इमारत-ए-ख़स्सा) में आते थे। बंगाल का प्रांत इसका उदाहरण है।

भारतीय राजा 

तीसरी श्रेणीमें वे भारतीय राजा आते थे जो सुल्तानों को कर देते थे किन्तु सुल्तानों ने उनके राज्य को अपनी सल्तनत में सम्मिलित नहीं किया। उन्हें आंतरिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण के राज्यों से कर लिया किन्तु उन्हें पूर्णतया सल्तनत में सम्मिलित नहीं किया गया।

2. प्रान्तीय सरकार के अधिकारी

प्रांतीय सरकार केंद्र सरकार की प्रतिकृति थी, और यह केंद्र सरकार के समान ही कार्य करती थी, लेकिन दोनों सरकारों में विभिन्न पदों का महत्व समान नहीं थे। प्रांतों के राज्यपालों को वली, मुक्ती, नायब और यहां तक कि सुल्तान भी कहा जाता था, लेकिन अंतिम दो उल्लिखित उपाधियाँ केवल असीमित शक्तियों का आनंद लेने वाले दूरस्थ प्रांतों के राज्यपालों पर लागू होती थीं। प्रांत के समुचित प्रशासन के लिए राज्यपाल सीधे केंद्र सरकार के प्रति उत्तरदायी थे। प्रांतों के लोगों को राज्यपालों के उत्पीड़न के खिलाफ सुल्तान से अपील करने का अधिकार था, और यह राज्यपालों के अत्याचार पर सबसे बड़ी रोक थी। राज्यपालों को सुल्तान द्वारा केंद्र में वापस बुलाया जा सकता था और फिर किसी अन्य प्रांत में भेज दिया जाता था।

3. प्रांतीय राजस्व : साहेब-ए-दीवान या दीवान-ए-सूबा

प्रान्तों में प्रांतीय राजस्व को देखने के लिए  साहिब -ए-दीवान या दीवान-ए-सूबा होता था प्रांतीय सरकार की राजस्व व्यवस्था की ओर देखने पर दो प्रश्न उठते हैं: (1) केंद्र सरकार के साथ संबंध और (2) किसान के साथ संबंध। प्रांतीय सरकार को केंद्र सरकार को एक निश्चित राशि का भुगतान करना पड़ा क्योंकि हम पाते हैं कि गयासुद्दीन तुगलक ने आदेश दिया कि राजस्व मंत्रालय  प्रांतों पर एक-दसवें या एक-ग्यारहवें से अधिक की वृद्धि न करे। दूसरा प्रश्न, अर्थात्, कृषक के साथ संबंध और भी अस्पष्ट है। हालाँकि, गयासुद्दीन तुगलक के शासनकाल से संबंधित एक मार्ग है, "सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक शाह ने एक बार फिर एक बुद्धिमान और विवेकपूर्ण राजा के अनुरूप  आदेश दिया कि राजस्व के संग्रहकर्ता और राज्यपालों को जांच करनी चाहिए और मुखिया को राजा द्वारा मांगे गए राजस्व की तुलना में अधिक लेने से रोका जाना चाहिए।अलाउद्दीन के शासन काल में काश्तकार को प्रांतों में सरकारी राजस्व संग्राहकों के अधीन लाया जाता था जहाँ उसके नियम संचालित होते थे

4. प्रांतीय सेना

प्रान्तों में एक प्रांतीय आरिज़ होता था प्रान्तों के सैन्य संगठन को देखने पर हम पाते हैं कि इक्ता धारकों और प्रांतीय गवर्नरों से अपेक्षा की जाती थी कि वे जरूरत के समय केंद्र के लिए अपने सैन्य दल की आपूर्ति करें। उन्हें यह भी निर्देश दिया गया था कि सैनिकों के वेतन में से कटौती न करें और न ही कम वेतन दें। इन निर्देशों से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि प्रत्येक प्रांत की अपनी एक सेना थी, और इस सेना की ताकत उनके आकार और केंद्र से दूरी पर निर्भर करती थी। स्वाभाविक रूप से हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि प्रांत के आकार के बावजूद, सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित प्रांतों में बड़ी ताकत थी। यह प्रांतीय सेना शांति और व्यवस्था बनाए रखने और प्रांत के भीतर या पड़ोस में हिंदू प्रमुखों को नियंत्रण में रखने के लिए भी आवश्यक थी।

5. बरीद 

राज्यपालों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने और नियंत्रण रखने के लिए सुल्तानों ने प्रांतों में 'बरीद' रखे, जिनका कर्तव्य प्रांतों की हर घटना के बारे में सुल्तान को सूचित करना था। सुल्तान बलबन ने अपने दूसरे पुत्र बुग़रा खाँ को समाना प्रान्त पर नियुक्त करते हुए उसे प्रांत की स्थिति के बारे में जानकारी देने के लिए 'बरीदों' को भेजा।

6. प्रांतीय न्यायपालिका

प्रांतीय न्यायपालिका में प्रांतीय मुख्यालयों में प्रांतीय अदालते होती थी, परगना मुख्यालय और गांवों में ग्राम पंचायतें शामिल थीं। गांव प्रशासन की सबसे निचली इकाई थी और इसके प्रबंधन के लिए इसे स्थानीय लोगों या ग्रामीणों पर छोड़ दिया गया था। एक पंचायत के तहत कई गांवों को एक साथ समूहीकृत किया गया था, जिसमें पांच प्रमुख पुरुष शामिल थे। पंचायत के अध्यक्ष या सरपंच की नियुक्ति वाली, या मुक्ति या फौजदार द्वारा की जाती थी। पंचायत ने इलाके के दीवानी या फौजदारी मामलों की सुनवाई की और इलाके में कानून-व्यवस्था भी बनाए रखी।

7. प्रांतपतियों पर नियंत्रण 

प्रांतीय गवर्नरों को अपने प्रांतों में काफी स्वतंत्रता प्राप्त थी, लेकिन यह स्वतंत्रता पूरी तरह से बेलगाम नहीं थी। कुछ सीमाएं थीं जो हमेशा उनकी महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करती थीं।

पहला प्रांत में अलोकप्रिय होने का उनका अपना डर ​​था।

दूसरा, राज्यपालों को उनके कुप्रशासन के लिए हटाया जा सकता था, और लोगों को राज्यपालों के खिलाफ सुल्तान के पास जाने का अधिकार दिया गया था।

तीसरे न्याय के मामलों में प्रांतीय अदालतों से अपील हमेशा केंद्र के पास दायर की जा सकती है। स्वाभाविक रूप से प्रांतों के राज्यपालों ने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उनके प्रांतों में उचित न्याय हो।

चौथा, वित्तीय मामलों में प्रांतीय दीवान व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र था और केंद्र के प्रति जिम्मेदार था।

पांचवां, बरीद और जासूसों की उपस्थिति ने सुल्तान को प्रांतों में होने वाली हर चीज की सूचना दी, हमेशा राज्यपालों को उनके कर्तव्यों की याद दिला दी।

और अंत में, सुल्तान को हमेशा किसी भी राज्यपाल को स्थानांतरित करने या हटाने का अधिकार था जिसे वह नापसंद करता था।


Popular and Aristocratic Culture in India

Introduction The cultural history of the Indian subcontinent reveals complex layers of social life, consumption, aesthetics, and power. In ...